कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका वचन टूटनेसे प्रतिमा अपूर्ण रहना
( १५४ )
लक्ष्मणबोध
तब राजा कहे सुन गोरख आयी । ऐसा तुम करिहो तैसा पायी ॥
नहि माना गोरख द्वार उघारा । तब सतगुरु एक कला परचारा ॥
भागा गोरख दूर ते भाई । सतगुरु शरण सो बैठा जाई ॥
जगन्नाथ कहे सुनु गोरख आई । योगी हमरो दरश न पाई ॥
यहि औगुन गोरख से भयऊ । ताते योगी दरश न पयऊ ॥
जगन्नाथ राजा सो कहेऊ । अवधिपूर नहीं सो भयऊ ॥
ताते हाथ ठूंट रहि जायी । दिन सोलह बीते नहि पायी ॥
देह सम्पूर्ण होन न पायी । झगरू पण्डहि को समझायी ॥
झगरू पण्डा शिष्य भयो आयी । केतिक दिन ऐसे बिति जायी ॥
तब जगन्नाथ सो भेंट करायी । जगन्नाथ कह सुनो जी आयी ॥
तुम्हरी हमरी भली बनि आयी । तब हम तेहि कहा समुझायी ॥
कहैं कवीर सुनो त्रिभुवन राई । सिंचल द्वीप हम देखन जाई ॥
साखी-सिंचल द्विप हम जावहीं, जगन्नाथ चित लाउ ।
समुन्दरका भय मेटिके, अटल राज कराउ ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्भावे जगन्नाथ-
स्थापनवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः
इति ग्रन्थ लक्ष्मणबोध
संक्षेप सार
मोर
ग्रन्थपर साधारण वृद्धि
यद्यपि इस ग्रन्थमें लक्ष्मणजीको भी बोध करनेकी प्रसंगसे थोड़ी चर्चा आगयी है किन्तु प्रधानतः इस ग्रन्थमें वर्णन जगन्नाथजी की स्थापनाका है । इस जगन्नाथकी स्थापनाके विषयमें भी अनेक ग्रन्थोंमें बहुत मत भेद हैं इस कारण और-और ग्रन्थोंका भी इस विषयमें वर्णन थोडासा लिख देता हूँ ।
बोधसागर
( १५५ )
जब श्रीकृष्णजीका स्वधाम गमन हुआ तब बौद्धावतार हुआ। और जब जगन्नाथजीका अवतार हुआ उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था। उस राजा इन्द्रदमनको कृष्णजीने स्वप्न दिखलाया कि तू मेरा मन्दिर उठा। जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर तैयार होगया तब समुद्र आया और मन्दिरको ढहाकर लेगया और भूमि बराबर कर गया। इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया फिर उसकी वही दशा हुई। फिर बनवाया फिर वही दशा होगयी। इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको तैयार होने नहीं दिया तब राजाने दुःखी होकर उस इमारत का बनवाना ही छोड़ दिया इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया जैसा कि निरंजनगोष्ठि आदि ग्रन्थोंमें लिखा है कि, निरंजनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा तब समुद्र मेरे मंदिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटा देवें और मेरे मंदिरको स्थापित करा देवें तब आप वचनबद्ध हुए थे कि, मैं तुम्हारा मंदिर स्थापित करा दूँगा और समुद्रको हटा दूँगा। उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आन उतरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले, कि हे राजा! तुम जगन्नाथके मंदिरको बनाओ तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज समुद्र मंदिरको बनाने नहीं देता मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाता हूँ तब वह आकर ढहा जाता है मैं क्या कहूँ ? कबीर साहबने कहा कि राजा ! मैं इसी प्रयोजनसे आया हूँ अब प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वारा बनवाओ
( १५६ )
लक्ष्मणबोध
मैं समुद्रको हटा दूँगा अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा. तब राजाने पुनः मंदिरको बनवाना आरम्भ किया और मंदिर बनने लगा, कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर उसपर समुद्रकी ओर मुँह करके बैठ गये। उधर ठाकुरका मंदिर बनकर तैयार होनेके समीप आगया और समुद्र ने देखा कि अब तो ठाकुरका मंदिर बन गया तब बडे वेगसे दौड़ा और लहरें आकाशको उठीं। जब लहरें मारता कबीरके चौराके समीप पहुँचा तब सामने कबीर साहबको बैठे देखा देखते ही समुद्र ठहर गया और आगेको चरण बढ़ा नहीं सका और ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दण्डवत प्रणाम करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मैं तो जगन्नाथके धोखेसे आया और मंदिर ढहाना चाहा अब तो सामने आप बैठे हैं अब मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि आगेको चरण बढ़ा सकूँ, आप न्यायकर्ता हैं मेरा बदला दिलाओ। तब कबीर साहबने कहा कि हे समुद्र ! मैं तुम्हारा बदला जानता हूँ पर अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो, मैं तुमको इस ॥ मंदिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ तुम जाकर उसको डुबा लो। तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया और उधर जगन्नाथजीका मंदिर बनकर पूरा होजुका. समुद्रके हरिमंदिर तोड़नेका कारण यह था कि जब रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर बलात्कार किया था और सेतुबन्धपुल बांधकर पार उतरे थे किन्तु समुद्र
