कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और निरंजनके डरसे डरना और शाप पाना, निडर होना
अवुरागसागर
( ३९ )
ब्रह्मादि शिवसनकादिनारदको उन बचि भागहो ॥
सुनुधरमनिविरलाबच शब्द सतसो लागि हो ॥२८॥
सो-० सत्य शब्द परताप, कालकला व्यापै नहीं ॥
निकट न आवै पाप, मनवच कर्म जो पदगहे ॥२९॥
शाप देदेने पर अधाका पश्चाताप और निरंजनके डरसे डरना । छन्द
शाप तीनोंको दैलियो मन माहीं तब पछतावई ॥
कस करहि मोहि निरंजनापल छमा मोहि नआवई ॥
निरंजनका अधाको शाप देना
आकाशबानी तबै भयी यहू काह कीन भवानिया ॥
उत्पत्तिकारणतोहिपठाई कहा चरित यह ठानिया ॥
सो-० नीचहि ऊच सिताय, बदल मोहि सोपावई ॥
द्वापर युग जब आय तुमहिं पञ्च भर्तार हो ॥३०॥
अधाका निडर होना । कबीर वचन धर्मदासप्रति
शाप ओयल जब सुनेउ भवानी । मनसन गुने कहा नहि बानी ॥
ओयल प्रभाव शाप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहौ तस करौ मितार्ई ॥
विष्णुका गौरसे श्याम होने का कारण अधावचन विष्णुप्रति
पुनि कहि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इकवचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहौ बुझाई । पितुपद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुम गौर शरीरा । कारण कौन श्याम भये धीरा ॥
विष्णुवचन अधा प्रति
आज्ञा पाय हम तत्काला । पितुपद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहां । चले पताल पंथ मग जाहां ॥
पहुँचि शेष नाग पहुँ गयऊ । विषके तेज हम अलसयऊ ॥