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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

सनकादि और कबीर, कबीरजी और ऋषभ नाथ, कबीर और भुशुण्डि कबीर और राजा जनक

चुन चुन फूलों सेंज बिछाई कलियाँ न्यारी न्यारीका ।
सो अब शयन करें धरतीमें कंकर नहीं बोहारेका ॥
जिनके सङ्ग कटक दल बादल झण्डा न्यारे न्यारेका ।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो फक्कड़ हुआ आखाड़े का ॥ सुलताना०

इस बादशाहको कबीर साहबने अनेकों उपदेश दिये । बहुतेरे कौतुक दिखाये (जो भिन्न भिन्न पुस्तकोंमें पाये जाते हैं) बादशाहके मनमें संसारकी बड़ीही घृणा होगई । चाह्ता कि, बादशाहतको छोड़कर कहीं वनमें चला जाऊँ । इस बातका दृढ़ संकल्प उसने कर लिया । उसके आत्मसम्बन्धी अमीर बजीर और सब कर्मचारियोंने इसे घेर लिया समस्त सैन्यमें हल्ला मच गया कि, सुलतान फकीर होता है । जब सभोंने बादशाहको घेर लिया तब वह बड़ाही विवश हुआ । इसी घेर घारमें आधीरात बीत गई । जब आधीरात हुई तब सब मनुष्य और सब चौकीदार अचेत होकर सो रहे । उस समय बादशाहने अच्छा और समझा । नङ्गे पैर बाहर आकर अपनी सैन्य तथा आदमियोंसे दूर निकलके एक बड़े भारी मैदानमें पहुँचा जहाँ कि किसी आदमीका चिह्न भी नहीं था । उधर बादशाहके नौकर चाकर तथा आत्मसम्बन्धीगण जब जागे तब बादशाहको चारों ओर दूढ़ने लगे; पर कहीं पता नहीं लगा । तब निराश हो गये समस्त देशमें हाहाकार और शोक पड़ गया इधर बादशाहको तीन दिन भूखे बीत गये उस समय स्वयम् साहब बादशाहके निमित्त रूखा सूखा टुकड़ा लेकर सामने आये । वही रूखा टुकड़ा बादशाहने तीन दिवसके उपरान्त खाया परमेश्वरको धन्यवाद देकर पक्का फकीर हो गया । इस बादशाहको जब जब कबीर साहब मिलते थे तब तब न्यारे न्यारे स्वरूपोंमें दिखाई देते थे कि, वह और तो क्या पहचान भी नहीं सकता था ।

इसका वृत्तान्त मुसलमानी पुस्तकोंमें स्थान स्थानपर लिखा है । एक पुस्तकमें मैंने देखा था कि, इस बादशाहको पकड़कर लोगोंने एक अमीरकी बागवानी (माली) के काममें लगा दिया । एकवर्ष पर्यन्त आप बागवानी करते रहे । एक दिवस वह अमीर अपनी बाटिका देखने गया तब जैसा बागवानोंका नियम है बागके फल अनार इत्यादि लेकर उन्होंने उस अमीरकी भेंट किये । जब उसने अनारोंका चक्खा तो, सभीको खट्टा पाया । तब उसने कहा कि, कौसा बागवान है कि, मेरे निमित्त सब खट्टे अनारोंको उठा लाया । फकीरी भेषमें बने हुए बादशाहने उत्तर दिया कि मुझको खट्टे मीठेका ज्ञान नहीं है । क्योंकि, मैंने कभी चक्खा नहीं था । अमीरने पूछा कि तू कितने दिवसोंसे

बागवानी करता है । उन्होंने उत्तर दिया कि एक वर्ष हुये । तब अमीर आश्चर्यित हुआ कि यह कौन मनुष्य है कि, जो बरस भरसे बागवानी करता है, परन्तु बागका कोई फल नहीं खाया ऐसा ईमानदार यह कौन है । जब भली-प्रकार जाँच किया लोगोंने पहचाना तो कहा कि यह तो सुलतान इबराहीम अद्वम है । वह अमीर नितान्तही लज्जित हुआ हाथ बाँधकर अपना अपराध क्षमा कराने लगा, पर वे तो हँसकर कहोंके कहों चल दिये ।

