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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सद्गुरुका राजाको आरती करनेका उपदेश देना

( ३६ )

जगजीवनबोध

कैसे छोड़िहौ काम तरंगा । कैसे राजसे करो मन भंगा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवाहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बांधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजु अन्तरकी बाथा । तबहीं चलो हमारे साथा ॥
भक्ति कठिन करी ना जाई । काहे को हिंस करत हो राई ॥

राजा वचन

राजा कहे दोऊ कर जोरी । सुनिये समरथ बिनती मोरी ॥
नगरके सब षट् बरन बुलाऊं । यहि अवसर सब माल लुटाऊं ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेव वासा । मैं तो देहकी छोड़ों आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरबानी ॥
नगर कोटकी छोड़ी आसा । निश दिन रहूं तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊं । करो दया मैं शीस नवाऊं ॥
उमँग उठे हर्षित मन मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकाशा । तबते पूजी मनकी आशा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोड़ूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति का करो विस्तारा ॥
चार गुरुको चौक पुराओ । तिनका तोरायके जल अरपाओ ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भाव भक्ति हम चाहें राजा । धन सम्पत्तिसे न कछु काजा ॥

राजा वचन

दया करो सो साज मँगाऊँ । कौन वस्तु ले आगे आऊँ ॥
मैं हूँ जीव मतीका भोरा । कहैं जानूँ चौका के व्योरा ॥
समरथ कहौ मैं आनूँ सोही । चौका जुगति बताओ मोही ॥
करहु गुरु चौका विस्तारी । जीवहि यमसों लेहु उबारी ॥