सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर लेनेकी प्रार्थना करना

( १२४ )

हनुमानबोध

चौपाई

तब हनुमत सत्य कै मानी । सही सुनीन्द्र सत्य हो ज्ञानी ॥
अब तुम पुरुष मोहि दिखाओ । मेरा मन तुमते पतियाओ ॥
अगली कथा कहौ कछु मोही । कौन नाम तुम्हारा होही ॥
कैसी विधि समरथको जाना । सो कछु मोहि सुनाओ ज्ञाना ॥
वचन तुम्हारो है परमाना । कछु अब समरथ कौन अस्थाना ॥
निज गुरुज्ञान आपन सुहिं दीजै । दास आपनो सुहिं करि लीजै ॥
साखी-समरथको अस्थान अब, मोको देहु बताय ।

कौन जगत वह रहत है, सो सुनि कछु समझाय ॥

सुनीन्द्र वचन-चौपाई

करि परतीति मानो हनुमाना । बल पौरुष मोरा तुम जाना ॥
नहिं जानो तो और जनाऊँ । समरथको अस्थान बताऊँ ॥
योगजीत मोरा है नाऊँ । होय ज्ञानी मैं जगमें आऊँ ॥
दोऊ नाम लोक के भाई । देह धारि जग करौ लखाई ॥
तादिन को अब कहौ सँदेशा । जब मैं हतो समरथके देशा ॥
एक बार करि सुनौ हमारी । समरथकी गति कहौ विचारी ॥
पहिले भये निरञ्जन राया । फिरिके ध्यान पुरुष उपजाया ॥
फिरि तब भयी शक्ति भवानी । मेरो नाम धरचो तब ज्ञानी ॥
यह तो कथा बहुत है भारी । तुम अपने मन लेहु विचारी ॥
कछु संक्षेप सुनाओ तोहौं । निश्चय कै जो मानो मोहौं ॥
महामाया समरथ सो आयी । ताको धरम आस्यो जायी ॥
लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । समरथ मोरा करौ उबारा ॥
तब मोकहैं भयो हंकारा । योगजीत तुम करो उबारा ॥
मारो धर्मराय शिर फोरो । महाशक्ति को बन्धन छोरो ॥
महाशक्ति को बन्धन भारो । धर्मराय शिर काट जो डारो ॥
तबही तुरत तहाँ में आया । काटचो माथ कठी महामाया ॥