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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

नरकका वर्णन

बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥
त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥
एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥
एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥
एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥
कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥
ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥
एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥
त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥
योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥
परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥
मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥
योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥
करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥
राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥
झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥
झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥
झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥
स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥
पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥
अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥
एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥
एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥
काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥
जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥
संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥
ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥
ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥
साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥
जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥
यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥
सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥
धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥

बोधसागर

(७९)

पाप पुण्य रचि जीव फँसाया । जो जस करै सोतस फल पाया ॥
करै पाप तेहि नरक भुगतवैं । करै पुण्य तेहि स्वर्ग पठावैं ॥
कर्महिं भुगुति गरभमें जावै । यहि विधि कालजीव फँदावै ॥
सुनु धर्मदास नरककी बाता । सबही तुमसन कहूं विरुयाता ॥
सकल सुनहु यमपुर इतिहासा । अद्वुत सुनि होय जीव त्रासा ॥
ठीका पुरै जब जिवकी भाई । धर्मराय मन चिन्ता आई ॥
आयसु किंकर गण तब पावैं । हुकुम चित्रगुप्त ताहि सुनावैं ॥
ते जग आवै आयसु पायी । जीवहिं पकरि तहाँ ले जायी ॥
लै जाँहिंसो यम सदन मंझारा । करै ताहि यम सन्मुख ठारा ॥
रवि सुत तहाँ सिहोंसन बैठे । यमगण तहाँ विराजत बैठे ॥
काल सेन तहाँ सबहि विराजै । शास्त्र प्रवर्तक सुनिवर छाजै ॥
धर्मशास्त्र के जे जे करता । सबही देखै जो जिव मरता ॥
व्यास पराशर आदिक सबहीं । पहुँचै यमपुरितनत्यागैतबहीं ॥
ये सब यम सहाय सो करहीं । पाप पुण्यकर लेखा धरहीं ॥
सबहिं मुसाहिब कालके आहीं । निज नैनन हम देखत जाहीं ॥
धर्माधर्म विचारत नीको । सबमिलिन्याय करत करनीको ॥
चित्रगुप्त जब बही सुनावै । धर्म राय कहिके समुझावै ॥
जिन २ पाप किया जग आयी । तिनकर लेखा जब सुनि पायी ॥
ते सुनि दूतन कहत जनायी । यथा योग्य भुगतावहु जायी ॥
जब कोई जीव सुकर्मा आवै । शुचि सुन्दर दूतन तन धावै ॥
रविसुत कहविलसाओ स्वर्गा । अर्थ धर्म अभिमत सुखवर्गा ॥
यही सुकृत जब श्रुतिपथ आही । बहुत समुझायौ हम तुव पाही ॥
साखी पापी मनुषहिं पाइ यम, दूतन कहे रिसाइ ॥
रौरवादिक की यातना, इनाहिं भुगावौ जाइ ॥

(८०)

अमरसिंह बोध

चोपाई

सुनहिं वचन यमगण यमकेरा । त्रास दिखावहिं नरहिं घनेरा ॥
लोह दण्ड सुद्वर हनि कोपै । रौरवादि महाँ तिनही तोपै ॥
यहि विधि यम करहिं विलासा । अब विस्तर ते सुनु धर्मदासा ॥
बहु विधि विद्या जग महाँ पावै । वेद बिचारि जो ब्रह्म समावै ॥
आतम ब्रह्म एक करि जाने । ब्राह्मण सो तेहि वेद बखानै ॥
ऐसे नर कहैं जो कोइ मारै । ब्रह्महत्या तेहि वेद पुकारै ॥
ब्रह्मरूप ब्रह्मविद जाने । तेहि वधन कहैं ब्रह्मवध अनुमानै ॥
जानि ब्रह्म वध पाप कराला । तब दूतन कह यम ततकाला ॥
कुंभीपाक माहि लैडारौ । सुद्वर परिघ मार बहु मारौ ॥
इन रिस करि मारचो महिदेवा । सुनी न मम अनुशासन भेवा ॥
रौरव माँहि गिरावहु घाती । काहू कहै सुनौ नहिं बाती ॥
जो तिय मारै गर्भ गिरावै । तेल यंत्र तनु तासु पिरावै ॥
जिन गुरु हने हने निज स्वामी । छुरा धार ते पीडित नामी ॥
जे विश्वासघात नर करहीं । ते नर कालसूत्र महाँ परहीं ॥
बाल वृद्ध कर हरे जो प्राना । तस तेल महाँ पचत अयाना ॥
परदारा परक्षेत्र जे हरहीं । जे नर परपुर सीम विगरहीं ॥
ते गुरु पाप नरक महाँ पचहीं । हाहाकार शब्द तहाँ मचहीं ॥
चकन ते तिनके तनु छेदैं । सुद्वर परिघ शूल बहु भेदैं ॥
गम्यअगम्य विचार न करहीं । खाज अखाज नहीं चित धरहीं ॥
तिनके तन को करकच छेदैं । बहुत भांति चोचनसों भेदैं ॥
साखी-चोर वृत्ति करि जो जीवै, करै जो परसे द्रोह ॥
झूठ बोलि अरु मद पिवै, पर निन्दा करै जोह ॥
तिन पापिन कहैं यमविकारा । ठौर भयंकर माँझ तेहि डारा ॥
जे नर कन्यादान मँझारी । विघ्न करत रौरव अधिकारी ॥

