कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन
चौहत्तरवाँ प्रकरण
प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार ।
वहांतक तो मैंने कालपुरुषके धर्मका विवरण किया, जिनमें फँसकर मनुष्य के पथ नहीं मिलता. कारण यह कि, यह अहंकार तथा भ्रममें फँस रहा है, न यह ईर्षा तथा अहंकारको छोड़ता है न इसको सत्यपुरुषकी भक्तिका मार्ग मिलता है, सब इसी अभिमानमें “कि, मैं बड़ा और मेरा धर्म तथा गुरु बड़ा” डूबे हुए हैं, कौन सत्यका इच्छुक है जो मिथ्याको छोड़कर, स्वसम्बेदकी सत्य शिक्षाकी खोज करे ।
ग़ज़ल आजिज़ ।
यह मुत कब्रिबर हुआ इनसान खाकी । जिधर देखो उधर सामान खाकी ॥
पड़ा जो फ़र्श पर लाचार कोई । रसाई अर्श इम्कान खाकी ॥
बहर काने तमाशा मजहरे जाता । वही खुद सूरते इनसान खाकी ॥
जो मुरशिदके कदमकी खाक होजा । सफ़ाकर आइनः ईमान खाकी ॥
कदम गाहे उसीकी जा सलामत । बजुज उसके नहीं दरमान खावी ॥
नहीं कोई दूसरा दुश्मन हमारा । कि खाकी शकलका शैतान खाकी ॥
हिमाकृतसे है पैवस्तः लजायज़ । सरीरो सूतवतो सुलतान खाकी ॥
न अपने अस्लको पहचानता है । हुआ मगरूर नाफ़रमान खागी ॥
सिफ़त तीनों बहम अरबः अनासर । बहम मखलूत हैं यकसान खाकी ॥
न इनसे आदमीको पेश दरती । तेरे बे फायदः अरमान खाकी ॥
न हो सगरूर खुद इल्मो अमलपर । कि बानीवेद और कुरआन खाकी ॥
मिलेगा आजजीसे हकको आजिज़ । करे अपनेको गर कुरबान खाकी ॥
इति श्री कबीर मन्शूरके प्रथम भागका प्रथम अध्याय ॥ १ ॥
प्रथम अध्यायका परिशिष्ट
<!-- image: Decorative horizontal line separator -->कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें चौहत्तर प्रकरण हैं । अब आगे इस अध्याय का परिशिष्ट भाग दिया जाता है जिसके लिये पीछे कई स्थानोंमें टिप्पणी द्वारा सूचना दी जा चुकी है । इन प्रमाणोंको यह इसलिये दिया है कि, बहुतसे महंत संत सेवक सतियोंने अनुरोध किया है कि, जहाँ जहाँ ग्रन्थोंके प्रमाणकी आवश्यकता हो वहाँ वहाँ वह जरूर दे देना चाहिये । यद्यपि मेरा भी यही विचार था
कि, इन प्रमाणोंकी जहाँ जहाँ आवश्यकता है ये वहीं वहीं दे दिये जायें किन्तु, कितने कारणोंसे वह न होसका, इसलिये यहा दे दिया है ।
प्रमाण कबीर वाणीका ।
देबो प्रकरण ५ पृष्ठ २२.
