कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तान्त निरंजनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार
साधुओंने भोजन किया, स्वयम् श्रीकृष्णजीने भी भोजन किया और अनेक प्रकारके दान पुण्य हुए किन्तु उससे यज्ञ पूरा नहीं हुआ और न आकाशमें घण्टाही बजा । परन्तु जब श्वपच सुदर्शनने भोजन किया, तब सात बार आकाशमें घण्टा बजा और पाण्डवोंका यज्ञ पूरा हुआ । इस श्वपच सुदर्शनका वृत्तान्त आगे लिखूंगा ।
अथ कलियुगका प्रमाण ।
द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेतानेकी कथा । (अनुराग सागर)
तीन जुगके सुना परभाऊ । अब कहिये कलजुगका दाऊ ॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परवीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पति नागर ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
धर्मनि पुनि आये जगमाही । रानी पति लै गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । कछुक दिन रहे पुरुष दरबारा ॥
जबे पुनि कलिजुग नियराना । धरभराय तबहीं बरियाना ॥
पुरुष अवाज उठी तेहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥
तब चले हम मस्तक नायी । द्रापरगत कलि जुग नहिं आयी ॥
परथमहि पुरुष नाम गोहराई । कासीनगर महाँ दीना पाई ॥
पुरुष आयुस पाइ तेहि बारा । ततछिन पुनि आयउ संसारा ॥
कासी नगर तहां चलि आये । नाम मुदरसन सुपच जगाये ॥
श्वपच सुदर्शनकी कथा ।
नाम मुदरसन सुपच रहाई । ताकहैं हम सत सबद दिढाई ॥
सबद विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि सब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मांन तिन्ह मोरा । लखी परतीत बंद तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुगति संदेशा । मेटचो सकल काल कलेसा ॥
सबद ध्यान तेहि दीन्ह दिढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई ॥
सतगुरु भगति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई ॥
तात मात तेहि हरष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा ॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । बिनु परिचय जिव जमको चेरा ॥
मातु पितु देखे हरखाई । पान नाम हमरो नहिं पाई ॥
भगति देख हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाई ॥
अधिकता, अहिंसक सुखी हैं
परगट देख चीन्हे नहि मूढा । परे कालके फन्द अगूढा ॥
जैसे स्वान अपावन रंवेउ । तिमिजगअमीछोडिविषखांचेउ ॥
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिनपुनिकीन्हजग्यको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते जग्य रचन चित दीन्हा ॥
क्रिस्त केर जब आज़ा पाई । तब पांडव सब साज मंगाई ॥
जग्यकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हंकारी ॥
पांडव प्रति बोले जदुपाला । पूरण जग्य जान तिहि काला ॥
घंट अकास बजत सुनि आवे । जग्यको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी बैरागी झारी । आये ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सर्बहि जेवाई ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घंट नहि बाजा राय लजावा ॥
जबही घट न बाज अकासा । चकित भयो राय बुद्धि नासा ॥
भोजन कीन सकल रिषिराया । बजा न घंटा भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहि क्रिस्त पहुँ गयऊ । मन संसय करि पूछत भयऊ ॥
युधिष्ठिर वचन ।
करिके किरपा कहो जदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥
कृष्ण उत्तर ।
क्रिस्त अस कारन तासु बताया । साधू कोई न भोजन पाया ॥
यधिष्ठिर वचन ।
चकित हो तब पांडव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले जदुनाथा ॥
कृष्ण वचन ।
सुपच सुदरसनको लै आवो । आदर मान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहि कोई । पूरन जग्य जाहिते होई ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
क्रिस्त आज़ा जब अस पयऊ । पांडव तब ताके ढिग गयऊ ॥
सुपच सुदरसन को लै आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाँये ॥
भूप भवन भोजन कर जबहीं । बजा अकासमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भगत जब आस उठावा । बाजो घंट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नास जम हाट बिकानी ॥