बोधसागर

(८१)

दान देत लखि भांजी मारै । योग्यअयोग्य जो नाहि उचारे ॥
पर तप मँह कर विघ्न अनेका । नहिं हिय मँह जो करत विवेका ॥
आप छूँछ औरन ब्रत टारै । वेद शास्त्र जिन नाहि उचारे ॥
हरि यश सुनत दहैं मन माहीं । दूसर सुनै तो चित विचलाहीं ॥
तिनकर देह सो कूकर भखहीं । पुनि असिपत्रमांझ दुख भरहीं ॥
एकहु अक्षर गुरुसों सीखै । ताहि न मानै मन कर तीखै ॥
ते परहीं नर रौरव माहीं । बहुविध दुख भुगतहिं सो ताहीं ॥
जे नर हरत दीनके प्रानन । मित्रहि मारत दाहत कानन ॥
तिनहि अँगारन मांझ सुतावैं । यमगण दारुन त्रास दिखावैं ॥
जे गुरुधन हारक संसारा । किम कूप मँह परत निहारा ॥
जौन गुरु व्यभिचारी होई । प्रजहिं दुःख देई नर जोई ॥
शिष्य शंक जो नाहिं मिटावत । प्रजहिं न्याय जो नाहिं चुकावत ॥
युक्त अयुक्त न जानत जोई । करत सपक्ष न्याय शठ कोई ॥
ते नर अंध तामिस्त्र मँझारे । गिरत लखे पावत दुख भारे ॥
विन देखे पर दोष गिनावैं । यम गण तिनके नैन टँकावैं ॥
अप्रिय वचन औरहीं कहहीं । कारण छेददुख ते शठ लहहीं ॥
देव साधु ब्राह्मण धन हरई । तृष्णावश लोभहिं मन धरई ॥
सूचीमुख नरकहिं कर नाऊँ । ते तहैं जाइ वसावैं गाऊँ ॥
जे परतिय अभिलाषत प्रानी । निन्दत सुर गुरु भूसुर जानीं ॥
धर्मशास्त्र तीरथ हरिजन कर । निन्दा करत सुनहु दुख तिनकर ॥
पहिले शूलन पर बैठावैं । मुद्गर शूलनसे करि घावैं ॥
पाछे काक श्वान तेहि खाहीं । छेदहिं दुख सुख हेरत नाहीं ॥
भोगी बहुत काल प्रिय नारी । त्यागत ताहि अधम अविचारी ॥
विनु वैराग ताहिको त्यागे । ताहि त्यागि औरिन मँह पागे ॥
सो शठ नरकमाँहिं दुख पावै । कहँ लग कहौं कहत नहिं आवै ॥
कर पद बाँधि यम सासत देहीं । जो जस किये सो तस फल लेहीं ॥

(८२)

अमरसिंह बोध

सूरज सुत जस आज्ञा देई । दूत उठाय सबै शिर लेई ॥
चित्रगुप्त सो लिखनी लेखै । धर्मराय न्याय तहैं पेखै ॥