प्रथम वानी सुनियो चितलाई । आदि अंतकी संधि देहुँ बताई ॥
प्रथम आदि समरथ हत सोई । दुसरा अंस हता नहिं कोई ॥
आदि अंकुर सुरति तब कीन्हा । सात करीको गरभ तब दीन्हा ॥
इच्छा सूरति दुसरे उपजाई । सातो करी में चित्त बनियाई ॥
छिपा रूपहिं कीन्ह परगासा । स्वाति रूप इच्छा रहिवासा ॥
सात तेहिंते इच्छा उपजाई । भिन्न भिन्न परकार बनाई ॥
विमल शब्द विगसित तब भयेऊ । तब हुलासबुंद पाँच करिमें दयेऊ ॥
तब पांच अंड भयो उत्पानी । तत एक भिन्न परसानी ॥
नहिं तब धरनी नहिं अकासा । नहिं तब दुसरो हतो अवासा ॥
धावै अंड करै चौचन्दा । आपु अदेख और सहज अनन्दा ॥
तबकी बात नहीं कोई जाने । कहाँ समुझाय तो झगरा ठाने ॥
धर्मदास सुनियो चितलाई । फूटो अंड सूरतसे भाई ॥
सहज अंकुर बीज निरमाई । तिहिंकी इच्छा अंड उपजाई ॥
तब सरबनते साजी बानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलबुन्दतेहिं सुरतिको दीन्हा । पांच अंश तब उत्पन कीन्हा ॥
पांचों अंस तब कहाँ बुझाई । पांचों अंडमें तुम जाओ समाई ॥
एकहिं एक अंड तब गयेऊ । आपहु आप कलामें ठयेऊ ॥
तबअविगति एक खेल बनावा । पांच सरूप पांचों अंडहिं आवा ॥
फूटो अंड तेज भई धारा । सबमें देखु पांच ततसारा ॥
पांच तत भिन्न भिन्न विस्तारा । सात अद्विस्ट तेहिंमाहिं संचारा ॥
देखि सरूप अंडकर भाई । सोहंग सुरति तबहिं उपजाई ॥
पुरुष सकती भई दौय प्रकारा । तिन्हको सोंप्यो उत्पन सारा ॥
तासों अंकुर भेद बतावा । वचन सुरत एक संग समावा ॥
ताते ओहं पुरुषको अंसा । ओहं सोहं भए दो बंसा ॥
तिनकी आज्ञा उत्पन्न कीन्ही । शब्द सनद उनहूको दीन्ही ॥
मूलसुरति औ पुरुष पुराना । रचना बाहेर कीन्ह अस्थाना ॥
ओहं सोहं अंडनमें रहेऊ । सकल सृष्टिके कर्ता कहेऊ ॥
प्रथम अंकुर दूसर इच्छा उत्पानी । तिसर मूल चौथ सोहं ठानी ॥
ओहं सोहं की बंधानी । आठ अंस तिन्ते उत्पानी ॥
आठ अंस भए एकहि ध्याना । करता ख्रिस्टिको भयो परवाना ॥
करता सरूप आठ भए अंसा । तिन्हके भए सृष्टि सब वंसा ॥
तेज अंड अंचितकूं दीन्हा । प्रथम सुरत जब उत्पत कीन्हा ॥
जोहं अंस दुसरे भए भाई । धीरज अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
तिसरे अंस अंक निरमाई । छमा अण्ड तिन्ह बैठक पाई ॥
चौथे अंस सुकृत है सारा । सत्य अंड है ताहि पसारा ॥
पांचऐ अंस हिरम्पर भाई । सुमत अंड तिन्ह बैठक पाई ॥
दोय अंस दोय करी समाने । तिनका भेद गुरुगम जाने ॥
एक अंस त्रिगुण अवतारा । ते सब सृष्टिके भये कडिहारा ॥
साखी—एती उत्पत सुरत की, भिन्न भिन्न परकार ।
कहें कबीर धर्मदाससों, आगे बंस असार ॥
धर्मदास बचन ।
साँचे सद्गुरु की बलिहारी । धर्मदास विनती अनुसारी ॥
धन्य भाग मोहि मिले गुसाई । अपनो कै मोहि लीन्हमुकताई ॥
चारि वेद अरु सास्त्र पुराना । सबहीके हम सुनिया ज्ञाना ॥
