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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

ज्ञानसागर

( ६१ )

चोपाई

तब हम गये आप सुख सागर । अभय पक्ष जहाँ नाम उजागर ॥
विन्ती दंडवत कीन्ह अनेका । पुहुप द्वीप द्वीपन को थेगा ॥
कीडा विनोद होत बहु भावा । द्वापर युग धर्म न नियराया ॥

द्वापरमें कबीर साहिबका प्राकट्य

आज्ञा पुरुष दीन्ह मोहिं सारा । ताते बहुरि नाम उर धारा ॥
करूणा मय मम नाम प्रकासा । बहु जीवन कहैं छुड़ायो फांसा ॥
आयो जहाँ चन्दबिज बड़राऊ । गढ़ गिरनार नगर तेहि ठाऊ ॥
ताकी नारि रहे ब्रतधारी । पूजै साधु कुल लाज विसारी ॥
तिन पुनि सुधि सो हमारी पाई । लैगयी बहु विधि तुरत लिवाई ॥
आई चेरि विन्ती कीन्हा । तुव दर्शन रानी चित दीन्हा ॥
मैं नहिं राजा रावकर जाऊं । उठ रानी आपहि चलि आऊ ॥
नमस्कार कै कहि अस बानी । मोरे गृह पगु धारौं ज्ञानी ॥
ताकी प्रीति नीक मैं जाना । राजा गृह तब कीन्ह पयाना ॥
रानी कह उपदेश जो दीन्हा । राजा कर कछु शंक न कीन्हा ॥

साखी-एक दिवस जो रानी, बूझा मता अपार ॥
कहा मता तुम ज्ञानी, सो कछु कहो विचार ॥

रानी इन्दुमतीका कबीर साहबसे ज्ञान चर्चा करना-चोपाई

तासो कह्यो सुनौं हो रानी । अथरहिं रहौं नाम मम ज्ञानी ॥
जो कोइ माने कहा हमारा । ताको पठऊं जम सों न्यारा ॥
कहे रानी मोहि कीजे दाय। जातैं नहिं हते यमराया ॥
बहुत भांति तत्त्व जो चीन्हा । बहु विधि विन्ती मुक्ति अधीना ॥

कृष्ण-विष्णु-म्यवहार

सोवत कृष्ण स्वप्न इक देखा । बहु वैकुंठ सेत जनु रेखा ॥
उग्यो बादल सेतहिं फूला । सपना देख कृष्ण मन भूला ॥

( ६२ )

ज्ञानसागर

अहो ब्रह्मा मैं सपना देखा । बादल उमंग पड्डप की रेखा ॥
सोवत देखा पुरमें अपना । ब्रह्मा वेद देख कहु सपना ॥
रास वर्ग गनि मोहि बताओ । जेहि ते जीवका भर्म मिटाओ ॥
तब पुनि ब्रह्मा वेद विचारा । पुनि भाष्यो ताकर उपचारा ॥
सुनो विष्णु समझाऊं तोही । यही आज्ञा भयीं सो मोही ॥

साखी—है कोई ज्ञानी जीव बड़ा, तेहि कारण प्रभु आव ॥
दूत ताहि नहि पावई, सत्त पुरुष सुन नाव ॥

चोपाई

सुनिके विष्णु अचरज मन कीन्हा । ब्रह्मा सों तब बोले लीन्हा ॥
सोइ करौ जो जीव न जाई । राखौ ताहि महि भरमाई ॥
सुनिके ब्रह्मा मतौ विचारा । तक्षक रूप दूत पगु धारा ॥
यह सब भेद जबै हम जानी । इन्दुमती सो आज्ञा ठानी ॥
काल रूप तक्षक को आही । डस है तोहि जो कष्ट जनाई ॥
विरहुलि शब्द गहो मन लाई । यमको दूत जीत नहि जाई ॥
रानी शब्द विरहुली पाई । ता कहैं तब प्रतीति मन लाई ॥
बहुविधि सुमरै शब्द अघाई । काल घरी निकटै है आई ॥
चारौ दूत पठाव यम राऊ । गढ़ गिरनार बेग चल आऊ ॥

साखी—रानी भक्ती लीन्ह मन, काल न पावै दाव ॥
साध चले घर आपने, रानी मस्तक नाव ॥

चोपाई

राजा रानी दोई शिष्य मोरा । रानी लीन्ह राव मति भोरा ॥
तब यमदूत मता अस कीन्हा । चित्रसारमें पहुँचे लीन्हा ॥
रानी चली सिज्या पर जबहीं । तक्षक ग्रास भर्म भयो तबहीं ॥
रानी कहे डस्यो मोहि सांपा । राजा कियो कठिन संतापा ॥
मंत्री गुणी सब तुरत बुलाये । राजा आज्ञा सों सब आये ॥

