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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( १४६ )

अठारवें अमिशब्द ले नरियर मोरे । नहीं तो काख सीस लै तोरे ॥
विना एकोत्री जो कडिहारा । ते सब बांधे यमके द्वारा ॥
विना लेखे जो गुरु कहावे । गुरु डूबै शिष्य पार न पावे ॥

साखी-इतना लेखा पावै, सो साँचो कडिहार ।

कहैं कबीर बिन लेखा जाने, छलइ काल बटपार ॥

साखी-कडिहारी भेदकी धर्मदास उवाच

साहेब इतना भेद न आवै । सो नाही कडिहार कहावै ॥
मूल भेद तुम कहो प्रमाना । तेहिते हंस होय निर्वाना ॥
मूल भेद है आदि निशानी । सो समरथके होय प्रमानी ॥
इतनी परचै हमकूँ दीजै । मूल भेदकी दया गुरु कीजै ॥
गुरु सोई जो ज्ञान बतावै । और गुरु को काम न आवै ॥
साखी-धर्मदास कीया करै छुऔ सतगुरुके पाँव ।

साहब जो मैं तुमते बिछुरो, तो मूलशब्द बारह होइ जाव ॥

साखी-मूल भेदकी सद्गुरु उवाच

धर्मदास कहो मैं सोई । मूल भेद घट राखौ गोई ॥
गुरु मर्याद काहू ना पाई । ताते शब्द तुम राखौ छिपाई ॥
मूल भेद है अगम अपारा । विरला हंस पावही पारा ॥
सुर नर मुनि गण गन्धर्व देवा । तिनहु मूल नहीं पायो भेवा ॥
काया मूल है आदि निशानी । सौ धर्मनि तुम सुनो प्रमानी ॥
जो निज योग समाधि लगावै । सो तो लाभ तिनहुँ नहीं पावै ॥
चार वेद जिस आगम बखाना । मूल भेद वेदो नहीं जाना ॥
अक्षर मूलकी उत्पति भाखी । अजर मूल लै बारह राखी ॥
अजर मूल है सबको मूला । तेहिते प्रथम काया है स्थूला ॥
लाखौ सैनमें देउ लखाई । अजर मूल लै लोक समाई ॥
भिन्न भिन्न सब मूल बताऊं । अजर मूल माया दिखलाऊं ॥

नं. ७ कबीरसागर - ६

( १४६ )

कबीरबानी

मूल भेद

प्रथम मूल आदि है भाई । जिन सब उत्पति अंकुर बनाई ॥
दूसर मूल वानी है व्यवहारा । तेहिंते सहज सुरति निरधारा ॥
तीसर मूल मर्मको पावै । मूल सुरति सब भेद बतावै ॥
चौथ मूल सोहंग बैधाना । तामैं सुरति ओहंग समाना ॥
पाँचवै है अर्चित पर बानी । प्रेम सुरति तिहि माँहि समानी ॥
छठै मूल अक्षरकी बानी । योगमाया अक्षर उत्पानी ॥
सातवै मूल अक्षरहीकी बानी । तेहिंते कैल निरंजन जानी ॥
अक्षर मूल है सातवै काला । त्रिगुण काल उत्पति प्रतिपाला ॥
चार काल अपरबल बीरा । जाते जीवको व्यापे पीरा ॥
इतनो मूल चारि काल बखानी । अजर मूल चारि माँहि समानी ॥
सद्गुरु मिले तो भेद लखावै । बिना सतगुरु कोइ पार न पावै ॥

साखी-बिनु सद्गुरु बाँचे नहीं, कोटिन करै उपाय ।

अजर मूलका खोज न पावै, बांधे यमपुर जाय ॥

साखी-मूल व्याख्यानकी धर्मदास उवाच

तुम सद्गुरु हो समरथ दाता । कैसे मिटे कालकी घाता ॥
तौन भेद गुरु देहु बताई । जेहिंते हंस लोकको जाई ॥
शब्द परीक्षा हमको दीजै । सब जीवनकी परचै कीजै ॥
कैसे सीख हम करै संसारा । तौन भेद मोहे कहो विचारा ॥
कैसे तरिहैं जगके हंसा । कैसे निर्भय तुम्हारे वंसा ॥

साखी-वंश अंशकी निर्णय, हमसों कहो समुझाय ।

केहि विधि हम जो निस्तरे, कैसे लोकहि जाय ॥

सद्गुरु उवाच

सुनो धर्मदास कहूं मैं तोही । वचन वंश प्रताप है सोही ॥
वंश बयालिस वचन हमारा । जिनको समरथ है रखवारा ॥

बोधसागर

( १४७ )

ताको खोजि परमपद पावै । भवसागर में बहुरि न आवै ॥
जिनके ब्यालिस वंश तुम्हारा । जिनके वचन अंश है कडिहारा ॥
वचन वंशको अंश न दावै । तुम्हरो वंश नहिं बोध चलावै ॥
एहि विधि वंश अंश जो होई । दूत भूत यम कंपन सोई ॥
जाति न जै और मोह न आवै । सोई वंश अंश जो कहलावै ॥
कलकी दशा जानिके खावै । निश्चय राज वंश गुरु होवै ॥
जिनके पारस चले संसारा । देखत काल होय जरि छारा ॥