अविगति गति काहु नहिं जानी । जो तुम कही आदिकी बानी ॥
सुरत सोहंगके आठ भए अंशा । तिनके सृष्टि सबही भए वंशा ॥
अपरंपार है तिनका सेषा । अचित्य ख्रिस्टिको कहो विवेषा ॥
साखी—तुम निज सतगुरु सत्य हो, हम निज चिन्हा सोय
अचित ख्रिस्टिको भेद कहो, अविगति पूछौं तोय
धर्मदास तुम बडे विवेकी । तुम्हारे घटमें बुधि बड देखी ॥
अचित्य ख्रिस्टिको कहो पसारा । तेज अंड तिन्ह पाये सारा ॥
वाराहि पालंग अंड विस्तारा । तिहिमें पांच तत्त्व है सारा ॥
इनको बैठक आसन दीन्हा । अंड सिखर लोक तिन्ह कीन्हा ॥
प्रेम सुरति तिन कीन उपचारा । तिन्हते भयो अच्छर विस्तारा ॥
अच्छर सुरत तब मोहमें आई । ताते अंस चार निरमाई ॥
चारिअंस भये चारि परकारा । चौविध दीप चौविधहि पसारा ॥
प्रथम अंस पर माया भयऊ । सो पिरथी तत्त्व बीज निर्मयऊ ॥
दुसरे कूर्म भये अवतारा । पालङ्ग अठानवे कीन्ह विस्तारा ॥
तिसरे अदली अंस निरमावा । सेसनाग सो नाम धरावा ॥
चौथे अंस भए धरमराई । जिन्ह पाप पुण्यको लेखा पाई ॥
चारि अंस अच्छर ते भयऊ । चार अंस चार मत ठयऊ ॥
तब समरथ अनिगति यक कीन्हा । पूरी नींद अच्छरको दीन्हा ॥
चौसठ जुगलौं सोय सिराई । तौलौं कैल सुरत ठहराई ॥
समरथ सुरति जल तत्त्व समानी । कैल अंड कीन्हा उत्पानी ॥
तेहि पीछे अक्षर पुनि जागा । मोह तत्त भये अनुरागा ॥
चक्रित होय अच्छर बिलखाना । सोई मोह सब स्लिस्ट समाना ॥
अंड स्लिस्टमें देखा भाई । व्याकुल भए यह किन निरमाई ॥
समरथ छाप अंड सिर दीन्हा । अच्छर छापदेखि सो लीन्हा ॥
सोई अंड जलमें बिहराना । जिनको वेद नारायण माना ॥
ताते जोत निरंजन भयेऊ । तिनको सब जग करता कहेऊ ॥
अच्छर सुरति समरथकी बानी । तेहि गुण खेल भए उत्पानी ॥
निरंजन नाम अच्छर ठहराई । अर्चित भेद नहिं पावै भाई ॥
कैलिहिं देखा सकल पसारा । तब अच्छर सो वचन उचारा ॥
देउ पिता मोहि आग्या सोई । जो कछु इच्छा उपज्यो मोई ॥
सेवा करत सत्तर जुग बीता । तब मुख बोलै पुरुष अतीता ॥
जाव पुत्र जहां प्रिथ्वीको मूला । तहां कूरम बैठे अस्थूला ॥
सृष्टि भंडार कूरमको भाई । सोलह माथ हथ चौसठ पाई ॥
चले निरंजन कुरम लगि आये । पुरुष ध्यानसे कुरम जगाये ॥
उत्पति हमकूं मागे देह । ना देहो तो मारिकै लेहैं ॥
तर्वाहि कूर्म अपने मन मानी । ऐतो कैल भयो अभिमानी ॥
हम माँगे कछु देब न भाई । जाउ पुरुष लगिवेगि सिध्दाई ॥
कैल कूर्मते युद्ध निर्मयऊ । माथा तीनछीन पुनि लयऊ ॥
लेकर माथै सुन्यमें आवा । कैल सुरत घट मोह समावा ॥
तीनों माथे भच्छ तब लीन्हा । तबते अच्छर पुरुष डर कीन्हा ॥
मनमें तब अभिमान समाई । त कर जोरिके सेवा लाई ॥
सोला चौकडी जब चलिआई । तब लगि निरंजन सेवा लाई ॥
अच्छरपुरुष जो कीन्ह विचारा । तिन्हको समरथ वचन उचारा ॥
विदेह बानि तब अच्छर पाई । तो बानी कन्या भइ भाई ॥
ताको बहुत सिखापन दीन्हा । अस्तंगी तिन कन्या कीन्हा ॥