ज्ञानसागर

( ६३ )

रानी शब्द विरहुली भाखा । दूर दूर सबदिन को राखा ॥
रानी क्रोध बहुत तब कीन्हा । बहुत होय नृप अति आधीना ॥
अरे भाई मम प्राण प्यारी । यही बार तुम लेव सम्हारी ॥
सृष्टित रानी सब चलि आये । जाग्रत जान के सबै सिधाये ॥
तक्षक विष नहि लाग्यो नारी । अंतक दूत रहे सब हारी ॥

साखी-रानी उठि ठाढ़ी भई, राजहि हरष अपार ॥
सुमिरन हम को कियो, धन्य है गुरु हमार ॥

चोपाई

तक्षक राव तब आये जहवां । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर तहवां ॥
विष को तेज शब्द सों जांता । सुनिके विष्णुहिं भयी तब चिंता ॥
धर्मराय का तुरत हंकारा । यम दूतन को जो सिरदारा ॥
ताका हरि अस मता सुनावा । करियो सबै तुम सेतहि भावा ॥
आने छलिकैं जो नृप नारी । निश्चय आज्ञा आहि हमारी ॥
सुनिके दूत भेष कियो रंगा । अपन कीन्ह सब सेतहि अङ्गा ॥
आये दूत नगर नियरावा । रानी ऐसा सपना पावा ॥
आये गुरु ज्ञानी जो हमारे । बोलत अमृत वचन सुधारे ॥

ज्ञानी वचन

सुन रानी तोहि भेद बताऊं । काल चरित्र सब तोहि सुनाऊं ॥
छलबे अइहैं ताहि सम्हारो । सेत रूप जिन भाव विचारो ॥
साखी-मस्तक ऊंचा कालका, चित्तमें गुणका रंग ॥
यही चिह्न तुम चीन्हियो, और सेत सब अंग ॥

चोपाई

भये प्रभात काल तब आवा । सेत रूप सब अंग बनावा ॥
आये जहां तहां नृप नारी । तिनसौं ऐसो बचन उचारी ॥
चीन्हत है कै नाही रानी । मरदन काल आइस मैं ज्ञानी ॥

( ६४ )

ज्ञानसागर

मैं तो तोकहँ दीक्षा दीन्हा । तक्षक डसै तोहि कहँ लीन्हा ॥
तब तोहि मंत्र दियो मैं सोई । कालको अजय जाहिते होई ॥
तँ पुनि तैसो तत्त्व विचारा । हर्षत भये तब धनी तुम्हारा ॥
बेगी चलो गहर जिन लाओ । प्रभु को दरस तुरत तुम पाओ ॥
इंडु मती सपना जो देखा । बैसो देखो ताकर रेखा ॥
तीनों गुण चक्षु मैं राता । और पुन देखो ऊंचा माथा ॥
और स्वेत सब देख्यो अंगा । पाइ प्रतीत स्वप्न परसंगा ॥
अरे काल तँ क्या ठग मोही । हंस रूप नहि छाजै तोही ॥
यह छल मता न लागु तुम्हारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥

साखी- मम गुरुकी परतीत यह, धरनी धरै न पांव ॥
काग न होय मराल सम, यह छति तोहि न भाव ॥

चोपाई

सुनिके दूत कीन्ह तब रोषा । इन्दुमती को दीन्ह सो दोषा ॥
तिन पुनि सुमरे अपने स्वामी । भक्त हेतु चले अन्तर्यामी ॥
ज्ञानी आवत काल पराना । ता कहँ लै पुनि लोक सिधाना ॥
धन्य भाग तिन रानी केरा । ज्ञानी आय काल सों फेरा ॥
रानी मानसरोवर आई । अमी सरोवर ताहि दिखाई ॥
कबीरके सागर पांव परो जबही । सुरति सागरे पहुँची तबही ॥
पहुँचत तासु हंस हरषाने । सबमिलिकीन्हतासु सन्माने ॥
सतगुरु दायी कीन्ही जबही । पोडशा भानु रूप भयो तबही ॥
भयो हर्ष रानी अति शोभा । राजा लग्यो करन अति क्षोभा ॥
हे सतगुरु मे तुम बलिहारी । राजहि आनो पतहि हमारी ॥
सतगुरु कहैं सुन संत सुजाना । राजा भाव भक्ति नहि जाना ॥
आ तोहि भयो हंसको रूपा । कारण कवन चहै तू भूपा ॥

