सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पुस्तकोंका लिखाजाना

अचेत पड़े रहे। इसराईलको परमेश्वरने इतना बल प्रदान किया कि, उसने मृत्यु को अपने वशमें कर लिया। यमको परमेश्वरने अनगितनी आँखें प्रदान की हैं। उसके चार पर हैं। जितने पृथ्वी तथा आकाश हैं। सबकी और उसकी एक आँख रहती है। जब कोई जीव मर जाता है तब उसकी एक आँख गिर पड़ती है। जब कोई उत्पन्न होता है तब उसकी एक आँख बढ़ जाती है। जब आदम उत्पन्न हुवा था, उसी समयसे मृत्यु उत्पन्न हुई थी।

यह तो मुसलमानी हदीसके अनुसार चारों फ़िरिश्तोंका हाल लिखा गया। पश्चिमदेशीय अम्बिया सहानुभावता प्रकाशित करते हैं। जो नबियों की हदीसे हैं, सूक्ष्म वेदसे कहीं २ मिलती हैं, कहीं २ विभिन्नता भी है। वो उनकी विद्याका दोष है। इसके अतिरिक्त कहनेवालोंने कुछ विभिन्नताकी अथवा लिखनेवालों ने कुछ औरका और लिख दिया परमेश्वरी वाक्य सब ठीक हैं परन्तु समझनेवालों में दोष है। जिनका हृदय कलुषित हैं वे परमेश्वरी वाक्यको समझ नहीं सकते।

यह समस्त संसार हरिण्यकशिपु फिर ऊन (परमात्माका वागी) इत्यादि सद्गुण अंधा और अज्ञानी है। अपनेको अपने कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता जानता है। जबलों यह अपनेको कर्मोंका कर्ताभोक्ता जानता है तबलों यह निश्चय उन तीनों के अधीन रहेगा। यह तीनों उसके परमेश्वर होंवेंगे। जब यह जान लेवेगा कि, मैं कर्मोंका कर्ता तथा भोक्ता नहीं हूँ, तब उसकी भीतरी आँखें खुल जावेंगी। तब यह फिरऊनी प्राणसे दूर भागेगा। सुतरां मूसाकी दूसरी पुस्तक खिरोजनामकका (७) वाब।

(१) फिर खुदावन्दने मूसासे कहा कि, देख मैंने तुझे फ़िरऊनके निमित्त परमेश्वरसा बनाया तेरा भाई हारूँ तेरा अनागतवक्ता होगा। (२) सब कुछ जिसकी मैं तुझको आज्ञा दूँ कहना। तेरा भाई हारूँ फिर ऊनसे कहेगा कि, बनी इसराईलको अपने देशसे जाने दो। मैं फ़िरऊनके हृदयको दृढ़ करूँगा। इत्यादि।

अब यहां पर दोनों कि, मूसा तो फ़िरउनका खुदा था। हारूँ रसूल अर्थात् भविष्यवक्ता था। इसी प्रकार इस संसारके ये तीन परमेश्वर हैं। समस्त धर्मों के अग्रगण्य भविष्यवक्ता हैं। यह संसारके मनुष्य पशुओं तथा डेंगरू डोरके सद्गुण हैं। ये तीनों इसके चरब हैं और परमेश्वर हैं। क्या भेड़ बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त और किसी परमेश्वरकी सुध पासकती हैं? कदापि नहीं।

इसी प्रकार अनगितनी ऋषि मुनि अपनी २ सृष्टिके परमेश्वर हैं। यथार्थ परमेश्वरको कौन जान सकता है?

इस सृष्टिकी दृष्टि व्यर्थ और बिलकुल रूढ़ी हुई है । इस कारण यह यथार्थ परमेश्वरको पहचान नहीं सकता ।

जैसे—एक पिपीलिका जो कागज पर फिरती अथवा बँठी हो वह देखती है कि, कागजपर अक्षर बनते जाते हैं । वह केवल लेखनीको देख सकती है विशेष दृष्टि उठावे तो उँगलियोंपर्यन्त देखे । तीन उँगलियोंको उसका कारण जाने । इसमें विशेष देखनेका सामर्थ्य नहीं । कोई बड़ा जीव बाजूपर्यन्त देख सकता है, कोई समस्त शरीर देखता है । कोई आत्माको देखता है, कोई अपने यथार्थ-तत्वसे विज्ञ है ।

कर खाब अपना दूर तू ग़फ़लतको छोड़ जाग ।

हर सिस्त हर मक़ामें लगी देखलीजे आग ॥

आँखोंको खोल आजिज़ उठ जल्द जाव भाग ।

है कामशशीशः एक फ़क़त दूरवीनका ॥

देखो जिधरको जाके तमाशा है तीनका ॥

मनु स्वायम्भूकी कथा ।

देवीभागवतके दशमस्कंधके प्रथम अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुकी नाभि-कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुवा, ब्रह्मासे मनु स्वायम्भू उत्पन्न हुवा । मनु स्वायम्भू क्षीर समुद्रके किनारेपर जा श्रीभगवतीजीकी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर एक चरणसे खड़ा हो और बिना अन्नजलके बंदना करते हुए वाक्यबीजमंत्र पढ़ता रहा । अपने श्वास को रोककर वृक्षके सदृश खड़ा रहा । तब श्रीभगवतीजी सौ वर्षके उपरान्त प्रसन्न हो कहने लगीं कि, वरदान माँगो । तब मनुजीने निवेदन किया कि, मेरी इस बंदना में कुछ बिगाड़ न हो । इस बंदनासे मेरी कामना पूरी हो । भगवतीने कहा कि, तथास्तु । इसी मंत्रसे मनुने जगत्की रचना की ।

दशवें स्कंधके नववें तथा दशवें अध्यायमें देखो कि, सब मनु श्रीभगवतजी की पूजा करते रहे और देवीसे वरदान पाकर सांसारिककांक्षाओंको प्राप्त करते रहे यही मानवी सृष्टिके आदि प्रवर्तक हैं ।

राजा इन्द्रकी कथा ।

समस्त देवताओंका राजा इन्द्र है । यह बड़ा ज्ञानी है । समस्त देवता उसकी आज्ञामें रहते हुए सेवा करते हैं । यह इन्द्र कहता है कि, मैं समस्त संसारका सृजन करता हूँ, मुझसे ही उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु सब कुछ है । सुतरां ऋग्वेदमें सकलोपनिषदमें लिखा है कि, यद्वात्थ नामक एक ऋषिको राजा इन्द्र वैकुण्ठमें उठा ले गया । तब उस ऋषिने पूछा कि, तू कौन है ? तब इन्द्रने उत्तर दिया कि, तू जप तप