भगत जीव कहैं काल सताये । भगत अभक्त सबन कहैं खाये ॥
हैयताका कारण, भ्रष्ट करनेवाला, रक्त- पातका काल, हत्याका प्रायश्चित्त
क्रिस्न बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बन्धु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहि जग्य करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजी हिमालय तिन्हें गलावा ॥
चार बन्धु सह द्रोपदि गलेऊ । उबरे सत्य जुधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस् कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरिचन्द्र करन बड दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आसा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जानि जिव आसा लावें । आसा बांधि काल मुख जावें ॥
सब कहैं काल नचावे नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं वाचा ॥
जो रच्छक तेहि खोजे नाहीं । अन चीन्हें जमके मुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
अस जम बुद्धि हरी सबकेरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य सबद कोई परखे नाहीं । जमदिसि होय लरै हम पाहीं ॥
जब लगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जनम भरन नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जायी । क्रित्रिम नामते जम धरि खायी ॥
पुरुष नाम परवाना पावे । कालहिं जीत अमर घर जावे ॥
छंद—सत नाम परताप धर्मनि, हंसलोक सिधावई ।
जन्म मरनको कष्ट मेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥
पुरुषकी छवि हंस निरखहिं, लहे अति आनंद घना ।
अंशहंस मिल करे कुतूहल, चंद्रकुमुदिनि सँग बना ॥
सोरठा—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हरषई ।
तैसइ हंस सुख पाव, पुरुष दरसके पावत ॥
नहीं मलीन मुख भाव, एकप्रभाव सदा उदित ।
हंस सदा सुख पाव, सोक मोह दुख छनक नहिं ॥
जबै सुदरसन ठेका पूरा । ले सत लोक पठाया सूरा ॥
मिले रूप सोभा अधिकारा । अरु हंसन संग कुतूहल सारा ॥
षोडस भानुरूप तब पावा । पुरुष दरस सो हंस जुडावा ॥
उस कालमें एक तो श्वपचसुद'शॉन और दूसरे शिष्य गरुडजी हुए । ये
हिंसकोंके मारनेका कारण, सबसे हिंसक और अहिंसक, पापी और कृत-कृत्य, डखलाकी असूल, नूकितके अधिकारी
दोनों शिष्य बड़े प्रसिद्ध हुए और तीसरे दुर्वासा ऋषि । इन तीनोंकी खबर मुझको है और इनके अतिरिक्त जो और चले कबीर साहबके उस समयमें हुए उनका वृत्तान्त मुझको मालूम नहीं हैं । उस समय कबीर साहब कृष्णजीको और सहस्रों ऋषयों मुनियोंको उपदेश देते फिरे, जिसने आपका उपदेश सुना और कहना माना, वह परमधामको पहुँचा और जिसको विश्वास नहीं हुआ वह कालका भोजन बना ।
दूसरीबार कलियुगमें कबीर साहबके पृथ्वीपर प्रगट होनेका वृत्तान्त ।
धर्मदास बचन ।
हे साहिब इक विनती मोरी । खसम कबीर कहु बंदीछोरी ॥
भगत सुदरसन लोक पठाया । पाछे साहिब कहां सिधाया ॥
सो सतगुरु मुहि कहो संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥
कबीर बचन ।
अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसो कहों आगल व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलिजुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धरमराय कहैं देखो आई । मोहिं देखि जम गयो मुरझाई ॥
धर्मराय बचन ।
कहे धरम कस मोहिं दुखावहु । बच्छ हमार लोक पहुँचावहु ॥
तीनों जुग गवने संसारा । भवसागर तुम मोर उजारा ॥
हार वचन पुरुष मोहि दीन्हा । तुम कस जीव छुडावन लीन्हा ॥
और बन्धु जो आवत कोई । छिनमहैं ता कहैं खात बिलाई ॥
तुमते कछू न मोर बसाई । तुम्हरे बल हंसा घर जाई ॥
अब तुम फिर जाहु जगमाहीं । शब्द तुम्हारा सुनै कोउ नाही ॥
करम भरम हम उसकें ठाटा । जात कोइ न पावै बाटा ॥
घर घर भरम भूत उपजावा । धोका दै दै जीव नचावा ॥
भरम भूत हो सब कह लागे । तोहि चिन्है ताकहैं भ्रम भागे ॥
मद्य मांस खावैं नर लोई । मद्य मांस प्रिय नरको होई ॥
आपन पंथ मैं कीन परगासा । मांस मद्य सब मानुस ग्रासा ॥
चंडी जोगिन भूत पुजाओ । यही भरम महैं जग जहैं डाओ ॥
बांधि बहु फंदहि फंद फंदाओ । अंत काल कर सुधि बिसराओ ॥
तुम्हरी भगति कठिन है भाई । कोई न मनिहैं कहैं बुझाई ॥
