मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
६८ मनुस्मृति ।
नाम-रूप-लिङ्ग की उपबृंहक श्रुतियां—
“अथ यो ह खलु वा वास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं
ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वा वास्य तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं
रुद्रः, अथ यो ह खलु वा वास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं
विष्णुः” इति मैत्रेयोपनिषत् ।
“उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं
त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं
समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥”
कैवल्योपनिषत् ।
“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां
हैमवतीं ताँह् होवाच किमेतद् यक्षमिति ।”
सामवेदीय-तलवकारोपनिषत् ।
“तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ॥
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसितरसे नमः ॥”
नारायणोपनिषत् ।
इत्यादि ।
पदार्थ के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप अवस्था भेद के अनु-
सार परमेश्वर के ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप अवस्था भेद वेद-दृष्टि
१ ‘त्र्यम्बकं यजामहे—’ (य० ३ । ६१) इत्यादि ।
२ ‘नीलग्रीवः—’ (य० १६ । ७) इत्यादि ।
३ ‘या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाह भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥’
(य० १६ । ४६)
४ अन्य देवताओं के आकार के विषय में एवंविध मन्त्रलिङ्ग चारो वेद की
मन्त्रसंहिताओं में तथा तैत्तिरीयमन्त्रसंहिता में नहीं प्राप्त होते (एक बार तो
पढ़ देखिये)।
भूमिका । ६६
`से उत्पन्न हुए; और जड़ तथा चेतन रूप से विभक्त स्थावर-
जङ्गमात्मक पदार्थ के भीतर ऊष्मा, बाहर प्रकाश की आवश्य-
कता के कारण अग्नीषोमात्मक सूर्य उत्पन्न हुए; पदार्थ और
उसकी अवस्था सिद्धि के लिये गणेश उत्पन्न हुए; पदार्थों के
यथायोग्य अवस्थान के निमित्त शक्ति उत्पन्न हुई । उक्त ब्रह्म-
कार्य-उत्पत्ति को शक्ति में अन्तर्भूत मान कर परमेश्वर की
विष्णु आदि पञ्चदेवतात्मक उपासना प्रवृत्त हुई, जिसका
विस्तार विष्णुपुराण, शिवपुराण, मार्कण्डेयपुराण, सूर्यपुराण
और गणेशपुराण में भली भांति किया है । किं बहुना; सारे
पुराण, उपपुराण और इतिहासों का उपसंहार इन्हीं विष्णु-
शिव-शक्ति-गणेश तथा सूर्य की विभूतियों में हुआ है। जैसे
पदार्थ के उत्पत्ति आदि तीन भाव-विकार से ब्रह्मा आदि
तीन देवता कहे हैं वैसे ही पदार्थ के ऊष्मा तथा प्रकाश के कारण
अन्य भाव-विकार से सूर्य, और नियमित भाव-विकार के
लाभार्थ गणेश कहे हैं । और भाव-विकार ही से वेदान्त-दर्शन
में परमेश्वर का तटस्थ-लक्षण किया है । शब्दार्थरूप जगत् में
यह अर्थ-सृष्टि की व्यवस्था है, एवं शब्द-सृष्टि की भी व्यवस्था
जाननी चाहिये ।
१ पदार्थ की अवस्था ।
२ "जायतेऽस्ति, विपरिणमते वर्धते,ऽपक्षीयते विनश्यति" वाष्र्यायणि ।
३ 'विनायकः कर्म विघ्न--' याज्ञवल्क्य ।
४ 'जन्माद्यस्य यतः' वेदव्यास ।
५ 'नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदर्णैः क्रमाद् व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं
शब्दार्थरूपं जगत् । शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽव्यादनिशं
शशाङ्कसदृशं वाचामधीशं महः ॥' शारदातिलककार ।
७० मनुस्मृति ।
परमेश्वरैक्य । चित्त के अत्यन्त चञ्चल होने से परमेश्वर
की निराकारोपासना पूर्वकाल में भी दुर्घट थी, वर्तमान काल
में तो अत्यन्त दुर्घट क्या बल्कि असम्भव सी है । शिव महिमा
में कहा है—
‘ अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
: रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
: स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य त्रिपयः
: पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥’
: अतएव मध्यमाधिकारी और मन्दाधिकारी के चित्तविश्रा-
: मार्थ पञ्चदेवात्मक साकारोपासना वेददृष्टि से कही है और
: उन पञ्चदेवताओं में श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण के अनुसार