कडिहारी लेखा

अब सुनो कडिहारी लेखा । वंश अंशको जानि विवेका ॥
वंश अंशको करै बिचारा । सो कहिये वोहित कडिहारा ॥
वंश अंश नहिं अक्षर पावै । सो कडिहार बोधकं ध्यावै ॥
वंश वचन कडिहारी करहीं । सो कडिहार फाँस नहीं परहीं ॥
कडिहारका किनहोय कडिहारा । लक्ष चौरासी अटकै सो बारा ॥
जाति पांतिकी दासी न राखै । सद्गुरु परिचय निशिदिन भाखै ॥
वंश अंशको पान चलावै । सो साँचै कडिहार कहावै ॥

हंसकी चाल

अब सुनियो जग हंस विचारा । प्रथमहि चौका करै हमारा ॥
चौका अंश समर्थके भाई । तिन्ह अपनी युग अदल चलाई ॥
चौका अंश कालकी हानी । तेहि ते पुरुषकी सुरति समानी ॥
तितुका तोए लेहि प्रमाना । यम भाजे छोड़ै अभिमाना ॥
चरणामृत हि तत्त्वसों लेही । यमके हाथ चुनौती देही ॥
प्रेम पतीत सो सेवा लावै । नाम पान गुरु अक्षर पावै ॥
हंस वरन हो तहवों जाई । जब सतगुरु सतशब्द लखाई ॥
एहि विधि वंस हंसकी करनी । ताते तुमसों कहुं वचन प्रमानी ॥

साखी—एहि वचन सत्य है, तुम वंश अंशको पान ।

कडिहारी लेखा सार है, हंसहि भाव भक्ति परवान ॥

( १४८ )

कबीरबानी

साखी-वंशअंशकी-धर्मदास उवाच

साँचे सतगुरु हम भल पावा । जमको धोखा सबहि मिटावा॥
गुरुशिष्यको भेद हम पावा । वंश अंश ले सबै परखावा ॥
अब वंश अंशका कहो प्रमाना । केते वंश केते अंश ठिकाना ॥
वंश अंश केते कडिहारा । तेहिकी परिचै देहो विचारा ॥
केतिक वंश कडिहारा समुझाई । केतिक संग हंस ले जाई ॥
केतिक प्रमानवंश हंसचलिजाई । सो समर्थ मोहे देहो चिन्हाई ॥

साखी-वंश अंशके प्रमान कहो, लेखा देहो बताय ।
एती सन्धि मोसों कहौ, सब संशय मिटजाय ॥

साखी-सब वंश प्रमानकी-सदगुरु कबीर उवाच

धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घट बुद्धी बड़ि देखी ॥
वचन वंश ब्यालिस ठीका । तिन्हको सत्रथ दीनो टीका ॥
वंश अंश वचन एक सोई । दीर्घ वंश अंश लघु होई ॥
जेठी अंश वचन मोरो जागै । और वंश जगके पीछे लागै ॥
तिन्हकी छाप चले संसारा । और वंश जगके कडिहारा ॥
बीस दिन और वर्ण पचीसा । इतना कुलमें चले सँदीसा ॥
साठि वरण अंशा प्रमाना । चारवंश तेहि माँहि समाना ॥
नामवंशकी पारख देऊ । तिनसे ब्यालिस वंश कहिदेऊ ॥
तिनसे ब्यालिस वंश कडिहारा । वचन वंश ब्यालिस पसारा ॥
चाल चले और पन्थ हटावै । भुले जिवन घर घर समुझावै ॥
वंश छत्रपतिसिद्ध सुधारी । नाम अंश करे कडिहारी ॥
धर्मदास एक वंशकी हानी । पावै वचन वंश सो समानी ॥
हमरो वचन सुरामनि सारा । वंशअंश ब्यालिस है अधिकारा ॥
सोह वंश जे वचन विचारे । विना वचन नहिं वंश हमारे ॥

बोधसागर

( १४९ )

कडिहार ओ हंस

वंश अंश मोहित कडिहारा । सदा हजुरी पलक न न्यारा ॥
वैसी चाल हंसकी होई । सदा हजुरी पलक दूरि न होई ॥

वंश अंश हंस प्रमाना

पीढी १

प्रथम वंश अंशकी बानी । बचन कडिहार एके प्रमानी ॥
दो सित्तर हंस तिन्ह तारै । अपने कर सब जीव उबारै ॥

पीढी २

दुसरे वंश अंश चलि आवै । पांच कडिहार निशानी लावै ॥
दूसरे वंश अंश अधिकारा । सातसौ तेरे जीव उबारा ॥