यूरोपके विद्वानोंकी संमर्तियाँ, मिस्टर लार्ड- वक और मिस्टर गॉजिज़्ज़ाल्ट
ज्ञानी वचन ।
धरमराय तें बहु छल कीन्हा । छल तोहार सकलो हम चीन्हा ॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहिं जो आज्ञा देहीं । तो सब जिव होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चैताऊँ । अंकुरी जीत सकल मुकताऊँ ॥
कोटी फंद जो तुम रचि राखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रगट कला जो धरी जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अडोल अमोलै ॥
जो जियरा सुभ अंकुरी होई । सब्द हमार मानी है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मकताओं । फंदा काटि लोक ले जाओं ॥
काटि भरम जा दैहों ताही । भरम तुम्हारा मानि हैं नाहीं ॥
छन्द-सत्य शब्द दिडाम सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहैं ।
छल तोर सब चिन्हाइ तबहीं, नाम बल जिय तारिहैं ॥
मन वचन सत्य जो मोहि चीन्हि, एक तत्त्व लौ लाइहैं ।
तब सीस तुम्हरे पांव देइहैं, अमल लोक सिधाइहैं ॥
सोरठा-मर्दहिं तोरा मान, सूरा हंस सुजान कोइ ।
सत्य शब्द सहिदान, चीन्हहि हंस हरष अती ॥
धर्मराय वचन ।
कहै धर्म जीवन सुखदाई । वात एक मुहिं कहो बुझाई ॥
जो जिव रहै तुम्हरो लौ लाई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
दूत हमार ताहि नहिं पावे । मुरछित दूत मोहिं पहैं आवे ॥
यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥
ज्ञानी वचन ।
सुनहु धरम जो पूछहुँ मोही । सो सब हाल कहौं मैं तोही ॥
सुनहु धरम तुम सत सहिदानी । सो तो सत्य शब्द आहि निरबानी ॥
पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रगट नाम सत हंस बखाना ॥
नाम हमार हंस जो गहई । भवसागरसे सो निरबहई ॥
दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥
धर्मराय वचन ।
कहै धरम सुनु अन्तरजामी । कृपा करहु अब मोपर स्वामी ॥
यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥
समीक्षा, प्रकृति वैपरीत्य, बेजिटेरियन
बीरा अंक गुप्त मन भाऊ । ध्यान अंग सब मोहि बताऊ ॥
केहि कारन तुम जाहु संसारा । सोई कहहु मोहि भेद गुन न्यारा ॥
हमहूँ जीवन सब्द चितायब । पुरुष लोककहँ जीव पठायब ॥
मोहि दास आपन कर लीजै । सब्द सार प्रभु मोकहँ दीजै ॥
ज्ञानी बचन ।
सुनहू धर्म तुम कस छल करहू । परगट दास गुप्त छल धरहू ॥
गुप्त भेद नहि देहौं तोहीँ । पुरुष अवाज कही नहि मोहीँ ॥
नाम कबीर मोर कलिमाहीँ । कबीर कहत जम निकट न जाहीँ ॥
धर्मराय बचन ।
कहै धरम तुम मोहिं दुरैहो । खेल एक पल हमहूँ खेलैहो ॥
ऐसी छल बुधि करब बनाई । हंस अनेक लेब संग लाई ॥
तुम्हार नाम ले पंथ चलायब । यहि विधि जीवन धोख दिखायब ॥
ज्ञानी बचन ।
अरे काल तू पुरुष द्रोही । छलमति कहा सुनावसि मोही ॥
जो जिव होइ है सब्द सनेही । छल तुम्हार नहि लागै तोही ॥
जौहरी हंस लहिं पहिचानी । परखिहँ ज्ञान ग्रन्थ मम बानी ॥
जेहि जीव मैं थापब जाई । छल तुम्हार तेहि देव चिन्हाई ॥
कबीरबचन धर्मदास प्रति ।
यहि सुनि धरमराय गहु मौना । ह्वै अन्तरधान गयो निज भौना ॥
धर्मनि कठिन काल गति फन्दा । छलबुध कै जीवन कहँ फन्दा ॥
तीसरा प्रकरण ।
जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका ।
जब कृष्णजी महाराजका शरीर छूटा तब आपकी स्थापना जगन्नाथजीमें हुई ! उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था । उस राजा इन्द्रदमन को जगन्नाथजीने स्वप्न दिखलाया कि, तू मेरा मन्दिर उठा । जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर बनकर तय्यार हो गया तब समुद्र महा वेगसे लहरें मारता हुआ आया और मन्दिरको ढहाकर समेट ले गया और भूमि बराबर हो गयी । इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया, फिरभी उसकी वही दशा हुई । फिर बनवाया फिर वही दशा हो गयी । इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको पूर्ण होने नहीं दिया । तब राजाने दुःखित होकर उसका बनवानाही छोड़ दिया ।
रालिन्ससाहब, प्रोफ़ेसर फ़ाक्स साहब, डाक्टर नैम्ब, कतिपय चिह्न
चौथा प्रकरण ।
कबीर साहबके जगन्नाथ स्थापनाकी कथा ।
इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया । जैसा कि, मैं इतः पूर्व निरञ्जन और कबीर साहबकी गोष्ठीमें लिख गया हूँ कि, निरञ्जनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि, जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा, तब समुद्र मेरे मन्दिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटाकर और मेरे मन्दिर को स्थापित कर देवें । तब आप वचनबद्ध हुए थे कि मैं तुम्हारा मन्दिर स्थापित कर दूंगा और समुद्रको हटा दूंगा उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आ उत्तरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले कि, हे राजा ! आप जगन्नाथके मन्दिरको बनाओ । तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज ! समुद्र मंदिरको बनने नहीं देता, मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाकर तय्यार प्रस्तुत करता हूँ तब वह आकर ढा जाता है, मैं क्या करूँ ? तब कबीर साहबने कहा कि, हे महाराज ! मैं इसी प्रयोजनसे आपके निकट आया हूँ । अब आप प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वार बनवाओ मैं समुद्रको हटा-दूंगा, अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा । तब राजाने पुनः मन्दिरके बनवानेका प्रबन्ध किया और मन्दिर तय्यार होने लगा । कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर आसा'को अपने सामने लगा और समुद्रकी ओर मुंह करके बैठ गये । उधर ठाकुरका मन्दिर बनकर तय्यार होनेके समीप आ गया । समुद्रने देखा कि, अब तो ठाकुरका मन्दिर पूर्ण होने पर आया है, तब बड़े वेगसे दौड़ा । उसकी लहरें आकाशको उड़ीं । जब वह लहरें मारता कबीर चबूतरेके समीप पहुँचा, तब सामने कबीर साहबको बैठे देखकर ठहर गया, आगेको बढ़ नहीं सका । फिर ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दंडवत् प्रणाम करके निवेदन किया कि, ऐ महाराज ! मैं तो ध्रोखेसे आया और जगन्नाथका मंदिर ढाहना चाहता । किन्तु सामने तो आप बैठे हैं मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, आगे बढ़ सकूँ । आप न्यायकर्ता हैं मेरा न्याय कीजिये । तब कबीर साहबने कहा कि, हे जलधे ! मैं तुम्हारा हाल जानता हूँ—परन्तु अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो । मैं तुमको इस मन्दिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ,
१ आसाका दूसरा नाम योगदण्ड हठयोगी लोग सुमेरको सीधा रखने अथवा श्वास बदलनेके लिये रक्खा करते हैं ।
मस्तिष्कके बलकी अपेक्षा, स्वभावका परिवर्तन, प्रकृतिका नियम
तुम जाकर उसको ले लो । तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया । तबतक उधर जगन्नाथजीका मन्दिर बनकर पूरा हो चुका ।
जगन्नाथ मन्दिरकी स्थापनाका वृत्तान्त । (अनु०)
धर्मदास बचन ।
कह धर्मनि प्रभु मोहि सुनाओ । आगलचरित्र कहि समझाओ ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रनि ।
राजा इन्द्रदमन तेहि काला । देश उड़ैसे को महिपाला ॥
सतगुरु बचन ।
राजा इन्द्रदमन तहैं रहई । मंडपकाज युगति सो कहई ॥
क्रिस्त देह छांडी पुनि जबही । इन्द्रदमन सपना भा तबही ॥
कृष्णका इन्द्रदमन राजाको सपना देना ।
स्वप्नेमें हरि अस ताहि बताई । मेरो मन्दिर देहु उठाई ॥
मोकहैं स्थापन कर राजा । तोपहैं मैं आयउ यहि काजा ॥
राजा यहि विधि सपना पाई । ततछन मण्डप काम लगाई ॥
मण्डप उठा पूरन भा कामा । उदधि आय बोरा तेहि ठामा ॥
जब जब मन्दिर लाग उठावे । क्रोधवन्त सागर तब धावे ॥
छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथ को मन्दिर तोरे ॥
मंडप सो षट बार बनायी । उदधि दौर तिहि लेत डुवाई ॥
हारा नृप करि बहुत उपायी । हरिमन्दिर तहैं उठै न भाई ॥
मन्दिरकी यह दशा विचारी । वर पूरब मनमांहि सम्हारी ॥
हम सन काल मांग अन्याई । बाचा बन्ध तहां हम जायी ॥
आसन उदधि तीर हम कीन्हा । काहू जीवन मोही चीन्हा ॥
पीछे उदधि तीर हम आई । चौरा तहां बनायउ जाई ॥
इन्द्रदमन तब सपना पावा । अहो राय तुम काम लगावा ॥
मंडप शंक न राखो राजा । इहैंवा हम आये यहि काजा ॥
जाहु वेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानहु बचन हमारा ॥
राजा मंडप काम लगायो । मंडप देखि उदधि चलि आयो ॥
सागर लहर उठी तिहि बारा । आवत लहर क्रोध चित धारा ॥
उदधि उमंग क्रोध अति आवे । पुरुषोत्तम पुर रहन न पावे ॥