: भेद नहीं है, किन्तु अभेद ही है । इस विषय में पहिले कुछ
: श्रुतियां दिखलाई जाती हैं—
: ‘ इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु-
: रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
: एकं सद् बहुधा विप्रा वदन्ति
: अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥’
: ( ऋ० सं० २ अ० ३ अं० २२ अनु० )
: ‘ तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः ।
: तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः ॥’
: ( य० सं० ३२ । १ )
: ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
: १ ‘ चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथिवलवद्दृढम् ’ ( गीता ६ । ३४ )
: २-३ वर्तमान काल के उपासक मध्यम तथा मन्द नाम से चिढ़ेंगे क्योंकि उनके
: विचार में निराकारोपासना मौसी का घर है ।
तथा, गायत्री-मन्त्र-प्रतिपाद्य एकही ब्रह्म सन्ध्या-प्रकरण
· भूमिका । ७१
स॑ ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ।
स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥' १
( कै० उ० प्रथम ख० ८ म० )
तथा, गायत्री-मन्त्र-प्रतिपाद्य एकही ब्रह्म सन्ध्या-प्रकरण
में काल और स्थान भेद से ब्रह्मा-विष्णु-शिव रूप से ध्येय
कहा है—
‘ पूर्वा संध्या तु गायत्री सावित्री मध्यमा स्मृता ।
या भवेत्पश्चिमा संध्या सा तु देवी सरस्वती ॥
रक्ता भवति गायत्री सावित्री शुक्लवर्णिका ।
कृष्णा सरस्वती ज्ञेया संध्या-त्रयमुदाहृतम् ॥ ’
‘ नीलोत्पलदलश्यामं नाभिदेशे प्रतिष्ठितम् ।
चतुर्भुजं महात्मानं पूरकेणैव चिन्तयेत् ॥
कुम्भकेन हृदिस्थाने ध्यायेच्च कमलासनम् ।
ब्रह्माणं रक्तगौराङ्गं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥
रेचकेनेश्वरं ध्यायेल्ललाटस्थं महेश्वरम् ।
शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥ ’
आचारादर्श ।
तथा, ‘ पञ्चायतन ’ पूजा में विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश
और सूर्य, इन पांचों ब्रह्मधारा में प्रत्येक को प्रधान मान कर
अन्य चारों को गौण माना है; इस प्रकार प्रत्येक देवता
प्रधान और गौण सिद्ध होता है, यह बात परमार्थ-दृष्टि से
अभेद मानने ही से संगत होती है अन्यथा मत्तप्रलाप समझी
जायगी । इसी अभिप्राय से वेदव्यास ने विष्णुपुराण आदि
१ इसी मन्त्र के पूर्व में ‘ उमासहायं—’ यह उक्त मन्त्र है ।
२ आदि शब्द से कहीं पुराण और कहीं पुराण के प्रकरण का ग्रहण करना चाहिये ।
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७२ मनुस्मृति ।
[Body]
में विष्णु को, शिवपुराण आदि में शिव को, देवीभागवत
आदि में शक्ति को, गणेशपुराण आदि में गणेश को और
सूर्यपुराण आदि में सूर्य को कारण ब्रह्म मानकर उनका
उत्कर्ष और अन्यों को कार्यब्रह्म मानकर उनका अपकर्ष
वर्णन किया है । अन्यथा अनेक ब्रह्मवाद लोक-वेद-विरुद्ध
होगा, यह बात विद्वद्वर नीलकण्ठ ने महाभारत की टीका के
मुखबन्ध में कही है । पञ्चायतन पूजा का क्रम यह है—
‘शम्भौ मध्यगते हरीनहरमूर्द्धन्यो, हरौ शंकरे—
भास्येनागसुता, रवौ हरगणेशाजाम्बिकाः स्थापिताः ।
देव्यां विष्णूहरेभवक्त्ररवयो, लम्बोदरेऽजेशरेनाम्बाः,
शंकरभागतोऽति सुखदा व्यस्तास्तु हानिप्रदाः ॥’
( निर्णय सिन्धु )
तथा, वेद,पुराण,इतिहास और तन्त्र में परमेश्वर के पञ्च
देव संबन्धी जो नाम प्राप्त होते हैं उनमें से निराकार के स्पष्ट
लिङ्गक नाम ( अभेदक ) लेने से अभेद और साकार के नाम
(भेदक) लेने से भेद सिद्ध होता है । नाम दो प्रकार का; एक
ओ३म् आदि, दूसरा विष्णु आदि । इनमें पहिला मन्त्र कह-
लाता है, दूसरा नाम-मन्त्र कहलाता है । मन्त्र, केवल वैदिक-
केवल तान्त्रिक और वैदिकतान्त्रिक भेद से तीन प्रकार
के हैं; नाम-मन्त्र भी तीन प्रकार के हैं परन्तु उनका पूर्वोक्त भेद
ही में उपसंहार है। केवल वैदिक मन्त्र- ‘सहस्रशीर्षा-’ आदि ।
केवल तान्त्रिकमन्त्र-‘श्रीकृष्णः शरणंमम’ आदि । उभयात्मक
मन्त्र-‘ओ३म् नमो नारायणाय’ आदि । अब पहिले
तान्त्रिक मन्त्रों के विषय में कुछ विचार करके बाद नाम द्वारा
पञ्च देवताओं का अभेद दिखलाया जायगा ।
