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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कबीर साहिबकी मंगलवाणी

दोनोंने मुझको युद्धके निमित्त ललकारा। मैं भयभीत होकर कमलकी नाल पकड़े हुए नीचे उतरा तो सहस्र वर्षपर्यन्त मैं फिरता और चक्कर खाता रहा कुछ ठिकाना नहीं चला। तब मैंने वहाँ बैठकर सहस्र वर्ष पर्यन्त तपस्या की, तब आकाशवाणी हुई कि, ए मुख् ! तूने अब तक नहीं जाना कि, इस संसारके, रचयिता कौन है ? तब उसीमें फिरते हुए नीचेको गया तब मुझको आसमानी रङ्गका एक स्वरूप जिसके चार भुजाएँ थीं जो पीताम्बर पहने था, दिखलाई दिया। शेषजीके ऊपर सोया हुवा और वनमाला उसके गलेमें थी। शंख चक्र गदा पद्म लिए हुए अंचेत योगनिद्राके वशीभूत दिखलाई दिया। इस पुरुषको देखकर मैं निद्राशक्तिकी स्तुति करने लगा। तब उसके शरीरमेंसे भगवती देवी निकल पड़ी। तब मैं उस रूपको देखकर निर्भय होगया। जब भगवती निकल पड़ी। तब भगवान् जागे। पाँच सहस्र वर्ष पर्यन्त उन दोनों दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका वध किया। पीछे उस शक्तितने जो भगवान्के शरीरसे निकली थी यह कहा कि, हे ब्रह्मन् ! समस्त संसारका स्तंभ मैं हूँ। ये दैत्य जो मारे हैं इनकी उत्पत्तिका कारण भी मैं हूँ। अब तू भली भाँति जगत् की उत्पत्ति कर। यह कहकर वह शक्ति भगवान्के शरीरमें समागई। इतनी बात सुनकर ब्रह्मा कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा मनमें सोच विचार करने लगा कि, मैं किस प्रकार सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? मुझको तो कुछ दिखलाई नहीं देता अब मैं किससे पूछकर सृष्टिको उत्पन्न करूँ ? ब्रह्मा इस ध्यानमें बहुत गोता खा रहा था। तब उसने देखा कि, एक विमान आकाशसे उड़ आया उसके बराबर बैठ गया। उसके ऊपर भगवतीजी महारानी अपनी शक्तियों सहित बैठी हैं। इस विमानको समीप विष्णु और शिवको खड़े देखा।

तीसरा अध्याय—फिर नारदने ब्रह्माजीसे कहा कि, हम तीनों देवता जाकर इस विमानके एक डण्डेपर बैठ गए। तब वह विमान वहाँसे उड़कर एक भूभागपर आया। वहाँ जल नहीं था। परन्तु अनेक प्रकारकी वाटिका वृक्ष और बड़े सुन्दर मनुष्य बावड़ीं कुएँ इत्यादि और अनेक प्रकारके मकान तथा मन्दिर इत्यादि देखे। तब हमने एक मनुष्यसे पूछा कि यह कौन लोक है। तब उसने उत्तर दिया कि, यह स्वर्गलोक है। वहाँ एक मनुष्य राजा इन्द्रके सदृश दिखलाई दिया। एक क्षण वहाँ ठहर कर विमान पुनः आगे बढ़ा तो एक नन्दन वनमें पहुँचा। वहाँ सहस्रों प्रकारके पुष्प थे। बड़ी सुगंधि आती थी। चार दांतवाले हाथी थे। सहस्रों परियों नाचतीं और गंधर्व लोग गीत गाते और बाजा बजाते थे। तूबा वृक्ष तथा कल्पवृक्षोंकी बड़ी सुगंधि आती थी। वहाँ एक बड़ा सुन्दर नगर

