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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना तथा धर्मदास साहबका सद्गुरुसे मिलनेके लिये भंडारा करना और चौथीबार सद्गुरुका मिलना

बोधसागर

(३१)

मोरे प्रान पियारे तुम्ह हौ । केहि कारण अनत लेजे हौ ॥

कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबकी व्याकुलता

यह कहि धर्मदास पल लाऊँ । जिन्दा गुप्त भये तेहि ठाऊँ ॥
धर्मदास पुढुमी परु हारी । सद्गुरु कहैं बहु कीन्ह गोहारी ॥
मोहिं समको जग आहि अभाग । छुटे नदेह ठगौरी लागा ॥
जिमीभुअँग मणि जाइ हेराई । विकल फिरहिं जित तित बिललाई ॥
उहै हाल सद्गुरु विनु मोरा । कत पल दियेउ मन्द मति मोरा ॥
काह करौं कित दर्शन पाऊँ । बिनु दर्शन मैं प्रान गवाऊँ ॥
कीन्ह विवेक मन धीरज दीन्हा । मन महाँ पकर एक पुनिकीन्हा ॥
करौं महोत्सव संत अवराधौ । तब दर्शन देहिं पुरुष अनादी ॥
साहेब सन्त सनेही आहीं । सन्तन तजि वह अंत न जाहीं ॥
असहिय ठानि भवन चलि गयऊ । सन्त प्रसादको चितवन कियऊ ॥
संत धाम जहाँ लगि गम पावा । तहां तहां विनती नेवति पठावा ॥
छन्द-दिन अवधि वाही जुरन लागे बहु भेष पहुँचे आयहो ॥
दीहुँ जुथथि सेज आश्रम कीन्ह विनती जाइ हो ॥
दे भाव भोजन गमनिरश्वहिं सकल भेष अलेखही ॥
सबहिं निरखहिं सुरति परखहिं हृदय समाह विवेकही ॥
दोहा-पान सुपारी हाथलै, करहिं दण्डवत जाय ॥
भेषन सो चित विलखिके, पूछहिं मन परिचाय ॥
सोरठा-तुम्ह हो सन्त सुजान, निजदासन्ह सुख देतुहौ ॥
सत्य पुरुष सहिदान, सत्य लोक महिमा कहो ॥

बेष मता वर्णन

जोपाई

कोई कहै त्रिदेव अवराधौ । कोई कहै व्रत करि तन साधौ ॥
कोई कहै करु प्रतिमा सेवा । कोई तीरथ कोई जपत प भेवा ॥

(३२)

ज्ञानप्रकाश

कृत्रिमभक्ति जो सबै दृढावै । सत्य सारपद नाहि बतावै ॥
तब अकुलायसंसाथरि जोये । प्रगट नहीं गुप्तहिं हिय रोये ॥
प्रति आश्रमगम्यउठी निरासा । जिततितचितवहिं धर्मनिदासा ॥
पुनि चितवनउत्तरदिशिकीन्हा । मूरति एक भिन्न तहैं चीन्हा ॥
धमदास तहैं बेगि सिधाये । प्रथम रूपको दरशन पाये ॥
धायचरणगहि अति अदरागा । बुन्दपाय चात्रिक जिमि पागा ॥
गुरु पद पायप्रीति चित जागा । होसतगुरु मोहिं कीन्ह सुभागा ॥
धाये चरणनगहिअति अनुरागा । युगपदगहेउ प्रीति चित लागा ॥
करगहि दास उठायेउ स्वामी । सुधा वचन कह अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम्ह हंस सुहेला । मोहिं दरश कह कीन्हेउ मेला ॥
इच्छा सफल भइ सुन तोरा । अब तुम्ह दरशन पायउ मोरा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु जौ दर्शन नहिं पावत । तौ हम निश्चै प्राण गवाँवत ॥
अब प्रभु कीजे कृपा तुरंता । दीजे बीरा अविचल संता ॥
यमसे तितुका बेगि तोराओ । वन्दी छोरि मोहिं सुकताओ ॥

सतगुरु वचन

सुनुधर्मनि जो कहो सो मानो । तजि संशय धीरज चित आनो ॥
करहु जाय सन्तनसनमाना । ता पीछे दैहों परवाना ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु कहो सोई हम माने । करब जाइ सन्तन्ह सनमाने ॥
हे प्रभु जौ कतहुँ अब जाहू । तौ जीवित नहिं पइहौ साहू ॥

सतगुरु वचन

हे धर्मनि सुनहु मम बानी । कतहुँ न जाब सत्य हियजानी ॥
करि प्रमान चितवत चलु पाछे । जौ नटनिरत सुघरता काछे ॥
जाय कीन्ह सन्तन सनमाना । यथा शक्ति पूजा परधाना ॥