भूमिका । ७३
तान्त्रिकमन्त्र के उल्लेख से 'तन्त्र' क्या पदार्थ है, इस
बात की जिज्ञासा होती है। यद्यपि तन्त्र-शब्द का अर्थ दर्शन
है तो भी यहां तन्त्र से विष्णु-शिव प्रोक्त ग्रन्थ विवक्षित हैं।
जैसे कर्म के उपबृंहक कल्पसूत्र-मन्वादि स्मृति, उपासना के
उपबृंहक शाण्डिल्य विद्या-पारमहंस संहिता, ज्ञान के उपबृंहक
उपनिषद्-योगवासिष्ठ हैं; तथा कर्म-उपासना-ज्ञान के उप-
बृंहक पुराण-उपपुराण-इतिहास हैं; वैसे ही प्रधान रूप से
उपासना तथा ज्ञान के उपबृंहक तन्त्र हैं। जैसे उक्त ग्रन्थों में
निराकार किंवा साकार ब्रह्म-भावनानूसार ज्ञाननिष्ठा और
कर्मनिष्ठा का प्रयत्नपूर्वक निरूपण है; वैसे ही इस तन्त्र में
ज्ञान-कर्मनिष्ठा की धूम है। जैसे उक्तग्रन्थों में उत्तम, मध्यम
और मन्द अधिकारियों के अनुसार ही ज्ञान-कर्म तथा उनके
अवान्तर भेदों का विनियोग कहा है-एवं तन्त्र में भी है। जैसे
वैदिक-संपत्ति, शाखा-भेद आदि से अपरिच्छिन्न है-एवं
तान्त्रिक-संपत्ति भी है।
अत एव ये वचन हैं-
'सांख्यं योगः पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
श्रुतिप्रमाणान्येतानि हेतुभिर्न विरोधयेत्॥'
योगि-याज्ञवल्क्य।
'सांख्यं योगः पञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा।
कृतान्त (सिद्धान्त) पञ्चकं विद्धि ब्रह्मणःपरिमार्गणे॥' १
(विष्णु धर्मोत्तर)
'सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते।
१ श्री रामानुजाचार्यकृत श्रीभाष्य में उत्तरार्ध यों है-
'आत्मप्रमाणान्येतानि न हन्तव्यानि हेतुभिः।'
७४ मनुस्मृति ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः ॥
अपांतरतमाश्चैव वेदाचार्य्यः स उच्यते ।
प्राचीनगर्भं तमृर्षि प्रवदन्तीह केचन ॥
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥
पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता तु भगवान् स्वयम् ।
महाभारत ।
पञ्चरात्रादि तन्त्रों की गणना-पञ्चरात्र (नारद पञ्चरात्र)
पाशुपतज्ञान अर्थात् शिवसूत्र, परशुराम सूत्र, चतुःषष्टितन्त्र,
तथा दक्षिणामूर्ति संहिता, सनत्कुमार संहिता, परमानन्द, कुलार्-
णव आदि। चतुःषष्टि तन्त्रों का अनुगत विभाग यह है—
१ महामाया, २ शम्बर, ३ योगिनी, ४ जालशम्बर, ५
तत्त्वशम्बरक, ६ भैरवाष्टक, १४ बहुरूपाष्टक (ब्राह्म्यादि सप्त
माता और शिवदूती के प्रतिपादक-बहुरूप तन्त्र ८) २२
यामलाष्टक (ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, रुद्रयामल, लक्ष्मी
यामल, उमायामल, स्कन्दयामल, गणेशयामल, जयद्रथयामल)
२३ चन्द्रज्ञान, २४ वासुकि, २५ महासंमोहन, २६ महोच्छुष्म,
२७ वातुल, २८ वातुलोत्तर, २९ हृद्भेद, ३० भेद, ३१ गुह्य, ३२
कामिक कलावाद, ३४ कलासार, ३५ कुब्जिकामत, ३६ ततोत्तर,
३७ वीणास्य, ३८ चोतुल, ३६ श्रोतलोत्तर, ४० पञ्चामृत, ४१
रूपभेद, ४२ भूतोडामर, ४३ कुलसार, ४४ कुलोड्डीश, ४५
कुलचूडामणि, ४६ सर्वज्ञानोत्तर, ४७ महाकालीमत, ४८ महा-
लक्ष्मीमत, ४९ सिद्धयोगेश्वरीमत, ५० कुरूपिकामत, ५१
देवरूपिकामत, ५२ सर्ववीरमत, ५३ विमलामत, ५४ पूर्व, ५५
पश्चिम, ५६ दक्ष, ५७ उत्तर, ५८ निरुत्तर, ५६ वैशेषिक,
भूमिका । ७५
६० ज्ञान, ६१ वीरावलि, ६२ अरुणेश, ६३ मोहिनीश, ६४
विशुद्धेश्वर ।
' एवमेतानि शास्त्राणि तथान्यान्यपि कोटिशः ।
भवतोक्तानि मे देव सर्वज्ञानमयानि च ॥'
यह उपसंहार-वाक्य है ।
तन्त्रों में शिव-शक्ति का संवाद जो लिखा है उसका यह
अभिप्राय है कि परमशिव, प्रकाश तथा विमर्शसंज्ञक दो रूप
धारण करके विमर्शांश से स्वात्मा को पूछा है और प्रकाशांश
से स्वात्मा को उत्तर दिया है । यह बात इन प्रमाणों से जानी
जाती है—
' गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयमेव सदाशिवः ।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ॥'
स्वच्छन्दतन्त्र ।
' स जयति महाप्रकाशो यस्मिन् दृष्टे न दृश्यते किमपि ।
कथमिव तस्मिन् दृष्टे सर्वं विज्ञातमुच्यते वेदे ॥
नैसर्गिकी स्फुरत्ता विमर्शरूपस्य वर्तते शक्तिः ।
तद्योगादेव शिवो' जगदुत्पादयति संहरति ॥'
वरिवस्यारहस्य ।
इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है किं तन्त्र-शास्त्र प्रमाणभूत है ।
