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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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Page 1300

भृगुमुनिने कहा कि, मुझे उस ब्राह्मणके पास गंगातटपर ले चलो। फिर दोनों योग्यबलसे शीघ्रही तपस्वी ब्राह्मणके पास पहुँच गये। वहाँसे उसको साथ लेकर भृगुजीके आश्रम पर पहुँचे। कालपुरुषने शुक्रका पूर्व शरीर, दिखलाकर अनुरोध किया कि, अब तुम इसमें प्रवेश करो। पर उसने स्वीकार नहीं किया, कालपुरुषने बहुत समझाया कि, इसी शरीरसे तुम्हें दैत्योंकी गुरुआई करनी है। उधर भृगुजीने जल डालकर तपोबलसे मृतक शरीरको हूट पृष्ठ बनाया ब्राह्मणने उसमें प्रवेश किया उसी शरीरसे शुक्र दैत्योंके गुरु बने।

इस कथाके लिखनेका आशय यह है कि, प्रारब्ध कितना प्रबल है देखो ! कितने जन्म धारण करने पर भी भावीको भोगनेके लिये उसी पूर्वशरीरमें आना पड़ा।

६६ प्रश्न—गुरु और अधिकारी, आजकल अच्छे गुरु तो मिलतेही नहीं जिससे मोक्षमार्गकी प्राप्ति हो ?

उत्तर—ऐसा, कहना ठीक नहीं, क्योंकि, गुरुका अभाव नहीं है। सब प्रकारके मार्ग बतानेवालेगुरु सदा वर्तमान हैं। अधिकारीके अभावसे गुरुका अभाव जान पड़ता है।

कालपुरुष और सत्य पुरुष।

प्रश्न—आपने कहा था कि, काल पुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे कोई पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता इससे प्रमाणित होता है कि, काल पुरुषसे भी प्रबल है।

उत्तर—कालपुरुष सत्यपुरुषसे प्रबल नहीं है पर सत्यपुरुषने काल-पुरुषको तीन लोकका राज्य दिया है दी हुई वस्तुका ले लेना उचित नहीं है। वह समय आवेगा जब कि, कालपुरुष अपना नियत समय व्यतीतकर स्वयम् अलग हो जावेगा।

कबीर साहिब और सत्य पुरुषकी एकता।

६८ प्रश्न—आपने कहा था कि, कबीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आये। इससे स्पष्ट है कि, कबीर साहब और सत्यपुरुष दो हैं। कबीर साहब केवल अहंदी हैं।

उत्तर—कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो नहीं, केवल जीवोंके अज्ञानसे दो दीखते हैं। जिनको ज्ञान है उनकी द्वैतदृष्टि नहीं होती। संसारका व्यवहार द्वैत बिना नहीं चलता इस कारण कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो कहे जाते हैं।