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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीरसाहबका उत्तर

विवेकसागर

( ८९ )

गुरु धर्मदासजीके ऐसे विनय पूर्वक जिज्ञासाको सुनकर
सद्गुरु कबीर साहब कहने लगे कि,

सद्गुरुकबीर वचन

सुनो धर्मदास यह भेद बूझे बनिआवई ॥
सद्गुरु कहै समतूल थितै जब पावई ॥

टीका—हे धर्मदास ! यह मन स्थिर करनेकी युक्ति जो तुमने
पूछी सो बूझनेसेही बन आती है, किन्तु मनुष्यको इसकी
समझ कब पड़ती है जब कि, एक तो सद्गुरुभी पूर्णरीतिसे स्पष्ट
समझाने वाला हो और दूसरे शिष्य अधिकारी हो । समझनेकी
योग्यता के साथ २ गुरु में सच्ची श्रद्धा रखनेवाला हो । ऐसे
गुरु शिष्य जब एकत्र होवें तब शिष्यको थिरता मिलती है और
मन भी शान्त होता है ।

यहां तो दोनों सत्य कबीर जैसे गुरु और धर्मदासजी जैसे
शिष्य हैं इस कारणसे सद्गुरुने सैनसे यह दिखाया कि यहाँ
पर सब सामग्री यथास्थितिइकट्ठी हैं । इसी कारणसे सद्गुरुने
विशेषकर न कहकर मनविरोधका मार्ग ( राजयोग ) कहना
आरम्भ किया ।

मन राजा अति दारुण तेहि दोय अंगना ॥

एक कहेउ प्रवृति अतिहिं तेहि रंगना ॥

टीका—सद्गुरु कबीर साहब कहते हैं हे धर्मदास ! यह मन इस
शरीररूपी नगरका राजा है राजा भी ऐसा वैसा नहीं बहुत
दारुण अर्थात् भीषम अर्थात् भयंकर है । तहां श्री अनाथदास-
जीकृत प्रबोधचन्द्रोदय नाटकमें मनकी उत्पत्ती इस प्रकार
लिखी हैं ।