और जो अपरार्क आदि कतिपय धर्मशास्त्री तन्त्र के प्रामाण्य में
१ शिव नाम की निरुक्ति यों कही है-
' हिसिधातोः सिंहशब्दो वशकान्तौ शिवः स्मृतः ।
वर्णव्यत्ययतः सिद्धः पश्यकः कश्यपो यथा ॥'
इतना धावन ' इच्छाशक्त्याश्रय ' अर्थ के लाभार्थ ।
७६ मनुस्मृति ।
आशङ्का करते हैं वे 'अतिप्रमाणान्येतानि—' इत्यादि पूर्वोक्त
वाक्यों से समाधेय हैं ।
और जो भावजन्य दोष तन्त्र के कतिपय अंश में हैं वे
समस्त किंवा व्यस्तरूप से वेद में भी उपलब्ध हैं । इस
कारण दोनों की एक गति है । महाभारत के अनुक्रमणिका
अध्याय में लिखा है कि—
' तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः
स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः ।
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क-
स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥ '
और जो तन्त्र के अंश प्रत्यक्ष श्रुति-विरुद्ध हैं वे विरोधा-
धिकरणन्याय से जबतक मूल श्रुति का लाभ न हो तबतक
आचरण के योग्य नहीं हैं । और जो—
“ वामं पाशुपतं सोमं लाङ्गलं चैव भैरवम् ।
न सेव्यमेतत्कथितं वेदवाह्यं तथेतरत् ॥
कापालं पञ्चरात्रं च यामलं वाममर्हतम् ।
एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु ॥ ”
इत्यादि पाशुपत विशेष, पञ्चरात्र विशेष तथा अन्यान्य जो
सर्वांश से वेदविरुद्ध हैं वे महापातक-दूषित-वेद-भ्रष्ट तथा
अन्यान्य जाति के लिये कहे हैं यह सब बात ईन वाक्यों से
स्पष्ट है—
१ 'ततस्तु सप्तमे- ' मनु० १२ । २५ ।
२-३ पाशुपत तथा पञ्चरात्र के द्वैविध्यते 'विशेष' पद का दान किया है ।
४ यहां कतिपयवचन विद्वद्वर श्रीमल्लछेदरामप्रणीत सनातनधर्मोद्धार से
लिखे हैं ।
भूमिका । ७७
‘ पाञ्चरात्रं भागवतं तथा वैखानसाभिधम् ।
वेदभ्रष्टान् समुद्दिश्य कमलापतिरुक्तवान् ॥
श्रुतिभ्रष्टः श्रुतिप्रोक्तप्रायश्चित्ते भयं गतः ।
क्रमेण श्रुतिसिद्ध्यर्थं मनुष्यस्तन्त्रमाश्रयेत् ॥ ’
साम्बपुराण ।
‘ अथांशुः सात्त्वतो नाम विष्णुभक्तः प्रतापवान् ।
महात्मा दाननिरतो धनुर्वेदविदां वरः ॥
स नारदस्य वचनाद् वासुदेवार्चने रतः ।
शास्त्रं प्रवर्तयामास कुण्डगोलादिभिः श्रितम् ॥
तस्य नाम्ना तु विख्यातं सात्त्वतं नाम शोभनम् ।
प्रवर्त्तते महाशास्त्रं कुण्डादीनां हितावहम् ॥ ’
कूर्मपुराण ।
‘ तेनोक्तं सात्त्वतं तन्त्रं यज्ज्ञात्वा मुक्तिभाग् भवेत् ।
यत्र स्त्रीशूद्रदासानां संस्कारो वैष्णवः स्मृतः ॥ ’
श्रीभागवत ।
इत्यादि दुर्व्यवस्थाओं से ही वेदान्तदर्शन के सूत्र-भाष्य
में पाञ्चरात्रिक भागवत-प्रक्रिया और पाशुपत-प्रक्रिया का
खण्डन किया है, न कि पारमार्थिक वैष्णव शैव प्रक्रिया का ।
प्रकृत में नाम द्वारा पञ्च देवताओं का अभेद यों है—
विष्णु के कृष्ण ( श्याम-संवलिया ) केशव ( अच्छे घुंघु-
वाले बालवाला ) पीताम्बर ( चमकदार पीले वस्त्रों को
१ ‘ अमृते जारजः कुण्डो मृते भर्तरि गोलकः । ’
२ ‘ पत्युरसामञ्जस्यात् । उत्पत्त्यसंभवात् ’ इत्यादि सूत्रों के शारीरकभाष्य में ।
३ पारमार्थिक-वैष्णव-प्रक्रिया नृसिंहतापिनी, गोपालतापिनी, रामतापिनी
(उपनिषद्) आदि ग्रन्थों में स्पष्ट है ।
७८ मनुस्मृति ।
धारण करनेवाला ) आदि नाम; शिव के चन्द्रशेखर,
त्र्यम्बक, भूतेश आदि नाम; शक्ति के सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी
आदि नाम; गणेश के हेरम्ब, लम्बोदर आदि नाम; तथा
सूर्य के विकर्त्तन, विरोचन आदि नाम; आकारोपाधिक होने
से कृष्ण आदि पांच आकार ( विशेष्य ) के बोधक होते हैं ।
यदि विष्णु ( वेवेष्टि ) शिव ( शिवयति ) शक्ति ( शक्नोति )
गणेश ( गणानामीशः ) और सूर्य ( सुवति ) एकत्व विवक्षा से
ग्रहण किये जायं तो आकारोपाधिक ( नियत रूप के बोधक )
न होनेसे परस्पर विशेषण-विशेष्य-भाव को प्राप्त होकर एक
व्यक्ति ( परमेश्वर ) के बोधक होते हैं । यही रहस्य पञ्चा-
यतन की मुख्य गुण-भाव-कल्पना में भी है । किं बहुना,
पौराणिक तान्त्रिक सहस्रनाम-स्तोत्रों में ये दोनों प्रकार के
नाम ( भेदक-अभेदक ) पढ़े हैं और इन्हीं विष्णु आदि नाम
के अनुरोध से वैष्णव आदि उपासकों की संज्ञा हुई है !
