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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

दुःखितजीवोंकी पुकार व सत्यपुरुषकी गौहार

ब्रह्मावचन ।

कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देख इन आँखी ॥

अद्यावचन गायत्री प्रति ।

तब माता बूझे अनुसारि । कहु गायत्री वचन विचारी ॥

तुम देखा इन दरसन पावा । कहो सत्य दरसन परभावा ॥

गायत्रीवचन ।

तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दरस सीस पितु पावा ॥

मैं देखा इन परसेउ सीसा । ब्रह्महि मिले देव जगदीसा ॥

छन्द-लेइ पुहुप परसेउ सीस पितु इन द्विष्टि मैं देखत रही ।

जल ढार पुहुप चढाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥

पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥

इनहु दरसन लह्यो पितुको पूछहू इहि वामते ॥ २६ ॥

हो जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ।

सबही साँच मैं तोसो कहूँ नहि झूठ है एको रती ॥

अद्यावचन पुहुपावती प्रति ।

माता कह पुहुपावतीसो कहो सत्यहि मो सना ।

जो चढे सीसहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना ॥ २७ ॥

सोरठा-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथा निरवारके ॥

यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥ १७ ॥

सावित्रीवचन ।

पुहुपावती बेचन तब बोली । माता सत्य वचन नहि डोली ॥

दरसन सीस लह्यो चतुरानन । चढेसीस यह धर निश्चय मन ॥

साख सुनत अद्या अकुलानी । भाअचरज यह मरम न जानी ॥

अद्याकी चिन्ता

अलख निरंजन अस प्रण भाखी । मोकहैं कोउ न देखै आँखी ॥

ये तीनहुँ कस कहहि लबारी । अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥

ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन । ध्यान माहिँ अस कह्यो निरंजन ।

निरञ्जनवचन ।

ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठि साखि इन आय दिवाया ॥

तीनो मिथ्या कहे बनाई । जनि मानहु यह है लबराई ॥

अद्याका ब्रह्माको शाप देना ।

यह सुनि माता कीन्हें दापा । ब्रह्मा कंहैं तब दीन्हो सापा ॥
पूजा तोरि करै कोइ नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे होइ जो साख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहि बहु नेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विस्नु भक्तसों करहि हँकारा । ताते परिहैं नरक मँझारा ॥
कथा पुराण औरहि समुझैं हैं । चाल बिहून आपन दुखपैहैं ॥
उनसे और मुनै जो ज्ञाना । करि सो भगति कहां परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटैहैं ॥
जा कह शिक्ख करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार अर्थ सबै समुझैहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान मुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिदैहैं ॥
आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथके निकट न जायी ॥
आप ऊँच औरहि कंहैं छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूरछि मही कर धारा ॥

अद्याका गायत्रीको शाप देना ।

गायत्री साप्यो तिहि वारा । हुइहै तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होइ वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥
धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम वचन सुनायी ॥
निज स्वार्थ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥
मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितबन कीन्ही ॥

अद्याका सावित्रीको शाप देना ।

पुहुपावति निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नसायेहु ॥
सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विस्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥
होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥
जो तोहिं सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । क्योडा केतकी नाम तुम्हारा ॥