पीढी ३

तीसर वंश अंश जब दोई । नख कडिहार ताळुके होई ॥
हंस सोरासे लोक प्रमाना । १६०० । तिनके हाथ मुचन बन्धाना ॥

पीढी ४

चौथे वंश अंश जग आवै । भवसागरमो पीर कहावै ॥
तेरह सोहंस तीन कडिहारा । १३०३ । तिनके सङ्ग उत्तरि गयो पारा ॥

पीढी ५

तेहि पीछे काल अचरज होई । अंशाहि वंश विरोधे सोइ ॥
पांचवे वंश अंश परवाना । सात कडिहारा तिनके बन्धाना ॥
तीन हजार चारसै सोई । ३४०० । इतना हंस लोकको होई ॥

पीढी ६

छठे वंश अंश अधिकारा । ताते काल आनि पेठारा ॥
पुनि आवै पुरुषहि सहदानी । तरे कडिहार तिन्हके परवानी ॥
छःसै सत्तर सात हजार ७६७० । वंश अंश सङ्ग उत्तरे पारा ॥

( १५० )

कबीरबानी

पीढी ७

सातवें वंश अंश परवानी । द्वादश ताके कडिहार बखानी॥
तीन हजार पांचसै बावन । ३५५२ । इतने हंस पहुँचे मन भावन॥

पीढी ८

अठवें वंश बचन परकासा । सत्रा कडिहार तिनके रहे बासा॥
पांच हजार चारिसै बारह । ५४१२ । पहुँचे लोक पुरुष दरबारा॥

पीढी ९

नौमें वंश अंश जब आवै । पचीस कडिहार सङ्ग तब पावै॥
सात हजार आठसै छत्तीसा । ७८३६ । प्रगटे वंश अंश जगदीसा॥

पीढी १०

दशे वंश अंश अधिकारी । बत्तिस कडिहार भेद जग भारी॥
तीनसे पांच और आठ हजार । ८३०५ । तबही पंथ चढ़े असरारा॥

पीढी ११

ग्यारह वंश तेतीस कडिहारा । नवसै पांच और नव हजार ॥

पीढी १२

द्वादशवें वंश छत्तीस कडिहारा । ३६ दोसै सत्तर सात हजार ॥

पीढी १३

तेरहा वंश अंशकी बानी । चालिस कडिहार तिनके परमानी॥
सोरासहस्र चारिसै पन्द्रा । १६४१५ । पहुँचे लोक मिठै यम निद्रा॥

पीढी १४

चौदह वंश अंश निर्बाना । बावन ५२ कडिहार बोहित परवाना॥
तीससहस्र और नवसे तेरा । ३०९१३ सब पंथका न होय निबेरा॥

पीढी १५

पन्द्र वंश अंश चलि आवै । पंथ मेठि आप पंथ चलावै ॥
साठि कडिहार मिलि बोध चलावै । साठि हजार हंस मुक्तावै ॥
चालिस मण्डल भयो पसारा । तबहि पंथ चले असरारा ॥

बोधसागर

( १५१ )

पीठी १६

सोरह वंश कला अधिकारी। सत्तर ७० कडिहार शब्द उजियारी॥
चौंसठ हजार पांचसै बारा। ६४५१२। इतने हंस सब उतरे पारा॥

पीठी १७

सत्रह वंश अंशकी बानी। असी कडिहार तिन्हकी परमानी ॥
छिहत्तर सहस्र पांचसै तीसा। ७६५३०। धर्मदास कुल आदिसदीसा

पीठी १८

वंश अठरहे नवे कडिहारा। असी हजार हंस लै उतरे पारा ॥
८००००० तब कलियुगकी दसी मिटाई। वंश अंश प्रगटे अधिकाई ॥

पीठी १९

उन्निस वंश अंश अधिकारा। एकसै सात तिन्हके कडिहारा ॥
छानवे हजार सातसै दोई। ९६७०२। इतने हंस लोकको होई ॥

पीठी २०

बीसो वंश अंशकी बानी। एकसौ तेरह कडिहार बखानी ॥
लाख एक औ बीस हजार। पांचसै हंस ज्योति निर्धारा ॥
॥ १२०५०० ॥

पीठी २१

वंश एकसौ जग चलि आई। एकसौ तीस कडिहार अधिकाई ॥
१३० लाख दोय और तीस हजार। छःसे अंश जो पांच अधिकारा ॥
॥ २३०६०५ ॥

पीठी २२

वंश बावीसे दोय सौ कडिहारा २००। तीन लाख और चालिस
हजारा। सातसौ अंस जो बीस अधिकारा ॥ ३४०७२० ॥
जाग्रत बंस करे कडिहारा ॥

( १५२ )

कबीरबानी

पीढी २३

तेहस वंश अंशका बानी । दोईसै तेरा कडिहारा जो जानी २१३॥
तीन लाख और तीस हजार । इतने हंस जो पांच अधिकारा
॥ ३३०००५ ॥