और जो—
' छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि
भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत-
तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥'
( श्वे० उ० ४-५, १० )
इत्यादि उपनिषद् वाक्यों के अनुसार माया ( शक्ति ) और
मायावान् ( शक्तिमान्-परमेश्वर ) ये धर्मधर्मि-भेद से दो
पदार्थ कल्पना किये हैं, इनको चाहे लक्ष्मी और विष्णु शब्द
भूमिका। ७९
से या, शिव और शक्ति शब्द से कहो। पर अर्थ में एक ही है
इसी अभिप्राय से यह कहा है—
'नित्यं निर्दोषगन्धं निरतिशयसुखं ब्रह्म चैतन्यमेकं
धर्मो धर्मीति भेदद्वितयमिति पृथग्भूय मायावशेन ।
धर्मस्तत्रानुभूतिः सकलविषयिणी सर्वकार्यानुकूला
शक्तिश्चेच्छादिरूपा भवतिगुणगणश्चाश्रयस्त्वेक एव ॥
कर्तृत्वं तत्र धर्मी कलयति जगतां पञ्चसृष्ट्यादि कृत्यॆ
धर्मः पुंरूपमद्वा सकलजगदुपादानभावं बिभर्ति ।
स्त्रीरूपं प्राप्य दिव्या भवति च महिषी स्वाश्रयस्यादिकर्तुः
प्रोक्तौ धर्मप्रभेदादितिनिगमविदां धर्मिवद्ब्रह्मकोटी ॥'
अप्पय दीक्षितः ।
अर्थात् एक सच्चिदानन्दरूप निर्विकार ब्रह्म है, वह अपनी
माया-से धर्म और धर्मीभाव को प्राप्त होता है, उसकी इच्छा
ज्ञान क्रिया शक्ति ही धर्म है और इन सब गुणों का आधार
वही एक धर्मी है, धर्मी जगत् के सूक्ष्म स्थूल कार्य को करता है
और धर्म उस कार्य का उपादान कारण बनता है, तथा धर्म ही
स्त्रीरूप होकर अपने आश्रय आदिकर्ता धर्मी पुरुष को प्राप्त होता
है, इस प्रकार वैदिकदृष्टि से दिव्य दम्पती की स्थिति है। और—
'द्विधा कृत्वत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत् ।
अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः ॥'
यहभी मानवीय श्लोक है ।
पीठायतन । उपास्य के पूजन के लिये नानाविध पीठा-
यतन कहे हैं । जैसे—जल, अग्नि, हृदय, सूर्य, स्थण्डिल
(वेदी) प्रतिमा (मृत्तिका काष्ठ पाषाण धातु की निर्मित
तथा स्वयम्भू) और यन्त्र आदि ।
८० मनुस्मृति ।
'अप्सवग्नौ हृदये सूर्ये स्थण्डिले प्रतिमासु च ।
षट्स्वेतेषु हरेः सम्यगर्चनं मुनिभिः स्मृतम् ॥'
अग्निपुराण ।
'स होवाच प्रजापतिः, षडरं वा एतत् सुदर्शनं महाचक्रं—'
इत्यादि ।
नृसिंहतापनी ।
'ते होचुरुपासनमेतस्य परमात्मनो गोविन्दस्याखिला-
धारिणो ब्रूहीति । तानुवाच यत्तस्य पीठं हैरण्यमष्टपलाशमम्बुजं,
तदन्तरालेऽनलास्रयुगं, तदन्तराद्यार्णमखिलबीजं कृष्णाय नम
इति—' इत्यादि ।
गोपालतापनी ।
'एवं त्रिकोणरूपं स्यात्—' इत्यादि ।
रामतापनी ।
यहां जल से सामान्य जल तथा गङ्गा यमुना आदि के
विशेषजल; अग्नि से गृह्याग्नि, श्रौताग्नि और तान्त्रिकाग्नि;
हृदय से श्रुतिप्रसिद्ध हृदय तथा तन्त्रप्रसिद्ध अनाहत, विशुद्धि,
आज्ञा और सहस्रार; सूर्य से भौतिक सूर्यमण्डल तथा चन्द्र-
मण्डल; स्थण्डिल से अनेकविध मनोहारी पवित्र पीठ;
प्रतिमा से परमेश्वर के परिचायक नानाविध चल तथा स्थिर
आर्ष आकार विशेष; यन्त्र से विहित द्रव्य से विहित आधार
पर लिखित आर्ष विन्दु त्रिकोणादि संनिवेश विशेष का
ग्रहण इष्ट है ।
१ शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती । मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्ट
विधा स्मृता ॥' भागवत.
