कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना
ज्ञानसागर
( ७१ )
पठवै जीव नाम दे जहँवा । सुक्ति पदारथ फल है तहँवा ॥
चार भातु कामिन उजियारी । मान सरोवर है वह नारी ॥
धर्मदान वचन
धर्मदास कहै अस बानी । स्वामी कहू संत उत्पानी ॥
हंस रूप जो षोडश भाना । कामिनि चार भातु परवाना ॥
साखी-कारण कौन है कामिनि, चार भातु कह्यु थोर ॥
शब्द गहे सब हँसा, संशय भई जब मोर ॥
माहिर कबीर वचन-चोपाई
सुन धर्मनि मैं तोहि बताऊँ । यह सब भेद मैं तोहि बुझाऊँ ॥
चौरासी लक्ष जोइन ठाना । सुक्ति छेत्र नरको उत्पाना ॥
तातैं प्रभु प्रगटे नर भाऊ । ताते शोभा हंस बहु पाऊ ॥
आय अदेह पुरुष रह जहँवा । नर को रूप प्रगट भये तहँवा ॥
जेहि सुक्ति चंदा निर्माई । हंस प्यार सुक्ति अधिकाई ॥
भुंगी कीट शिष्य जो होई । पावै भेद मग्न होय मोई ॥
सिंधु मध्य राह तिन केरा । आवै जीव ताहि सों फेरा ॥
वहै राह भुंग राज कहैं दीन्हा । यही भेद विरले जन चीन्हा ॥
पाहै भेद सन्त जन सोई । आन्यो सतगुरु जेहि गम होई ॥
निज बीरा जो चौरा पावै । इकोतर सौ जीव लोक सिधवै ॥
साखी-यही चरित्र करि आयो, चौरा के व्यवहार ॥
निज बीरा जो पावै, तव जीव होय उवार ॥
चन्दवारैमें प्राकटचकी कथा
चोपाई
आसन कर आयो चंदवारा । चंदन शाह तहाँ पगु धारा ॥
बल रूप धर आयो तहँवा । आठै पहर रहचो मैं जहँवा ॥