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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

हनुमानका रामचन्द्रजीको सबके ऊपर मानना (रामनामकी बड़ाई)

( ११६ )

हनुमानबोध

तुम हनुमंत सांच हो बीरा । तुमरे इष्ट अहै रघुवीरा ॥
ताको तुम जो करो बड़ाई । तुम समरथ को गम्य नहिं पाईं ॥
राम काज तुम भले सुधारा । ताके हुकुम लंका तुम जारा ॥
वह जग में कहिये अवतारा । अगम भेद तुम नाहिं विचारा ॥
उनकी लागि रहै सब कोई । जो जस सुमिरें पावे तस सोई ॥
तुम भूले प्रभुता की माहीं । प्रभुता जग में अस्थिर नाहीं ॥
स्थिर घर कोई नहिं जाने । प्रभुता बड़ाई सब मन जाने ॥
जो तुम मानों कहा हमारा । तो तुम पाओ समरथ दर्बारा ॥
सारखी-समरथ गति अति निर्मल, प्रभुता अहै मलीन ।
जिनकी तुम सेवा करो, सोउ न पावैं चीन ॥

हनुमान बचन चौपाई

सुनो सुनीन्द्र बचन हमारा । रघुपति हैं सबके सरदारा ॥
इनही समान कोउ दूसर नाहीं । तीन लोक के साहिब आहीं ॥
उन प्रताप हम जग सत जाना । हमसों कहा कथौ तुम ज्ञाना ॥
रघुपति को हम जानै परचा । हमसों कहा कथौ तुम चरचा ॥
सागर ऊपर पथर तिराया । ऐसा नाम अहै रघुराया ॥
मैं पौरुष बल आपन जातूँ । कहा कोई का नाहीं मानूँ ॥
यती नाम जानै जग मोहीं । सो मैं भाव सुनाऊँ तोहीं ॥
तुम जो पूछी पिता की बात । पिता कहत हूँ औ फिर माता ॥
महादेव देवन सरदारा । जिनको पूजे सकल संसारा ॥
नाहिं बीज की काया मोरी । बजर अंग पायो सब जोरी ॥
गौतम ऋषि की पत्नी नारी । नाम अहिल्या राम उबारी ॥
नाम अंजनी पुत्री ताकी । जनम लियो कूरव में जाकी ॥
साधु रूप धरि शिव बन आये । जहाँ अंजनी को मंडप छाये ॥
प्यास प्यास कहि बोले बानी । शिवकी गति माता नहिं जानी ॥