दिखाई दिया और नगरमें एक राजा दिखाई दिया था जिसका नाम देवराज था । हमने पूछा यह कौन लोक है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, यह ब्रह्मलोक है । वहाँ एक ब्रह्माका भी दर्शन हुवा जो सनातन ब्रह्मा कहलाता है । तब ब्रह्माने कहा कि, ब्रह्मा तो मैं हूँ यह सनातन ब्रह्मा कहाँसे आया इस ब्रह्माके चहुँ ओर अनेक देवतागण सेवाके निमित्त उपस्थित हैं ? उसको देखकर ब्रह्मा नारदसे कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा । फिर वहाँसे वह विमान उड़कर एक पल-भरमें कौलासमें पहुँचा । इस पर्वतपर भौंति भौंतिके पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी । सहस्रों प्रकारके पक्षी बोल रहे थे । वीणा इत्यादि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । तब एक क्षणमें शम्भु महाराज इस मकानसे बहिर्गत हुए जो बैलपर सवार थे । उनके तीन नेत्र थे, पाँच मुंह और दश भुजाएँ थीं, उनके ललाटमें चन्द्रमा था, वाघम्बर ओढ़े हुए थे । गणपति जी और वीरभद्र तथा स्वामिकांतिक इनके साथ थे । सहस्रों ब्रह्मा और शंकर आदि इनकी स्तुति करते हुए एवं चँवर इनके शीशपर फिरता हुआ देखा फिर एक पलभरमें वह विमान वैकुण्ठमें जा पहुँचा । इस वैकुण्ठको देखकर मैं परमानन्दित हुवा । वहाँ मैंने सनातन विष्णुको देखा । सहस्रों प्रकारके ब्रह्मा और शिव और इन्द्र इत्यादि देवता देखे उस सनातन विष्णु का स्वरूप अलसीके पुष्पके सदृश दिखाई दिया । शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे हैं लक्ष्मी चँवर कर रही हैं । ब्रह्माजी नारदसे कहते हैं कि, हम दोनों इस माया को देखकर आश्चर्यान्वित हो रहे । वहाँसे विमान उड़कर समुद्रमें पहुँचा । वहाँ सहस्रों प्रकारके कुएँ और बावडियाँ दिखलाई दीं, वहाँका जल अत्यंत मीठा था, सहस्रों प्रकारके वृक्ष और मोती इत्यादिकी खान थीं इस स्थानका नाम मुनिद्वीप था, अनेक प्रकारकी दवाई बूँटी और पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी, भँबरे गूँज रहे थे, वहाँके मनुष्य रत्नजटित वस्त्र आभूषण पहने हुए थे और वहाँ एक रत्नजटित पलंग था । उसपर एक देवी बैठी थी । उसकी श्रीवामें सहस्रों प्रकारके रत्नोंकी माला थी, वह सूर्यके सदृश देदीप्यमान थी, वहाँ उसके नेत्रोंका प्रकाश करोड़ों लक्ष्मीके सौन्दर्यके सदृश था और अंकुश तथा त्रिशूल उसके समीप धरा था तथा उस माहामाया का दर्शन करके मैं बड़ा ही सुखी हुआ और सहस्रों प्रकार के रत्नों से जड़े हुए देखे, सहस्रों देवियों उस माहामायाकी सेवा और चँवर कर रही थीं । ब्रह्माजी नारदजीसे कहते हैं कि, हम तीनों उस सनातन आदिमहामायाका दर्शन करके आनन्दित हुए फिर आगे चलकर एक और दूसरी मूर्तिका दर्शन हुवा जो बालकके समान एक बड़के पतेपर लेटा था, बच्चोंके सदृश अपने पावोंका अँगूठा, अपने मुँहमें दिये हुए था, उसको देखकर नितान्तही हर्षित हुए, अपने मनमें सोचा कि, कामनाओंको पूर्ण करनेवाली यही माहामाया है ।

