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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 649 में से

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पृष्ठ 87

भूमिका। ८५
वासःप्रभृतिभिः सूत्रैः पत्रैर्व्यजनोत्थितैः ।
नृत्यैर्वादित्रगीतैश्च सर्वबल्युपहारकैः ॥
भक्ष्यभोज्यान्नपानैश्च या पूजा क्रियते नरैः ।
नारायणं समुद्दिश्य भक्तिः सा लौकिकी मता ॥
ऋग्यजुःसामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च ।
क्रियन्ते विष्णुमुद्दिश्य सा भक्तिर्वैदिकी मता ॥
दृष्टिर्वृत्तिः सोमपानं याज्ञिकं कर्म सर्वशः ।
अग्निभूम्यनिलाकाशजलशंकरभास्करम् ॥
यमुद्दिश्य कृतं कर्म तत्सर्वं विष्णुदैवतम् ।
आध्यात्मिकीयं विविधा ब्रह्मभक्तिः स्थिता नृप ॥'
भक्ति के मानसी आदि पहिले तीन प्रकार में अगले तीन
प्रकार अन्तर्भूत हैं, क्योंकि मानसिक, वाचिक और कायिक
व्यापार से अन्य कोई व्यापार नहीं है । अतएव इन
व्यापारों के दुष्ट होने से मनु ने ' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति
स्थावरतां नरः । वाचिकैः पक्षिभृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥'
ये तीन दुर्विपाक कहेहैं । मानसी आदि तीन भक्तियों में कर्म
और उपासना के प्रतिपादक सारे शास्त्र समाप्त हुए हैं ।
यही बात उक्त भक्ति लक्षण से जानी जाती है । और
जो लौकिकी भक्ति के लक्षण में नृत्य, गीत, वादित्र का
प्रसङ्ग आया है, उसका यह आशय है कि सत्त्वगुण के
उद्रेक में भक्त स्वयं नृत्य आदि करके अपने उपास्य की प्रस-
न्नता प्राप्त करै । इसी विषय का उपबृंहण याज्ञवल्क्य ने
किया है—
१ 'नृत्यं चोदरार्थे निषिद्धम्' इति श्रीधर स्वामी ।
२ भक्त चार प्रकार के-आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी (गीता) ।