कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना
बोधसागर
( ३७ )
सतगुरु वचन
चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥
चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥
चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥
चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥
चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥
सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥
राजा वचन
मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥
गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥
ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥
एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥
तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥
खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥
त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥
हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥
और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥
अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥
सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥
चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥
केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥
युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥
( ३८ )
जगजीवनबोध
शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥
इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥
राजा वचन
धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥
सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥
हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥
कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥
नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥
चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥
सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥
सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥
जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥
सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।
महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥
चौपाई
जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥
दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥
तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥
चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥
पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥
छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥
सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥
अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥
नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥
दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥
ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