बोधसागर
( १५७ )
राम अवतारमें और कृष्णावतारमें भी बदला ले नहीं सका पर जगन्नाथके औतारमें अपना बदला लेने के निमित्त ऊद्यत हुआ और उसके बदले द्वारकापुरीको जुबा दिया । इससे यह सिद्ध होता है कि कियेका बदला अवश्य भोगना पड़ता है । इस प्रकार जब ठाकुरका मन्दिर बनकर भली भाँति प्रस्तुत होगया तब कृष्णजीने अपने पण्डाको स्वप्न दिखलाया कि हे पण्डे ! कबीर साहिबने मेरा मन्दिर स्थापित कर दिया अब तुम लोग आकर मेरी पूजा करो । जब जगन्नाथजीने ऐसा स्वप्न दिखलाया तब पण्डा घरसे चलकर पहले समुद्र तटपर आया और कबीर चौरे पर गया वहाँ कबीर साहबको बैठे देखा । उस समय सत्य गुरुका वेष जिन्दा साधुका था और वैष्णववेष नहीं था । इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें अनुमान किया कि प्रथम मैंने अशुभ दर्शन किया ठाकुरका दर्शन नहीं किया, ऐसा अनुमान करके वह पण्डा ठाकुरके मन्दिरमें पहुँचा, तब कबीर साहिबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं और ऐसा कौतुक दिखलाया की जब वह पण्डा ठाकुरके मंडपमें आया तब उसको विचित्र कौतुक दिखलाई दिया कि ठाकुरका समस्त मन्दिर कबीर साहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओरको वह ब्राह्मण देखता है उधर वह कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है और ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखाई नहीं देती, तब वह ब्राह्मण अक्षत और पुष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि मैं किसकी पूजा करूँ । ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते । समस्त मन्दिर कबीरसाहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । तब वह अपने मनमें सोचने लगा
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लक्ष्मण बोध
कि इसका क्या कारण है और फिरसे भोजनके समयमें भी कबीर साहबने सर्वत्र दर्शन दिया जैसा इस ग्रन्थ लक्ष्मणबोधमें वर्णन है। अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था इस कारण ही मुझको यह दंड मिला है, और मुझको यह कौतुक दिखलाया। यह शोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति और दोषके निमित्त क्षमा प्रार्थना करने लगा। जब इस पण्डाने सत्यगुरुकी बहुत प्रार्थना और स्तुति की और अत्यन्त नम्रतापूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना की तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया केवल एक मूर्ति रह गई और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी। तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा की हे पण्डा! अब तुम ठाकुरको पूजो पर इस बातका ध्यान रखना कि आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरीमें छूत न रहेगी और जाति पाँतिका ध्यान तनिक भी न रहेगा। प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधडक भोजन करेगी। अबल्लों पुरुषोत्तमपुरीमें वही नियम प्रचलित है। सब जातिके लोग एकही स्थानपर भोजन करते हैं कोई किसीके जूठेका कुछ भी ध्यान नहीं करता।
इस ग्रन्थकी भी कई प्रतियां मेरे पास उपस्थित हैं, कोई प्रति भी किसीके साथ मिलती नहीं है। सब प्रतियोंमें प्रसंगका तो ऐसा उलट पुलट है कि, कहीं किसीका पता नहीं मिलता और कविताकी तो यह दशा है कि चौपाईके किसी चरण में २२ मात्रा हैं और किसीमें १४। और लिखायी की जो बात है उसको कहनेकी आवश्यकता ही नहीं है, इस कारणसे यह
बाघसागर
( १५९ )
पुस्तक सबसे पुरानी प्रति जो १८६० संवत् की लिखी हुई है उसके अनुसार रखा है। हाँ, नवीन प्रतियोंमें से भी प्रसंगानुसार जो उपयुक्त जान पडा है वह भी इसमें रक्खा है किन्तु सो बहुत कम।
इतिलक्षमणबोधः सम्पूर्णः
इति
श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थ लक्ष्मणबोध
समाप्त