एकबार इबराहीम अद्वमका बेटा जो सिंहासनरुद्ध था, रातके समय नदीके किनारे आनन्द विलास कर रहा था, नावें नदीमें चलाई जाती थीं खूब प्रकाश होरहा था, नाच तमाशा तथा ठट्ठा मसखरीमें लोग लगे हुये थे उस समय फकीरीकी अवस्थामें बादशाह इबराहीम अद्वम चले जाते थे । लोगोंने पागल समझकर उनको पकड़ लिया । रातभर ठट्ठा मसखरी करते रहे । जैसे होलीके भड़डवे होते हैं वैसाही ठट्ठा उनके साथ होता रहा, उन्होंने किसी प्रकारका अवरोध नहीं किया । जब प्रातःकाल हुआ सब लोगोंने पहचाना कि, यह तो हजरत हैं । तब बादशाहका जो पुत्र था वह देखकर बड़ा दुःखी होकर कहने लगा कि, पिताजी ! आपने अपनी कैसी बुरी दशा बनाली है, आप पागलोंके समान फिरते हैं । मैं इतना बड़ा बादशाह हूँ कि, जो चाहूँ सो करूँ, समस्त देश मेरे वशमें हैं, आप जो कहें सो मैं करूँ मेरे वशमें सब हैं । इबराहीम अद्वमने अपनी गुदडी सीनेवाली जो सूरई थी नदीमें फँकदी और अपने पुत्रसे कहा कि तू कहता है कि, मैं बड़ा बादशाह हूँ तो मेरी सूरई मँगवादे । शाहजादेने कहा कि, मैं सहस्रों सूरईयाँ मँगवाये देता हूँ । बादशाहने कहा कि, मैं तो अपनीही सूरई लूंगा तब शाहजादेने जाल डलवाए और बहुत ढुँढवाया पर वह सूरई नहीं मिली । तब इबराहीम अद्वमने कहा कि, हे नदी ! तू मेरी सूरई दे । उस समय नदीसे एक मछली वह सूरई मुंहमें लिये उनके पास आई, उनने अपनी सूरई लेली । शाहजादेसे कहा कि, देख, तेरी आज्ञा बढ़कर है, अथवा मेरी, तेरी आज्ञा तेरे देशमात्रमें है । मेरी आज्ञा नदी, पर्वत आदि जड़ चेतन स्थावर जंगम सभी मानते हैं ।

शेख मन्शूर और शिवली ।

जहाँ प्रेम और उसकी दृढ़तापर मर मिटनेवाले इस्लामी सम्भ्यताके सुयोग्य पुरुषोंका प्रसंग आता है तो उनमें शेख मन्शूरका सादर स्मरण हो आता है । अनल हक—‘अहं ब्रह्मास्मि’ का यह दृढ़ विश्वासी था, यद्यपि उस समयके इस्लामी कानूनोंके पंडितोंने ‘मैं खुदा हूँ’ यह कहनेके कारण उन्हें मारने योग्य

कहकर अपना फँसला देदिया था, पर कोई भी न तो इनके सामनेही ठहर सका था एवं न इनकी धारणाही बदल सका था। ये आज कलके रंगेश्वरोंकी तरह अनलहकके भक्त नहीं थे किंतु इनकी यह वानि सच्चे भावोंको लिये हुए थी। कँद हो जाने पर जो२ करामातें इन्होंने दिखाई थीं वह बड़ेसे बड़े सिद्ध पुरुषोंसे किसी प्रकार भी कम नहीं थी। मन्शूरके मुखसे ही नहीं किन्तु प्रत्येक रोमसे अनलहककी ध्वनि निकलती थी। शूली पर चढे पीछे खूनकी बूँदें भी अपने आन 'अनलहक' लिखती चली गईं। जलानेपर धूआँ भी वही बनकर उड़ा, तथा खाक भी नदीमें 'अनलहक' होकर ही बही। ये सिद्ध थे जैसे इन्होंने अपनी सिद्धिके प्रभावसे जैलकी दीवारोंको गिराकर सभी कैदियोंकी एक साथ बेडी काटकर उन्हें भगा दिया था उसी तरह आप भी अलक्ष्य हो जाते किन्तु अलक्ष्य होने पर इन्होंने इसीमें प्रेम और भगवानके नामका बड़ाई देखी इस कारण अपने नश्वर शरीर को शूलीके घाटपर उतार दिया।

