कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ
(७०)
अमरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥
पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥
साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥
कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥
चौपाई
कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥
इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥
पुरुष वचन
अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥
सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥
साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥
सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥
चौपाई
पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥
मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥
ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥
देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥
ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥
चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥
आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥
राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥
ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥
हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥
राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