पीढी २४

चौवीसे वंश अंश जग आवै । तीनसे कडिहार बीसते पावै ॥

पीढी २५

लाख चारि जो तीस हजार । चालिस हंस पहुँचे दरबारा ॥
वंश पचीसे तीनसे छप्पन कडिहारा । लाख पांच हंस भयो पारा ॥

पीढी २६

छबीसौ वंश चारसौ कडिहारा । लाख पांच और तीन हजार ॥
नबसै सत्तर हंस उबारा ॥ ५०३९७० ॥
इतना मर्म हंसको जानी । सब मंडल अटले रजधानी ॥

पीढी २७

सत्ताविस वंश अंश अधिकारी । छःसो हंस करै कडिहारी ॥ ६०० ॥
सात लाख छानवै हजार । सातसै पैसठ हंसनिर्धारा ॥ ७९६७६५

पीढी २८

वंश अठाविस जाग्रत होई । पांचसौ कडिहार जो पंद्ररा सोई ॥ ५१५ ॥
लाख चारि जो बीस करोरी । पैतिस हजार तीन सौ कोरी ॥
॥ २००४३५३०० ॥

पीढी २९

उनतिस वंश मंडल उनचासा ॥ सातसै तीस कडिहार प्रकाशा ॥
७३० ॥ तीस करोर लाख है सोरा । साठ हजार सात सौ तेरा ॥
॥ ३०१६६०७१३ ॥

बोधसागर

( १५३ )

पीढ़ी ३०

वंश तीस नौसों कडिहारा ९०० बयालीस करोड़ लाख है सत्रा ॥ बारा हजार आठसों सत्रा ॥ ४२१७१२८१७ ॥ इतना हंस कीन्ह पवित्रा ॥

पीढ़ी ३१

एकतिस वंश त्रेपन हजारा । चारिसौ बावन भये कडिहारा ४५२ सत्तर करोड़ और पैंसठ लाख । सैंतालिस हजार और नौसे बावन हंस उबारा ॥ ७०६५४७९५२ ॥

पीढ़ी ३२

बतीसे वंश सतावन हजारा । नौसौ सैंतालिस तिनके कडिहारा ५७९४७ ॥ एक पदम दोय नील बखानी । छहत्र करोड़ लाख बाविस जानी । नौ हजार सातसे तेरे । इतने हंस पहुँचे निजमेरे १०२००००७६२२०९७१३ ॥

पीढ़ी ३३

तेतिस वंश ओनसठि हजारा । छेत्तीस हंस अधिकारी कडिहारा । ५९०३६ । चारी शंख पदम दस सोई । तीस खर्व नील ब्यालिस होई ॥ सित्तर लाख और पचीस हजारा । सातसे हंस चार अधिकारा ॥ ४१०४२३०००००७०२५७०४

पीढ़ी ३४

चौतीसौ वंश और बासठि हजारा । सातसों चौपन तिन्हके कडिहारा ॥ ६२७५४ ॥ छतिस शंख खर्व उनहत्तर ॥ चारि पदम अर्व छेहत्तर ॥ बत्तीस करोड़ लाख नव आवै । ब्यालिस हजार तीनसे आवै ३६०४००६९७६३२०९४२३०० ॥

पीढ़ी ३५

वंश पैंतिससत्तर हजारा । पांचसै उनचास तिनके कडिहारा ॥ ७०६४९ ॥ पदम असी सात खर्व अर्व है बारे । छत्तीस

( १५४ )

कबीरबानी

कोड़ लाख है तेरे । बारे हजार नवसै साता । पहुँचे हंस निज
इतने साथ ८००००७१२३६१३१२९०७ ॥

पीढ़ी ३६

छत्तीस बंस और साठ हजारा । तीनसै चौसठ तिन्हके कडि-
हारा ॥ ६०३६४ ॥ पचहत्तर पदम खरब उनचासा । अर्बुद
सात करोड़ पचासा ॥ लाख चार तेरा हजारा सातसै बावन ।
इतने हंस पहुँचे मनभावन ॥ ७५००४९०७५०००४१३७५२ ॥

पीढ़ी ३७

सतीससै वंश और चौसठ हजारा । सातसै पैतालीस हैं कडि-
हारा ॥ ६४७४५ ॥ सत्तर शंख पदम नव होई । छचासी
खर्व नील बावन सोई ॥ नव अर्बुद हैं चौदह करोड़ी । ग्यारे
लाखा बारे हजारा नौसै तेरे जोड़ी । मंडल अठानवें फिरे
दोहार्द । सत्य थापि असत्य उठार्द ॥ ७००९५२८६०९१४१
११२९१३ ॥

पीढ़ी ३८

अडतीसौ वंश बहत्तर हजारा । छहसै तेरा हंस कडिहारा ॥
७२६१३ ॥ शंख तीस और खरब है सोरा । नव अर्बुद करोर
है तेरा ॥ छप्पन लाख हजार चौबीसा । नवसै बहत्तर पहुँचे
हंसा ॥ ३०००००१६०९१३५६२४९७२ ॥

