कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
वज्र देशके राजा राजा योग धीर
हमारे साथ सम्बन्ध नहीं किया चाहते हैं। कबीर साहबने, उन दोनोंको समझा कर कहा कि, तुम्हारी जातिवाले तुम्हारे बराबर बैठने योग्य नहीं हैं। अब तुम दोनों भाई आपसमें सम्बन्ध कर लो बेटे बेटीका लेन देन करो। तब उन दोनों भाइयोंने जो सत्यगुरुके आज्ञाकारी थे, आपसमें सम्बन्धका प्रबंध किया। ब्राह्मणोंने देखा कि, वास्तवमें आपसमें सम्बन्ध करने लगे तो अच्छा न होगा, अतएव जातिके समस्त ब्राह्मण खुशामद करने लगे कि, तुम ऐसा काम मत करो, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध करेंगे, वहाँके ब्राह्मण प्रसन्नता पूर्वक बेटे बेटीका लेन देन करने लगे।
वह * बटका सूखा ठंठ जिसको कबीर साहबने हरा किया था उसका वृत्तान्त सुनो कि, वह वृक्ष बहुत बड़ा हुआ बहुत फल गया। गुजरातमें है, कबीर बट कहलाता है। बहुत पवित्र और शुद्ध माना जाता है। प्रत्येक सालके कार्तिक मासमें वहाँ एक बड़ा भारी मेला लगता है, उस वृक्षकी छायामें सुखसे सात सहस्र मनुष्य रह सकते हैं। हस्तामलक भूगोलमें इस कबीर बटका हाल लिखा है। शिक्षा विभागके अंग्रेजी पुस्तकोंमें प्रायः इस कबीर बटकी प्रशंसा लिखी है। सरजान मिलटन नामक, जो अंग्रेजी भाषाका एक बड़ा प्रतिष्ठित कवि हो गया है, उसने भी इस कबीर बटकी बड़ी प्रशंसा की है, उस वृक्षकी बड़ी २ डालियाँ और लटें चारों ओरसे इतनी झूल पड़ी है कि वृक्षकी जड़ पहचानी भी नहीं जाती कि, कौन है। दूर दूर तक उसकी छाया है उसके नीचे बहुत लोग विश्राम लेते हैं। गरमीसे जो लोग जलते चले आते हैं इस वृक्षकी छायामें आकर ठण्डे हो जाते हैं, उनके शरीरसे सब तपन दूर हो जाती है। भेड़ बकरियाँ डाङ्गर डोर चरानेवाले लोग इस वृक्षकी छायामें बड़ा आराम पाते हैं। इस वृक्षसे डाल पात छाता समान चारों ओर छाया कर रहे हैं। वास्तवमें इस वृक्षके देखनेसे परमेश्वरकी मायाका कौतुक दिखाई देता है। यह बड़ाही सुन्दर है। इसका सौन्दर्य आश्चर्यमें डालता है। लोगोंको इस वृक्षसे बड़ा लाभ है। इसका डाढ़ोंमें बड़े रेशे हैं जिस प्रकार अन्यान्य पौधे तथा पशुओंका मांस सड़ जाता है इस वृक्षके डाढ़के रेशे कदापि नहीं सड़ते हैं। इनमें जो बड़ा वृक्ष होता है वह अपनी डाढ़ जब पृथ्वीकी ओर छोड़ता है, तबवे रेशे पहले नरम रहते हैं फिर पृथ्वीसे मिलकर जड़ पकड़ते हुये भली भाँति दूढ़ होकर बड़े वृक्ष हो जाते हैं। हिन्दू लोग इस वृक्षको बहुत चाहते हैं देव करके मानते तथा पूजन करते हैं। उस कबीर बटके समीप दो एक मन्दिर भी बने हैं। ब्राह्मण लोग इस वृक्षके नीचे