जब कभी किसीको कोई प्रेमकी आखिरी मंजिल दिखाता है तो कहता है कि—

“खड़ा मन्शूर शूलीपर पुकारे इश्क बाजोंको है।

इश्के बामका जीना वों जीले जिसका जी चाहें॥

मन्शूर शूलीपर खड़ा हुआ पुकार २ कर कह रहा है कि, यह इश्कके ऊपरका जीना है। जिसमें सामर्थ्य हो वो जीले। किसीने परमात्माको उपालब्ध देते हुए उसीके लिये लिखा है कि—

तोडा है कोहेकनका शर पत्थरोंसे किसने।

मन्शूरको 'अनलहक' किसने कहाके मारा ॥

हे परमात्मन् ! यह तो बता कि, कोहकनका शिर किसने पत्थरोंसे तोडा था तथा यह भी बता कि, किसने मन्शूरके मुखसे 'अनलहक' कहलवाकर मौतके लिये भेजा था।

निर्भयदासजीने भी सच्चे वेदान्ती मन्शूरको बड़े सम्मानके साथ याद किया है कि—

जबतक जिन्दा रहा अनलहक कहता रहा शूलीपर भी कहे बिना नहीं माना क्योंकि, सनमका सच्चा प्यार पाना आसान नहीं है। किसी किसी बीरने तो इनकी फाँसीको किसी और ही रूपमें वर्णन किया है कि—

किया अच्छा जिन्होंने दारपर मन्शूरको खींचा।

कि था मन्शूरका जीना भी मुशकिल राहेदाँ होकर ॥

इनकी एक संप्रदाय इस्लामी समाजमें मौजूद है। इनकी अनेकों वाणी हैं। इनपर भी कबीर साहिबकी पूरी कृपा थी। इन्हें ज्ञान तो यों हुआ कि, कबीर साहिबने इन्हें नामका उपदेश दिया। उन्होंने २० वर्षतक गुफामें बैठकर उसका ध्यान किया, गुफाके बाहिर आतेही लोगोंसे भेट हुई इनके वचन साधारण नहीं कबीर साहब कैसे हैं यही कारण है कि, लोग इनके प्राणोंके ग्राहक बने थे इनमें यह शक्ति थी, कि वैरियोंके आक्रमणके समय अन्तर्धान हो गये। फिर इन्हें कौन ढूंढ सकता था? कौन ऐसा महाबली इस पृथ्वीपर था जो कि उनको पकड़ सकता था। परन्तु वे परमेश्वरकी भी वैसेही इच्छा देखकर स्वयम् उपस्थित हो गये। अपनेको स्वयम् ही हत्यारोंके हाथों पकड़ा दिया। मुसलमानोंने देखा तो पत्थर मारने लगे। उस समय शेख मन्शूर प्रसन्नता पूर्वक सब कठिनाइयोंको सहन कर रहे थे, यहाँ तक कि, ईश्वरेच्छा समझकर आह भी नहीं करते थे। उस समय मुसलमानोंने शेख शिबलीसे कहा कि, तू भी इस पर पत्थर मार। शिबलीने कहा कि, यह तो मेरा गुरुभाई है मैं ऐसा कार्य कभी भी न करूँगा। मुसलमानोंने शिबलीको भी पकड़ लिया बहुत विवश किया कि, तू इस पर अवश्यही पत्थर मार। उन्होंने एक पुष्प लेकर मन्शूरके ऊपर चलाया। जब वह पुष्प लगा तब आप गिर पड़े पुकारने लगे कि हाय मैं मर गया ! हाय मैं मर गया ! मन्शूरकी हाय हाय सुनकर शिबली उनके पास गये। पूछा कि इतने पत्थर आप पर पड़े आपने हाय नहीं की। मेरे एक पुष्पसे ऐसे घायल हुए कि हाय हाय करने लेंगे यह क्या बात है? मन्शूरने कहा कि, हे शिबली ! तुम्हारे एक पुष्पने जितना मुझे घायल किया वैसे पत्थरोंने नहीं किया। क्योंकि तुम भली प्रकार जानते हो कि, मैं कौन हूँ? तुम मेरे गुरुभाई हो। यह बात प्रसिद्ध है। लोग ऐसा गाते भी हैं कि, “शिबलीने फूल मारा। मन्शूर हा पुकारा” मुसलमानोंने जब उनको मारनेके लिये पकड़ लिया उस समय शेख कबीर आ पहुँचे। शेख कबीरको मुसलमानोंने घेर कर कहा कि, आप इसके मारनेकी आज्ञा दीजिये। शेख कबीर मुसलमानोंसे अन्यान्य बातें करते समझा रहे थे। परन्तु मुसलमानोंने मिथ्याही यह बात उडाली कि, शेख कबीरने बध करनेकी आज्ञा देदी है। शेख मन्शूरको पकड़ कर सूली पर चढ़ा दिया। जिस समय शेख मन्शूरको सूली पर चढ़ाया उस समय पृथ्वी कांपने लगी, अँधेरा छा गया और प्रलयके चिह्न दिखाई देने लगे।