भूमिका । = १
पीठायतन के विषय में कुछ श्रुतियां दिखलाते हैं—
‘ सितासिते सरिते यत्र संगते
तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरा-
स्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ॥ ’
इससे गङ्गा यमुना और इनका संगम तथा संगमस्थान
का फल स्पष्ट है । इसीलिये ‘ तीर्यते अननेति तीर्थम्=संसार-
सागर से तिरने का उपाय ’ यह तीर्थ शब्द का अर्थ है और
इसीसे लक्ष्यानुसार तीर्थराज-प्रयाग की सिद्धि होती है ।
‘ तदेवाग्निस्तदादित्यः—’
इस पूर्वोक्त श्रुति से अग्नि आदि प्रसिद्ध हैं ।
‘ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । ’
‘ शतं चैका हृदयस्य नाड्य-
स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमापन्नमृतत्वमेति
विष्वङ्गेता उत्क्रमणे भवन्ति ॥ ’
इससे हृदयादि स्थान का बोध होता है । और कई
एक साहसी यह कहते हैं कि वेद में मूर्तिपूजन नहीं है,
अतएव-
‘ न तस्य प्रतिमा अस्ति
यस्य नाम महद्यशः ’
इस श्रुति में प्रतिमा का निषेध है । उनको यह समझना
चाहिये कि यहां पर ‘ प्रतिमा ’ शब्द का अर्थ मूर्ति नहीं है;
किन्तु ‘ उपमा ’ अर्थ है ।
८२ मनुस्मृति ।
उक्त मन्त्र का यह अर्थ है—उसकी उपमा नहीं है जिसका
नाम और यश सर्वत्र फैल रहा है अर्थात् परमेश्वर निरुपम है।
और परमेश्वर के रूप में यह श्रुति भी प्रमाण है—
‘ द्वे वा ब्रह्मणो रूपे मूर्त्तं चैवामूर्त्तं च ’ .
मूर्त्तिशब्द का अर्थ स्त्रीपुंसाकारही नहीं है किन्तु आकार-
मात्र, इसी अभिप्राय से रुद्राध्याय आदि के द्वारा परमेश्वर
के पुरुषाकार सिद्ध होने पर भी उसके ‘ अष्टमूर्त्ति ’ आदि
नाम प्रसिद्ध हुए । और विशेषतः स्त्रीपुंसाकार के कथन का
यह आशय है कि शास्त्रकी प्रवृत्ति मनुष्यों के लिये कही है ।
अतएव ‘ हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात्–वे. १ । ३ । २५ ।’
इत्यादि महर्षियों के वचन प्रवृत्त हुए । और जब परमेश्वर
निराकार साकार दोनों ही है, तो केवल साकार के अभि-
प्राय से ही मूर्त्तिपूजन नहीं प्रवृत्त हुआ, किंतु निराकार के
अभिप्राय से भी । अतएव ‘ रूपोपन्यासाच्च–वे. १।२।२३।’
इत्यादि कल्पना की गई । यदि यह कहाजाय कि साकार के
प्रतिविम्व होनेसे मूर्त्तिपूजा मान भी लीजाय, पर निराकार के
प्रतिविम्ब न होनेसे मूर्त्तिपूजा कैसे संगत होगी ? यह सब कुतर्क-
मात्र है । देखिये, आकाश के निराकारता में भी प्रतिविम्बा-
काश का व्यवहार होता है; एवं शब्द का प्रतिविम्ब-प्रति-
शब्द कहलाता है; तो उक्त आकार मानने में कोई आपत्ति
नहीं है ।
१ ‘ न तन्मुखस्य प्रतिमा चराचरे ’ श्रीहर्ष ।
२ ‘ या सृष्टिः स्रष्टुराद्या-’ कालिदास. । ‘ साष्टमूर्तेश्च मूर्तिः ’ भास्कराचार्य ।
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यथासंभव पूर्वोक्त आयतन पीठपर षोडशोपचार वा पञ्चो-
पचार वा मानसोपचार से पूर्वाह्न में पञ्चायतन पूजा वा इष्टदेव
पूजा कीजाती है । यह पूजा आहिताग्नि को संध्योपासन और
नित्य हवन के पश्चात्, अनाहिताग्नि को संध्योपासन के पश्चात्
और द्विजभिन्न पवित्र जाति को स्नान के पश्चात् करना
चाहिये । स्थापित प्रतिमा, शालग्राम और बाणलिङ्ग में आवा-
हन, विसर्जन नहीं किये जाते । और शालग्राम तथा बाणलिङ्ग
की पूजा में द्विजभिन्न को अधिकार नहीं है । विष्णु की पूजा
में ऊर्ध्वपुण्ड्र और शिव आदि की पूजा में त्रिपुण्ड्र का लेख
है । ऊर्ध्वपुण्ड्र और त्रिपुण्ड्र पूजाकाल में जल, भस्म वा