- आज कल उक्त वृक्ष नर्मदाके बीचोबीच पड़ गया है अर्थात् टापूके समान जान पड़ता है। वहाँ उसके दर्शनार्थी लोग नावपर चढ़के जाते हैं। सं. १९०२-ई०
बैठकर पूजा पाठ किया करते हैं । प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक मतके मनुष्य इस वृक्षकी छायामें बैठना पसन्द करते हैं । प्रत्येक मनुष्य छज्जेनुमा खेमेके सदृश डालियाँ देखनेको उत्सुक हैं । इस वृक्षके छायामें सूर्य्यकी तपन गरमीके मौसममें बिलकुलही असर नहीं करती । हिन्दुस्तानी फौजेंभी इस वृक्षके नीचे पड़ाव डालती है । नियत ऋतुमें सहस्रों हिन्दू इस वृक्षके नीचे एकत्रित होते हैं । विश्वासियोंकी मनोकामना पूर्ण होती है । अंग्रेज लोग जब उधर आखेटके निमित्त जाते हैं तो कई एक सप्ताहपर्यन्त वहाँ रहते हैं । इस सुन्दर तथा खेमावार वृक्षपर शुक्र, मयूर, पंङ्ङुङुङ इत्यादि सहस्रों प्रकारके पक्षियोंका निवास हुआ करता है लालबन्दर तथा बड़ेडील डौलके अनेक चमगीदङ्ङ इसपर रहते हैं । इससे एकही लाभ नहीं बरन् अनेकों लाभ हैं ; इसका फल बड़ाही सुन्दर तथा स्वादिष्ट होता है । पशु तथा मनुष्य दोनोंही इसको खाकर तृप्त हो जाते हैं, सहस्रों जीवों का प्रतिपालन इसके फलसे होता है, मनुष्य तथा पशु दोनोंको यह वृक्ष बड़ा लाभ पहुँचाता है । पहले तो यह बहुत बड़ा था पर अब कुछ कम हो गया है । दूरसे जो लोग इस कबीर बटके दर्शनके लिये जाते हैं वे इस बटवृक्षके पत्रोंको प्रसादतुल्य मानकर अपने घर लाते हैं । वर्तमान कालमें यह वृक्ष कबीर साहबके कौतुक का एक चिन्ह खड़ा वहाँ मौजूद है । जिस किसीको देखनेका उत्साह हो सो वहाँ जाकर देखकर अपनको कृतकृत्य करले, मैं इसकी विशेष प्रशंसा नहीं करता किन्तु अन्य जातिवाले इसकी विशेष प्रशंसा किया करते हैं । तत्त्वा जावा दोनोंकी हार्दिक आकांक्षाको सत्यगुरुने पूरा किया । जिन जिनने कबीर गुरु पाया वे सत्यगुरुके हंस होकर सत्यगुरुके देशमें विराजमान होगये । उनकी प्रशंसा शेष और शारदा भी नहीं कर सकते फिर मैं क्या चीज हूँ ? ॥
कबीरपन्थके प्रवर्तक महत्त्मा धर्मदासजी ।
कबीर साहब धर्मदासजीकी बड़ी प्रशंसा लिखते हैं । धर्मदास बोधमें इनका पूरा समाचार लिखा हुआ है । इनका वृत्तान्त यह है कि, इनका वैश्यके घर में जन्म हुआ था, बड़े धनाढ्य सेठ थे, नीमावत वैष्णव थे, ठाकुर पूजा किया करते थे, मूर्तिपूजाका बड़ा सामान साथ लिये तीर्थोंमें फिरा करते थे जब तीर्थों में घूमते यथुरा नगरीमें आये तो मूर्ति पूजाके परिपाकके समय वहाँ सत्यगुरुसे साक्षात्कार हुआ ।
धर्मदासजी बड़े आचारी थे अत्यन्त पवित्रता तथा शुद्धतापूर्वक रहा करते थे. अतुल सम्पत्ति होनेपर भी हाथसे रोटी बनाकर खाया करते थे, क्योंकि,