पीढ़ी ३९

उनतालीस वंश और असी हजारा । सातसौ तिहत्तर तिनके
कडिहारा ॥ ८०७७३ ॥ पांच अशंख शंख पंचवीसा ।
चालिस पदम नील एक बीसा । सात खरब अरब है बारे ।
नव करोड़ लाख है छचालु । पंचवीस हजार सातसौ बानी ।
बानी उत्तम जानि बखानी । इतने हंस लोक भल जानी ।

बोधसागर

( १६६ )

पीढी ४०

चालिस वंश छ्यासी हजार । नवसै बहत्तर तिनके कडिहार॥
४६९७२ ॥ नव शंख नीले हैं । बाबन । पचहत्तरि खरब ॥
अर्ब दोय भावन ॥ सात करोड़ और बत्तिस लाख ॥
त्रेसठ हजार पांचसै तेरा साथ । इतने हंस लोक लै राखा ॥
९००५२७५०२०७३२६३५१३ ॥

पीढी ४१

व्यालीसवै वंश विस्तारा । लाख एक चौसठ हजार
कडिहारा ॥ गणित हंस लहै को पारा । १६४००० ॥
तीस अंश शंख परदा सोई । आठ नील नौ खर्ब तहां होई॥
अर्ब बयालिस तेरा करोड़ी । ग्यारा लाख सहस्र दश जोरी॥
इतनो वंश अंश हंसको लेखा । जो पहुँचे सो करै विवेका ॥
३०१५०००८०९४२१३१११००० ॥

एते बचन वंश परमाना । सो पावै निज वंशको पाना ॥
चारि गुरुके बाहर राखो । उन्हके प्रमान उन्हीसो भाखो॥

साखी-कहै कबीर

वंश अंश हंसकी निर्णय, और कडिहारी लेख ।
कहैं कबीर धर्मदास सों तुम हिरदै करो विवेक ॥
लिखेत कबीर बाकीके कलसा । धर्मदास पूछेव ।

चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसारी । धनि सतगुरु तुम्हरी बलिहारी॥
संशय एक मोरे दिल आई । सो समर्थ मोहे कहा समुझाई ॥
इतना आगम ठानी तुम राखा । सो समर्थ तुम आगम भाखा ॥
वंश संग चलै कडिहारा । सो तुम खोलि कहो विस्तारा॥
कडिहार संग जो हंस पियाना । ताका तोतुल्लकीन्हा बन्धाना॥

( १५६ )

कबीरबानी

तिनमें फेरफार कछु नाईं । सो समर्थ कहिं दिखलाई ॥
सबही हंसलोकको जाई । तो काहेको पुनि करै कमाई ॥
सब कडिहार जहँ एक ठिकाना । सब हंसनको एकै स्थाना ॥
सबही हंसा एक सरीखा । अबगुरुमहिमाकोकौनविशेषा ॥
एक भौम्य एक है स्थाना । सब कडिहार एक करि जाना ॥
वचन वंश थापै कडिहारके बोधे । योग युक्ति काहेको सोधे ॥
काहेको एहि तन मन वारे । काहेको धन जोवन गारे ॥
काहेको चरणाभूत लेही । सीथ लियेकी महिमा केही ॥
सबही हंस हैं एक समाना । काहेको चौका आरतिठाना ॥

साखी-धर्मदास

भलौ नांव बाही कैलको, जिव सब एक न समान ।
जैसी कमाई जीवकी, ताको देवै सोउ स्थान ॥

चौपाई सद्गुरु कबीर उवाच

सुनो धर्मदास यह भेद नियारा । तुमकोखोलिकहों सोनिस्तारा ॥
सब रजधानी पुरुषहि कीन्हा । कैलकसिखावनपुरुषहिदीन्हा ॥
ऐसी शंक जिन पूछो भाई । कच्चा जीव बिचलिके जाई ॥
समुझे हंस बहुत सुख पाई । सर्वज्ञान कालमूल बताई ॥
द्वादश पंथ भेद ना पावो । सातों सुरति पुरुष निर्मावो ॥
सर्व सरीखे नहिं होय कडिहारा । कैसे रहे एक दरबारा ॥
केतिक सातों सुरति घर जैहैं । उन्हके दीपमो वासा लैहैं ॥
सोलहै अंश समर्थ बड़ कीन्हा । उन्हको दीप बड़े बड़े दीन्हा ॥
कितने रहैं उन्हे दीप मँझारा । आपन बोध लिये कडिहारा ॥
अवरदीप पुरुषके रहई । उन्हीं दीपमें वासा लहई ॥

बोधसागर

( १६७ )

सहस्र अठासी दीप सुधेरा ८८००० । तहाँ सब हँसा करै बसेरा ॥
सब दीपनमाँ शोभा पावैं । वहाँके गए बहुरि नहिं आवैं ॥