सारखी-कै कमाई जो कछू, कभी न निष्फल जाय ॥

सात समुन्दर आडा परै, मिलै अगाऊ धाय ॥

भूमि ताभ्रमय तहां बनाई । तापर अग्नि प्रचण्ड बिछाई ॥
दहकत ज्वाला सो महि कैसी । अति दुस्सह प्रलयगिनि जैसी ॥
तहैं नर जाइ जरत दुख पावैं । यमगण हानि तेहि मांझ जरावैं ॥
तीव्र नख रद शूचीकच केते । पापिन कहैं दुख देहि सब तेते ॥
अति तनु कृश तनु बहु पापी । तहैं दुख पावत जन परितापी ॥
सांकरि बांधि बांधि गज लावैं । अति दृढ सुदूर हानि तेहि ढावैं ॥
दुख लहि जब इतउत नर धावैं । यमगण धरि तिहि माहिं गिरावैं ॥
पुनि निज कृतकर याद करावैं । परिघन हनि बहु त्रास दिखावैं ॥
तस थम्भ बहु ठाड रहावैं । पर तिय गामी ताहि सटावैं ॥
निज पति छोड परपुरुष लुभावैं । सोइ तिया तहैं लाइ मिलावैं ॥
यमगण ताहि मारि भिटावत । कर वचन पुनि ताहि सुनावत ॥
यमके दूत अस कहैं पुकारी । तबतौ तन मन सकल विसारी ॥
प्राण समान चही परनारी । अबकिन भेटेहु रुचि किमि मारी ॥
उन्नत कुच भुजभरि जिमि भेटे । मुख चुम्बन रति करि दुख मेटे ॥
रही जो तव जीवन जग नारी । यह सोइ अपर न करहु विचारी ॥
कलनहिछनजेहि विनतोहि पापी । मिलहु न तिय सँग करत अलापी ॥
यहि विधि यमगण वचन सुनावैं । हनि हनि अधमन खम्भ लगावैं ॥
मद पीवत सँग जे करि प्रीती । मांसहिं खाइ करत अनरीती ॥
तस तैल तेहि मारि पियाई । कहत मदहि पीवहु शठ आई ॥
हाहाकार करै जब सोई । करै विनती सो बहु रोई ॥
ता ऊपर तैलहिं सो डारैं । भीतर बाहर दोऊ विधि जारैं ॥
इतना करैं बहुरि सो आगे । करन शासना सो फिर लागे ॥

बोधसागर

(८३)

असिपत्र बिंपिन महाँ चलहूँ । खायो माँस सोई फल लहहूँ ॥
तहाँ अहँतरु दल अतिही तीखैँ । ऊपर परत कटत तनु दीखैँ ॥
रहत न बने तहाँ पुनि भाजत । करिविलापबहुविधिदुखपावत ॥
करि परघात पाल निज देही । कूटकरमबहु विधिकिय जेही ॥
ते असिपत्र नरक महाँ जावैं । पुनि रकटाइशिर दुख पावैं ॥
एक शिर काटि फेरि होइ आवै । बहुरि कटैं बहुरि है जावै ॥
जे परहिंसक अधम नरेशा । तेलयंत्र तनु पिसत इमेशा ॥
तेल चुराय जो जगमहाँ लेते । यमगण तेहि बहुत दुख देते ॥
तेल चोर कहीं तेल कराही । घृत चोरहिँ घृत माँझ गिराहीं ॥
जेपर दूध मधू दधि हरहीं । ते गण रक्त कुण्ड महाँ परहीं ॥
पाश बाँधि गल तेहि महाँ डारैं । यम गण दारुण त्रास विडारैं ॥
तीरथ चलत जानि फन हरहीं । ते नर रक्त पीब दह परहीं ॥
देव सदन महिसुर गुरुधामा । जे तोडत मन करहिँ अरामा ॥
बन वाटिका पुहम बहु छेदैं । मठ मखं भवन सुरभिधर भेदैं ॥
दीन भवन चटशाल गिरावैं । अस्थिचूर्ण महाँ ते दुख पावैं ॥
पर उपांनत वस्त्र शठ हरहीं । पर भोजन छिपाय जो धरहीं ॥
लोहयंत्र बिच ताहि पिरावैं । बहुविधि तेही दुःख दिखावैं ॥
जे नर घर पुर विपिन जरावत । अग्निकुण्ड तनु तासु गिरावत ॥
जे निज स्वामिहि दोष लगावैं । पर अपवाद प्रीति करि गावैं ॥
तिन कहीं नकं शाल्मली डारै । पाश बाँधि लटकात तरारै ॥
मुद्गर परिघन यमगण मारैं । निर्दय तनक न करूणा धारैं ॥
जो तिरिया परपति रत होई । नाथवती विधवा किन होई ॥
तस लोहमय खम्ब नराकृति । यम वशसे तेहि तिय भेटति ॥
लोह शूल खर तस विशाला । जीभ छेद मुख करत विहाला ॥
इमिदुख लहँहि अधम नरनारी । कहाँ लगिकहाँ सोलेहु विचारी ॥

१ यज्ञशाला । २ गोशाला । ३ जूता ।