कबीरसाहेबकी - रेखता।

मालिन पुकारे हे पिया। हाय हाय साहब तू ने क्या किया।
इक बूँद लज्जत कारने मन्शूर सूली यों दिया।

सबही बराती सज चले हैं व्याह करन उस पीवका ।
पहिरे गुलाबी सेहरा संशय पडा उस जीवका ।
होली तमाशे हो रहे सब देखनेको जायँगे ।
पीयसे रँगौली हो रहो रङ्ग देखिके ललचार्यँगे ।
जल जलकी रोवें माछली बन बनके रोवे बोरवा ।
महलोंकी रोवें वीबियाँ अल्ला इलाही क्या किया ।
कायाके अन्दर खोजले छज्जेमें तेरा जीव है ।
कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुझही में तेरा पीव है ।

जब शेख मन्शूरको सूलीपर चढ़ाया, उस समय आकाश पाताल तथा पृथिवी पर शोक छा गया पर उन्होंने तो अपना मारा जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया । शेख मन्शूरका हाल संसारमें प्रसिद्ध है । तजकिरे मन्शूर नामक किताबमें भी विस्तारके साथ लिखा हुआ ।

गज्जल ।

चढ़ादार पर जब शेख मन्शूर । हुये उस वक्त सूरज चन्द बेनूर ॥
जमीं कौपी व कौपा आसमाँ भी । हुआ तब सारा आलम गमसे मामूर ॥
जमीं रोती व रोता आसमाँथा । बनी आदम मलायक गिरियः मेहूर ॥
उठा हजरत गजन्द आसेब सारा । दिया देह दुनिया पर उडा धूर ॥
यही खूबी है सदगुरु हंस आजिज । रजा रब्बानी तन मन धन हुआ दूर ॥

पश्चिम देशमें कबीर साहबके बहुतेरे शिष्य हैं । और उन देशोंमें कबीर साहब, सैयद अहमद कबीर शेख कबीरके नामसे प्रख्यात हैं। तथा बहुत स्थानोंपर कबीर साहबकी समाधि भी बनी हैं ।

