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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें लेजानेपर उसको देख लेने पर विश्वास करनेकी बात कहना

बोधसागर

(१२३)

हनुमान बवन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र वचन हमारा । हम नहिं जानै भेद तुम्हारा ॥
कहौ प्रतीति कौन विधि आवै । कैसेके यह मन पतियावै ॥
यह प्रतीति कौनो विधि आयी । तब हम जानि करब सेवकारी ॥
जहँ समरथ तहाँ हम जावै । तबही हमरा मन पतियावै ॥
उहाँ जाइ इहाँ फिरि आऊँ । तब मैं मन परतीति लगाऊँ ॥
जो तुम सत्य सत्य कहि भाखी । तो मोको दिखलाओ आँखी ॥
करौ प्रतीति गहौं तुव शरणा । बारम्बार बंदौ तुव चरणा ॥
जो गहि तुम दिखावो मोको । तबही झूठ न जानौं तोको ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरि गति, बिन देखे नहिं पति आवैं ॥
आदि सृष्टिकी तुम कहत हो, तहाँ कौन विधि जावैं ॥

मुनीन्द्र बवन-चौपाई

जब ऐसो कह्यो हनुमाना । उठे मुनीन्द्र मनमाहीं जाना ॥
उठते देखा फिरि नहिं देखा । देह विदेह भये अवरेखा ॥
पवन रूप होइ गये अकासा । बैठे पुरुष विदेही पास ॥
चहुँदिशि देखे हनुमत वीरा । कौन सूरतिको भयो शरीरा ॥
गैल महिं चले पगधारी । परम प्राण तहाँ लगी खुमारी ॥
देखत चन्द्र वरण उजियारा । अमृत फलका करे अहारा ॥
असंख्य भानु पुरुष उजियारा । कोटिन भानु रोम छबि भारा ॥
देखा चारों दिशा सब झारी । पता न पाय रहे जब हारी ॥
तब हनुमत हाकँ तहाँ मारी । तुम मुनीन्द्र अहौ सुखकारी ॥
अब प्रगट होइके दर्शन दीजे । तुम्हरी विरह मम हिरदय भीजे ॥

साखी-भये विदेही देहधरि, आये हनुमत पास ।
और वरन अरु भेषही, सत्य पुरुष परकाश ॥