गाङ्गादि पवित्र मृत्तिका से ही किये जाते हैं, पूजा के बाद
देवशेष चन्दन से उनकी सजावट होती है। पञ्चदेवों में सूर्य को
विल्वपत्र और गणेश को तुलसीपत्र चढ़ाना मना है, पर
शिव को विल्वपत्र और विष्णु को तुलसीपत्र अतिप्रिय है।
रुद्राक्षमाला से सब देवताओं के मन्त्र का जप होता है, पर विष्णु
को तुलसीमाला शिव को रुद्राक्षमाला अतिप्रिय है । शालग्राम
और बाणलिङ्ग आदि कतिपय मूर्तियों को छोड़कर औरों
का नैवेद्य ग्रहण करना मना है ।
देवताओं के विशेष तीर्थ ये हैं—( १ ) अयोध्या,
( २ ) मधु ( धु ) रा, ( ३ ) द्वारका और काञ्चीका अर्धभाग, यों
१ । ( १ ) आवाहन, ( २ ) आसन, ( ३ ) पाद्य, ( ४ ) अर्घ्य,
( ५ ) आचमनीय, ( ६ ) स्नान, ( ७ ) वस्त्र, ( ८ ) उपवीत, ( ६ ) चन्दन,
( १० ) पुष्प, ( ११ ) धूप, ( १२ ) दीप, ( १३ ) नैवेद्य, ( १४ ) नमस्कार,
( १५ ) प्रदक्षिणा, ( १६ ) विसर्जन । ये उपचार पुरुषसूक्त से वा अन्य मन्त्रों से
होते हैं ।
२ 'पूर्वाह्न एव कुर्वीत देवतानां च पूजनम् ।' मनु० ।
८४ मनुस्मृति ।
साढ़े तीन पुरी विष्णु की हैं। और ( १ ) काशी, ( २ ) उज्ज-
यिनी, ( ३ ) माया तथा काञ्चीका अर्धभाग, यों साढ़े तीन पुरी
शिव की हैं। इस प्रकार विष्णु और शिव की प्रधान सात
पुरी शास्त्र लोक में प्रसिद्ध हैं। एवं विष्णु की विशाला, शिव
का सेतुबन्ध है। ( १ ) कामाक्षा, ( २ ) उड्याण ( जगन्नाथ-
पुरी नाम से प्रख्यात ), ( ३ ) जालंधर और ( ४ ) पुण्य-
गिरि, ये चार स्थान शक्तिपीठ कहलाते हैं।
भक्ति। भक्ति, ज्ञान का अवस्था विशेष है। जैसे निराका-
रोपासना में ज्ञान प्रधान है, इसी प्रकार साकारोपासना में
भक्ति प्रधान है। इसके छ प्रकार हैं- ( १ ) मानसी,
( २ ) वाचिकी, ( ३ ) कायिकी, ( ४ ) लौकिकी, ( ५ ) वैदिकी,
( ६ ) आध्यात्मिकी। इनके लक्षण पद्मपुराणीय अम्बरीष-
नारद के संवाद में यों कहे हैं—
‘अथ भक्तिं प्रवक्ष्यामि विविधां पापनाशिनीम् ।
विविधा भक्तिरुद्दिष्टा मनोवाक्कायसंभवा ॥
लौकिकी वैदिकी वापि भवेदाध्यात्मिकी तथा ।
ध्यानधारणया बुद्ध्या देवानां स्मरणं च यत् ॥
विष्णुप्रीतिकरी चैषा मानसी भक्तिरुच्यते ।
मन्त्रवेदनमस्कारैरभिसंध्यं विचिन्तनैः ॥
जाप्यैश्चारण्यकैश्चैव वाचिकी भक्तिरुच्यते ।
व्रतोपवासनियमैस्तथेन्द्रियनिरोधनैः ॥
कायिकी सा तु निर्दिष्टा भक्तिः सर्वार्थसाधिका ।
भूषणैर्हेमरत्नाद्यैश्चित्राभिर्वाग्भिरेव वा ॥
१ परमेश्वर के विषय में जो इष्टसाधनता का ज्ञान यही भक्ति को उत्पन्न
करता है । ज्ञान में अन्तःकरण, भक्ति में बाह्यकरण प्रधान हैं।
भूमिका। ८५
वासःप्रभृतिभिः सूत्रैः पत्रैर्व्यजनोत्थितैः ।
नृत्यैर्वादित्रगीतैश्च सर्वबल्युपहारकैः ॥
भक्ष्यभोज्यान्नपानैश्च या पूजा क्रियते नरैः ।
नारायणं समुद्दिश्य भक्तिः सा लौकिकी मता ॥
ऋग्यजुःसामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च ।
क्रियन्ते विष्णुमुद्दिश्य सा भक्तिर्वैदिकी मता ॥
दृष्टिर्वृत्तिः सोमपानं याज्ञिकं कर्म सर्वशः ।
अग्निभूम्यनिलाकाशजलशंकरभास्करम् ॥
यमुद्दिश्य कृतं कर्म तत्सर्वं विष्णुदैवतम् ।
आध्यात्मिकीयं विविधा ब्रह्मभक्तिः स्थिता नृप ॥'
भक्ति के मानसी आदि पहिले तीन प्रकार में अगले तीन
प्रकार अन्तर्भूत हैं, क्योंकि मानसिक, वाचिक और कायिक
व्यापार से अन्य कोई व्यापार नहीं है । अतएव इन
व्यापारों के दुष्ट होने से मनु ने ' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति
स्थावरतां नरः । वाचिकैः पक्षिभृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥'