गुह्यभेद

एक बात है अन्य नियारी । सोइ मैं धर्मनि कहीं पुकारी ॥
सकल दीप थे दीप निन्यारा । तहवाँ अमरथको दरबारा ॥
कितने कडिहार वा घरकूँ जाई । गुप्त भेद तुम अच्छप छिपाई ॥

छन्द—तहाँ समर्थ आपबिराज है ताका महिमा को लहै ।
दीपउजियारी कहा बरनौ बास स्वासा सो रहै ॥
आन दीपके हंस हैं सो वाको जाने नहीं ॥
उहाँके वासी हंस सोहेला सो और दीप मानैं नहीं ॥
सदा हजूरी हंस विहँगम जिन देही उन बिसराइया ॥
गुरु शिष्य दोई एक होइकै सो वा दीपसिधाइया ॥

सोरठा—कदली केरे पात, पात पातमें पात है ।
ऐसे बात बातमें बात, जानेगा जन जोहरी ॥

चौपाई—धर्मदास उवाच

धर्मदास फिरि शीस नवावा । दोउ कर जोरिके विनतीलावा ॥
सोइ हंस रहै पुरुष हजूरी । उनकी रहनि कहौ गुरु थोरी ॥
कैसे रहै वे कैसे बोलैं । कैसे बैठैं वे कैसे डोलैं ॥
कौन ज्ञान कौन है करनी । सो सद्गुरु कहो मोहि बरनी ॥
जगमें रहै कौन सत्य भाऊ । कैसे काया केर सुभाऊ ॥
आन दीप रहै सत्य सुभाऊ । कहो उन्हकी कायाकेर प्रभाऊ ॥
दोउकी परचै मोहि सुनावो । ज्ञान दृष्टि करि मोहि दिखावो ॥

साखी—यह कछु अचरज बात है, कहि दिखावो मोहि ।
देखो ज्ञान बिचारिके, तबहि हृदय सुख होहि ॥

( १५८ )

कबीरबानी

सद्गुरु कबीर उवाच

सुनो धर्मदास मैं कहूँ समझुझाई । गुह्य भेद जिन बाहेर जाई ॥
द्वादश पंथ यह भेद न पावे । वेहे दोजकका पंथ चलावे ॥
बहुत होइहै अपनो कडिहारा । सो नहि जाने भेद हमारा ॥
पूर्ण दया सद्गुरुकी होई । वंश आपुमें लेहि समोई ॥
जिनकं देहि निर अक्षर पहिचानी । सो कडिहार लेअगमकीबानी ॥
सो निज पावे भेद टकसारा । सदा हुजूरी पलकनहि न्यारा ॥
देखा देखी करै कडिहारा । भेद न पूछे सूठ गँवारा ॥
देखा देखी बोध चलावै । फूलि फूलि साखी पढ़ गावै ॥
चौके बैठि ना करै निरुवारा । चौका जुगति ना जाने गँवारा ॥
पुरुष अंश पुरुष सम होई । अपने दीप ले जावे सोई ॥

विहंगमतिके हंसवर्णन

अब तुम सुनौ विहंगम बानी । विहंगमति हंस पहँचानी ॥
निरअक्षर निस्तत्त्व निवासा । निहंतत्त्व अगम्य है वासा ॥
चौका करै जानै वहिवारा । अंश बनीसै सबसो प्यारा ॥
सब अंशनको प्रमाण करिजानै । अपने अपने स्थान वे जानै ॥
सब अंशनकी लाग्य चुकावे । सुरति निरति सद्गुरुसों पावे ॥
नौतम सुरति संग सनेही । एको पलक दूर नहि होई ॥
ओ कहिये बोहोत कडिहारा । सदाहुजूरी पलक नहि न्यारा ॥
अस कडिहार ते साररसहोही । एक प्राण दोई है देही ॥

साखी-जैसी मति कडिहारकी, तैसी मति हंस होय ।

सदाहुजूरी पुरुषके, छिन छिन दर्शन जोय ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सुने सद्गुरु कडिहार रहानी । सबहि स्थान परे मोहि जानी ॥
अब कहिये नूर हंसका भाऊ । सो समर्थ मोहि बानी सुनाऊ ॥

बोधसागर

( १५९ )

आन दीपमों करै रजधानी । प्रथम भाषौ उनकी सहिदानी ॥
सदा रहै वह पुरुष हजूरी । उन हंसनकी कहो मत पूरी ॥

साखी-जेहि तुम बानी कहत हौ, मोहि सुनि होत अनन्द ।
पूरा सदगुरु पाइया, मिटे कालके फन्द ॥

चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच
आनद्वीपके हंसनके वर्णनकी

अब सुनियो उन हंसनकी बानी । कुल करनीमें रहै लपटानी ॥
सहजभाव वोह भक्ति करैहीं । झूठ संसार सों रहै सनेहीं ॥
चौका आरति ज्ञान समाना । दोह दिशा वह रहै लपटाना ॥
इतनी वंश छाप अधिकाई । थोखे हंस नष्ट नहि जाई ॥
जिन्ह जैसी चाल प्रमाना । जो जस पहुंचे जाहि स्थाना ॥
जिन हंसन जैसो सुतन सवारा । जाहि दीपमें बास बसारा ॥
सब दीपनमें करै आनंदा । देहि कांत ऊगे रवि चन्दा ॥