तत्त्वा और जीवा ।

कबीर कसोटीमें लिखा है कि, तत्त्वा और जीवा नामक दो भाई जातिके ब्राह्मण दक्षिणदेश गुजरातमें नर्मदा नदीके किनारेपर रहकर साधुओंकी सेवा करते थे । उन्होंने बटकी एक सूखी लकड़ी ले अपने मकानके आँगनमें गाड़कर यह प्रण किया था कि, जिस साधुके चरणामृतसे इस बटकी सूखी लकड़ी हरी हो जावेगी हम उसीके शिष्य होंगे । चालीस वर्षतक सहस्रों साधुओंके चरण धो धोकर इस बटके सूखे ठूँठपर डालते रहे पर वह हरा नहीं हुआ । इससे उस देशमें साधुओंकी निन्दा तथा अप्रतिष्ठा होने लगी साधुसेवा बन्द हो चली । यह देख साधुओंने विचार किया कि, अब तो कबीर साहबके शरण चलना

चाहिये । उनके बिना, दूसरे किसीमें भी ऐसी सामर्थ्य नहीं है । कुछ साधु मिलकर दक्षिण देशसे काशीजीमें आये, कबीर साहबके पास जाकर सब वृत्तान्त इस प्रकार निवेदन किया कि, महाराज ! आपके होते हुये साधुओंकी इस प्रकार अप्रतिष्ठा होने लगी, अब कौनसी युक्ति करें ? कबीर साहब बोले कि—

साखी — कबीर, साधु हमारी आ'तमा, हम साधुनकी देह' ॥

साधुनमें यों रम' रहा, जो बादलमें मेंह' ॥

कबीर, साधु हमारी आतमा, हम साधुनके जीव ।

साधुनमें हूं यों रमूँ, ज्यो गोर'समें घी'व ॥

कबीर, साधुनमें हूँ यों रमूँ, ज्यों फूलनमें बा'स

साधु हमारी आत'मा, हम साधुनमें स्वाँस ॥

यह कहकर साधुओंको तो बिदा करके कहा कि, तुम लोग चलो हम पहुँचेंगे । वे साधु लोग बिदा होकर छः मासके उपरान्त वहाँ पहुँचे, जहाँ कि, वह बटका सूखा ठूँठ गड़ा था । वहाँ जाकर देखा तो क्या देखते हैं कि, कबीर साहब पहलेहीसे उस बटके सूखे ठूँठके सामने टहल रहे हैं । उन साधुओंने उन्हें देखकर दण्डवत् प्रणाम किया । उन दोनों भाइयोंने कहा कि, अब तुमलोग कबीर साहबके चरण धोकर चरणामृतको इत वृक्षपर डालो । उन दोनोंने वेंसाही काम किया । जैसेही साहबके चरणका जल उस ठूँठे वृक्षपर पड़ा वैसेही तुरन्त उस ठूँठमें से हरी डाल निकल पड़ी उसी समय वह वृक्ष हराभरा होकर लहलहाने लगा । उससे बहुतसी डालियों फूटकर निकल पड़ीं । वे दोनों भाई सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर शिष्य हो गये । कबीरके सोटीमें इस प्रकरण पर एक दोहा लिखा है कि—

तत्त्वा जीवाको मिल, दक्षिण बीच दयाल ।

सूख ठूँठ हरा किया, ऐसे नजर निहाल ॥

पर उन दोनों ब्राह्मणोंका कार्य सम्पूर्ण कर एवं उनको भली भाँति उपदेश देकर कबीर साहब पुनः काशीको लौट आये ।

दक्षिण देशीय ब्राह्मण जातिका अभिमान कुछ विशेष रखते हैं । इस लिए जब तत्त्वा जीवा ब्राह्मणोंके लडकी लडके विवाह योग्य हुये तब उन्होंने चाहा कि, उनका विवाह करें । उस समय उनके सजातीय कहने लगे कि, तुमने तो कबीर साहबको अपना गुरु बनाया है, हम तुम्हारे साथ सम्बन्ध नहीं करेंगे । वे दोनों ब्राह्मण सत्यगुरुसे आकर निवेदन करने लगे कि, हे सत्यगुरु ! अब हम क्या करें ? हमारे भाई बिरादरीके लोग तो हमसे ऐसा व्यवहार करने लगे कि,