ये तीन दुर्विपाक कहेहैं । मानसी आदि तीन भक्तियों में कर्म
और उपासना के प्रतिपादक सारे शास्त्र समाप्त हुए हैं ।
यही बात उक्त भक्ति लक्षण से जानी जाती है । और
जो लौकिकी भक्ति के लक्षण में नृत्य, गीत, वादित्र का
प्रसङ्ग आया है, उसका यह आशय है कि सत्त्वगुण के
उद्रेक में भक्त स्वयं नृत्य आदि करके अपने उपास्य की प्रस-
न्नता प्राप्त करै । इसी विषय का उपबृंहण याज्ञवल्क्य ने
किया है—
१ 'नृत्यं चोदरार्थे निषिद्धम्' इति श्रीधर स्वामी ।
२ भक्त चार प्रकार के-आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी (गीता) ।
८६ मनुस्मृति ।
' यथाविधानेन पठन् सामगायमविच्युतम् ।
सावधानस्तदभ्यासात् परं ब्रह्माधिगच्छति ॥
अपरान्तकमुल्लोप्यं मद्रकं मकरी तथा ।
औवेणकं सरोविन्दुमुत्तरं गीतकानि च ॥
ऋग्गाथा पाणिका दक्षविहिता ब्रह्मगीतिका ।
गेयमेतत्तदभ्यासकरणान्मोक्षसंज्ञितम् ॥
वीणावादनतत्त्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः ।
तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ॥'
प्रायश्चित्ताध्याय. ( १२-११४ )
इत्यादि वचनों से स्पष्ट ज्ञात होता है कि विषयवासना
की बहुतायत से इस समय में देवमन्दिरों में जो नृत्य गान
प्रवृत्त होरहे हैं और जो रासलीला 'आदि जगमगा रही हैं,
वे सब परमार्थ में भक्ति के साधन न होकर विक्षेप वा
व्यभिचार के अवश्य साधन होते हैं ।
इसी अभिप्राय से कहा है—
' उपासना ध्यानधृती समाधिः
स्वर्गापवर्गौ चरितानि दूरे ।
१ देखिये श्रावण मास में अयोध्या आदि पुण्यक्षेत्रों में दोलोत्सव ( झूला )
की बहार । अत एव कहना पड़ा—
' वैधानि कर्माणि यथेष्टमावान्योद्वापनीत्याहह कल्पयित्वा ।
प्रायेण संप्रत्यपरे वरेण्या विश्वंभराचीं परिपीडयन्ति ॥
विधीयते यत्र न वेदपाठो न वा पुराणागमसद्गतानि ।
उद्योतितातौद्यविशानमद्गः किं ? सा सपर्या परमार्थकोटिः ॥
• श्रद्धाच भक्तिर्विहिता यदर्थे सा मूर्तिपूजा क्रमशोऽपयाति ।
यत्राद्भुता वैषयिकाः प्रवाहाः सा भूरिभावं भजते समन्तात् ॥ '
चातुर्वर्ण्यशिक्षा.
भूमिका। ८७
इतोऽधुना साधुविधां धुनाना
शृङ्गारिणां वल्गति रासलीला ॥'
चातुर्वर्ण्यशिक्षा०
भक्ति और भक्तों के प्रसङ्ग में यह हठात् कहना पड़ता है कि
वर्तमानकाल में प्रायः अपने अपने वर्ग को निराले ढंग पर
चलाने के लिये निराले ही कुछ नियम कायम करने पड़े।
इसी कारण से वैष्णव-शैवों में आपस में विरोध बढ़ने
लगा, इनमें क्या वैष्णवों में भी आपस में नहीं बनती। पूर्वकाल
में जो वैष्णव-शैव आदि सहमत होकर रहते थे वे सब
बातें अब उठगईं, परस्पर विद्रोह होने लगा। यहां तक कि पुराने
ग्रन्थों में प्रक्षेप कर दिये गये और पुराने के नाम से नये ग्रन्थ
बना डाले गये। ऋषियों ने जिसलिये भक्ति को कहा वहां
वह न रहकर माला-तिलक पर जा डटी। ये नये वैष्णव लोग
शैव, शिवभस्म, रुद्राक्ष आदि की निन्दा करने लगे और शैव
वैष्णवों के ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि की निन्दा करने लगे। परन्तु
विष्णु की निन्दा नहीं, क्योंकि शैव लोग शिव और विष्णु
का भेदभाव नहीं मानते जो कोई मानते हों वे शैव ही
नहीं हैं और न ऐसे शैव वा वैष्णव ही का होना शास्त्र से सिद्ध
है। यही पुराने वैष्णवों का भी मत है। देखिये श्रीतुलसी-
दासजी ने अपने रामायण में कहा है—
शिवद्रोही मम दास कहावै ।
सो नर सपनेउ मोहिं न पावै ॥
और इसी अभिप्राय से यह सुभाषित प्रसिद्ध है—