विहंगमस्ती हंसके वर्णन

अब तुम सुनो उन हंसकी बानी । विहंग मताके हंस पहिचानी ॥
जगमें रहै कमल जस भाऊ । तन मन यौवन सब विसराऊ ॥
देहि इहां सुरती गुरुरचना । सूझै नहि सुखजीव न मरना ॥
जैसे सर्प कांचरी जानै । कायाको ऐसे करि मानै ॥
युक्ती युक्ती देह बनावै । जगका सुखनहि उनको भावै ॥
गुरु शिष्य एकै मत होही । एकै प्राण दाई है देही ॥
सो कडिहार गुह्य नहिं भाई । सोही जाने ताके ताई ॥
सोई हंस जानौ सब दूरी । जिन्हको कहिये पुरुषहजूरी ॥
नूतन सुरति है उनके पास । सो कडिहार रहत उरदासा ॥
ज्ञान ध्यान सदगुरु मन प्यारा । सदा हजर पलकनहि न्यारा ॥
युक्ति सांझि चरणामृत लेही । युक्तिहि युक्ति बनावै देही ॥
सदा रहे वह पुरुष हजूरा । छिन छिनदर्शपलक नहिं दूरा ॥

( १६० )

कबीरबानी

चार लाख छानवै हजारा । नवसै बावन निज कडिहारा ॥
इतने कडिहारनिजधरै सिधवै । छिन छिन दर्श पुरुषका पावै ॥
इतनेके शिर छत्र धराई । अर्थ सिंहासन बैठक पाई ॥
हंस सुहल जाइ हजुरी । छयानौं लाख औरतेराकरोरी ॥
बावन हजार पांचसे आवै । इतने हंस शिर चैवर करावै ॥
एक देही एकै हैं मूला । पुरुष हंस एकसम तूला ॥
पुरुष हंस एक सम भाई । सबके शीसपर छत्र तनाई ॥
इतना सुख है पुरुष हजुरा । पहुँचे हंस सदगुर मत पूरा ॥

साखी-निःतत्त्व भेद यह गुप्त है, पांच तीनसे न्यार ।

निःतत्त्वी जो हंस हैं, जैहैं पुरुष दरबार ॥

धर्मदास वचन चौपाई

सांचे सतगुरुकी बलिहारी । अपनाकरिजिन लीन्ह उबारी ॥
कठिन काल दारुन बड़ होई । यहि संसार लखै ना कोई ॥
विन सतगुरु कोई भेद ना पावै । सतगुरु मिले तो संधि लखावै ॥

साखी-मनका संसय सब मिटा, हम पाया गुरु पूर ।

विना परिचय जो गुरु करै, सो नर मूरख क्रूर ॥

चौपाई

सुनौ धर्मदास हम तुम्हैं बखानी । आदि अन्तकी सुधि तुम जानी ॥
सम्भवत पंद्रसै उनहतर आवै । सतगुरु चले उड़ीसा जावै ॥
जबलगि वंश करै गुरु आई । तब लगि धरनी धरौं न पाई ॥
जबलगि वंशब्यालिस संसारा । तबलगि नहिं आऊँ पिछारा ॥
वचनवंश हम ब्यालिस भाखा । जगकी मुक्ति वचनकी शाखा ॥

साखी-तीन लोक के बाहिरे, सात सुरतिके पार ।

तइवाँ हंस पहुँचावहुँ, समरथके दरबार ॥

इति ग्रन्थ कबीरबानी समाप्त

बोधसागर

( १६१ )

विवेचन

इस ग्रन्थकी एक ही प्रति सम्बत् १८४७ की लिखी हुई है इसकी दूसरी प्रति न होनेसे बहुत स्थानोंमें ज्योंका त्यों छोड़ना पड़ा है और अशुद्धियाँ रह गयी हैं । जब इतने वर्ष पीछेकी लिखी कबीरपंथी ग्रन्थोंकी यह दशा है तब नवीन कबीर पंथियोंकी लिखे ग्रन्थोंकी क्या गति होगी पाठक स्वयम् विचार कर लें ॥

इति

कर्मबोध (एकोनविंश तरंग)

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष,
मुनीन्द्र, कर्तुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन,
धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम,
कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम,
अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम,
पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम,
उग्र नाम, दया नामकी वंश-
व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

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एकोनविंशस्तरंगः

कर्मबोध

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कर्म कथा अब कई बखानी । जौन फांस अटके नरप्रानी ॥
चारों खानि कर्म अधिकाई । चहूँ खानी मिलि कर्म हढ़ाई ॥
कर्महि धरती पवन अकाशा । कर्महि चन्द्र शूर प्रकाशा ॥
कर्महि ब्रह्मा विष्णु महेश । कर्महिते भयो गौरि गणेशा ॥

