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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1023

बोधसागर

( १६६ )

पीढी ४०

चालिस वंश छ्यासी हजार । नवसै बहत्तर तिनके कडिहार॥
४६९७२ ॥ नव शंख नीले हैं । बाबन । पचहत्तरि खरब ॥
अर्ब दोय भावन ॥ सात करोड़ और बत्तिस लाख ॥
त्रेसठ हजार पांचसै तेरा साथ । इतने हंस लोक लै राखा ॥
९००५२७५०२०७३२६३५१३ ॥

पीढी ४१

व्यालीसवै वंश विस्तारा । लाख एक चौसठ हजार
कडिहारा ॥ गणित हंस लहै को पारा । १६४००० ॥
तीस अंश शंख परदा सोई । आठ नील नौ खर्ब तहां होई॥
अर्ब बयालिस तेरा करोड़ी । ग्यारा लाख सहस्र दश जोरी॥
इतनो वंश अंश हंसको लेखा । जो पहुँचे सो करै विवेका ॥
३०१५०००८०९४२१३१११००० ॥

एते बचन वंश परमाना । सो पावै निज वंशको पाना ॥
चारि गुरुके बाहर राखो । उन्हके प्रमान उन्हीसो भाखो॥

साखी-कहै कबीर

वंश अंश हंसकी निर्णय, और कडिहारी लेख ।
कहैं कबीर धर्मदास सों तुम हिरदै करो विवेक ॥
लिखेत कबीर बाकीके कलसा । धर्मदास पूछेव ।

चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसारी । धनि सतगुरु तुम्हरी बलिहारी॥
संशय एक मोरे दिल आई । सो समर्थ मोहे कहा समुझाई ॥
इतना आगम ठानी तुम राखा । सो समर्थ तुम आगम भाखा ॥
वंश संग चलै कडिहारा । सो तुम खोलि कहो विस्तारा॥
कडिहार संग जो हंस पियाना । ताका तोतुल्लकीन्हा बन्धाना॥