चौथे अध्याय—ब्रह्माने नारदसे कहा कि, हम तीनोंने इस महामायाके समीप जानेका उद्योग किया, इतनेमें एक विमान आकाशसे उतरा, उस विमानसे सहस्रों प्रकारकी स्त्रियोंको उतरती देखकर हम तीनोंको अत्यन्तआश्चर्य हुआ, उनमें कोई पुरुष नहीं था, सब स्त्रियाँ थीं, तब हम तीनों देवताओंने स्त्रीरूप धारण कर लिया, हमभी उन स्त्रियोंके बीचमें गए, उनका सौन्दर्य हमारे कथनसे बाहर है, इस महामायाको बड़के पत्तेपर सोया देखकर हम उसके चरणोंके समीप गए, तब समस्त स्त्रियोंने हमारी ओर देखा, उनको हमारे स्त्री होनेका ज्ञान नहीं हुआ। तब श्रीमहामाया मुसकराई, और प्रसन्न हुई, उस समय उस महामायाके चरणोंके नखोंमें एक कौतुक दिखलाई दिया कि, जैसे दर्पणमें मूर्तिका प्रतिबिम्ब दिखलाई देता है। वैसेही इसमें अनगिनती ब्रह्माण्ड और अनगिनती वृक्ष और पर्वत और अनगिनती ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इत्यादि देखे बरुण, वीर त्वष्टा, विश्वआत्मा नारद, ऋषि, मुनि, गंधर्व, अश्विनीकुमार, सहस्रों प्रकारके नाग, वैकुण्ठ, स्वर्ग, पाताल और विष्णुकी नाभिकमलमें ब्रह्मा भी देखा, मधु कंटभकी लड़ाई भी देखी, इस मायाका पारपाया नहीं जाता। इस प्रकार सौ वर्ष पर्यन्त हमने मेधासमुद्रमें कौतुक देखा, इस कौतुक देखनेके उपरान्त विष्णु महाराज देवीकी स्तुति करनेको दंडायमान हुए कि, हे महामाये सच्चिदानन्द रूपिणी ! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ कि, समस्त पृथ्वी आकाश पर्वत और जलके बीच आपही समा रही हो। हे मातः ! यह महाज्ञान हमको आपके चरणोंके प्रतापसे हुआ, समस्त कर्तव्याकर्तव्यको मैंने जाना, आपके चरणोंके प्रभाव विना किसीको ज्ञान नहीं होता, संसारमें यह बात स्तब्ध है कि विष्णु विना और दूसरा कोई नहीं, परन्तु आपके चरणोंके प्रभावसे यह ज्ञान मुझमें उत्पन्न हुआ, हे मातः ! जिस समय मुझको नींद आगई थी उस समयभी तुम्हारी कृपासे मधु कंटभका नाश हुआ, ब्रह्माकी रक्षा की थी। इस संसारमें देवता और मनुष्य जानते हैं कि, विष्णु पालन करता है। परन्तु विना आपके मुझको पालनेका सामर्थ्य नहीं है। हे मातः आपके नखोंमें अनेक ब्रह्मा और अनेक विष्णु और अनेक रुद्र इत्यादिको देखकर मेरी बुद्धि चक्कर खागई, अब मुझको ज्ञान हुआ कि, मैं स्त्रीरूप होकर सर्व आपकी सेवा किया करूँ।

पाँचवाँ अध्याय—विष्णुके उपरान्त शिवजीने बड़ी स्तुति की कि, हे मातः ! जो कुछ है सो सब तेरी लीला है। तेरे विना हम कौड़े मकोड़ेके समान भी नहीं, तेरीही कृपासे मैं जगत्का संहार करता हूँ। जब शिवजीने स्तुति की तब महामाया के मुखसे एक मंत्र निकला, उसको शिवजीने याद करलिया, उसके कारण प्रत्येक स्थानपर शिवजीको महामायाकी मूर्ति दिखलाई दी। फिर नारदजीने स्तुति की