बोधसागर

( १६३ )

सात बार पन्द्रह तिथि साजा । नौ ग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कर्महि राम कृष्ण अवतारा । कर्महि रावण कंस संहारा ॥
कर्महिते ले वसुदेव घर आवा । कर्म यशोदा गोद खिलावा ॥
कर्महिते वन गऊ चराई । कर्मते गोपी केलि कराई ॥
कौशलया तप कर्म जो करिया । कारण कर्म राम औतरिया ॥
कर्महि दशरथ कीन्ह उदासा । कर्महि राम दीन्ह बनवासा ॥
कर्म जाय जब धनुष चढ़ावा । कर्महिजनक सुता सिर नावा ॥
कर्म हरचो सीता कहैं आई । दुख सुख कर्मताहि भुगताई ॥
कर्म रेखते कोई न मुक्ता । लछिमन राम करम फल भुगता ॥
कर्मसागर बांधेउ बन्ध कहिया । कर्महिजल जीवन दुख सहिया ॥
रुद्र राम कर्म कीन्ह लड़ाई । भला मिलाप हनू भेट चढ़ाई ॥
कर्मरेख नहिं मिटे मिटाई । जीव पपील लंका होय आई ॥
कर्मरेख लंकापति गयो । लंकापति बिभीषण भयो ॥
कर्म रेख सबहीं पर छाजा । कहा राम कह रावण राजा ॥
कर्मरेख सबहीं पर होई । देखो शब्द बिलोय बिलोई ॥
कर्मरेख सागर बँध हीना । बिरला कोई चीन्हे चीन्हा ॥

साखी-कर्म रेख सागर बँध्यो, सौयोजन मर्याद ।
विन अक्षर कोई ना छुटे, अक्षर अगम अगाध ॥

रमैनी

सागर भव सागर धारा । नहिं कुछ सूझे वार न पारा ॥
तहवाँ बावन अक्षर लेखा । कर्म रेख सबहिन पर देखा ॥
कर्म रेख बंधा सब कोई । खानी बानी देखि बिलोई ॥
वेद कितेब कर्महीं गाया । कर्महिको निःकर्म बताया ॥
सद्गुरु मिले तो भेद बतावैं । कर्म अकर्म मध्य दिखलावैं ॥
कर्म अकर्म मध्य है सोई । सो निःकर्म अकर्म न होई ॥

( १६४ )

कर्मबोध

अक्षर सागर निर्भर बानी । अक्षर कर्म सबन पर जानी ॥
गोरख भरथरि गोपीचन्दा । कर्म फांस सबही पुनि फन्दा ॥
सौ औ सात चौदह इक्कीसा । ब्रह्माके चौरासी भेसा ॥
कर्म फांस तहवों लग राखा । जहाँ लगवेद व्यास कछु भाषा ॥
दश औ द्वादश कर्म बखाना । जिन जाना तिनही पहिचाना ॥
कर्म अकर्म मूल जो करई । गहे मूल सो कर्म न परई ॥
अक्षर सागर मूल भँडारा । अक्षर मूल भेद उजियारा ॥
अक्षर मूल भेद जो जाने । कर्मी होय निःकर्म बखाने ॥

साखी-कबीर-कर्म डोर चारों युग, सुनो सन्त सब दास ।
तत्त्वभेद निस्तत्त्व लहि, जगते रहो उदास ॥

रमैनी

सतयुग तप कीन्हे रघुराजा । कारन कर्म नन्द घर गाजा ॥
एक नारि रघुवर दुख पावा । सोलह सहस गोपी निरमावा ॥
कारन कर्म केलि भवकीन्हा । कुञ्ज कुञ्ज गोपिन सुख दीन्हा ॥
जहँ तहँ गोरस जाय चुरावा । जहँ तहँ कर्म तहाँ ले खावा ॥
कर्म कंस ठीका आयो जबहीं । मारन कृष्ण विचान्यो तबहीं ॥
कर्म पूतना भेष बनायो । कर्म पयोधर कृष्ण लगायो ॥
कर्म कारण जो तहाँ सिधारा । कारण कर्म पीव विषधारा ॥
मारि तासु कीन्हीं गति चारा । कर्म फांस बोन्यो संसारा ॥
कर्म इन्द्र बरस्यो दिन साता । कर्म कृष्ण गिरि लीन्यो हाथा ॥
कर्महि मारि विध्वंस जो कीन्हा । कर्म फांस सबही आधीना ॥
कुञ्जा कछू कर्म जो कीन्हा । कारन कर्म कृष्णगति दीन्हा ॥
कर्मपताल कालेश्वर नाथा । सांवर अङ्ग भयो तेहि साथा ॥
यज्ञ अश्वमेध करत बलिराजा । कर्मते जाय पताल विराजा ॥
कर्मही वामन रूप बनाया । बलिराजापै दान दिवाया ॥