ज्ञानसागर

( ६५ )

साखी-राजा भक्ति न जानही, तातें हंस न आव ॥
विना तत्त्व नहिं हिरम्बर, हंस न होय भुक्ताव ॥

चौपाई

हे स्वामी मैं भव जब रहिया । राजा भक्ति न वरजै कहिया ॥
है संसार का ऐसा भाऊ । पुरुष पराय ध्यान नहिं आऊ ॥
जो कोइ राते त्रिया बिरानी । ताकी करै सवै मिलि हानी ॥
छोटे बड़े को यह व्यवहारा । धन्यनृपति जिन ज्ञान विचारा ॥
करों साथ सेवा मैं जबही । राजा मोहि न वरजै कबही ॥
जो राजा अटकावत मोहीं । कैसे भेटत तब मैं तोहीं ॥
धन्यनृपति जिन भक्ति हटावा । आनिय ताहि हंस पति रावा ॥
सुनि ज्ञानी ताही की वाता । चले तबहि तहँही बिहँसाता ॥
आये भवसागर जब ज्ञानी । यहाँ नृपति की अवध खुटानी ॥
आये लेन ताहि यमदूता । राजहि कष्ट जो देत बहुता ॥

साखी-हंस ताको नहिं पावे, घेर रहो जो राव ॥

राजा परो अगाध में, सतगुर को गुहराव ॥

चौपाई

राजा तत्त्व मता नहिं चीन्हा । ताते यम राजन दुख दीन्हा ॥
पावे यम नहिं छाड़े ताही । भक्ति योग जो ऐसो आही ॥
तब ज्ञानी आये तेहि ठाई । देखत जीव बहुत संकाई ॥
ज्ञानी लीन्ह जीव कर आगे । देखत दूत ताहि सब भागे ॥
दूत चहुँ दिशि देखत जावैं । मरकट दृष्टि पक्षि नहिं पावैं ॥
जस आकाश कहैं जाय पखेरू । मरकट दृष्टि आये सत हेरू ॥
ऐसे ताहि दूत गुहरावैं । नहिं जब देखैं तब पछतावैं ॥
जहाँ लगि गम तहैं लग हेरा । आगे देखा धुन्ध कुहेरा ॥
हंस गये जब लोक द्वारा । रूप अनूप देख उजियारा ॥
गये नृपति हंसन की पांती । ता मध्ये पुन जइस अजाती ॥

( ६६ )

ज्ञानसागर

साखी-रानी चीन्हौ नृपति को, आन धरे तब पांव ॥
नृप मन में बहु संकुंचै, लज्जा ताहि जनाव ॥

चौपाई

कह रानी सुन साधु भुवारा । चीन्ह नृपति मैं हौ तुम दारा ॥
इन्दुमती है मेरा नाऊँ । यहि कारण टेक्यो तुव पाऊँ ॥
राव कहे कि म करो प्रमाना । बर्ण तुम्हारो हंस समाना ॥
शोभा बहु देखौ तुम अंगा । कैसे तोहि कहौ अर्धगा ॥
हंस करुणामय वचन उचारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जिन भवसागर भक्ति विचारी ॥
नृप को भयो हंस का भावा । जिन पुनि ऐसी शोभा पावा ॥
भुई में रहै जो अंतक दूता । तिन पुनि विस्मय कीन्ह बहुता ॥
दूत चलि गये जहैं त्रिय राऊ । तिनसों जाय कहचो सत भाऊ ॥
स्वामी श्वेत वरण यक आवा । रानी नृप लेह लोक सिधावा ॥
कैसो लोक ब्रह्मा पर जरेऊ । जरत हुताशन जनु घृत परेऊ ॥
चलो हरी हर संग हमारे । जहँवा राजा रानी सिधारे ॥
चले वेग तब तीनों भाई । बाहन साज चले तिय राई ॥

साखी-सुम्मेरते ऊँचे गये, तब देखा अँधियार ॥
नव खंड महि तब छाँड़िके, आगे को पगधार ॥

चौपाई

पहुँचे विषम सरोवर जाई । बिजुली हुओ ह्यां अन्याई ॥
ब्रह्मा शिव बाहन थकि गयऊ । सतगुन तेज विष्णु का भयऊ ॥
अलख निरंजन भयो तिहिठाऊँ । औ देवी तें आशिष पाऊँ ॥
तेहि ते विष्णु गो अँमर जहँवा । कामिनि मान सरोवर तहँवा ॥
देखत रूप विष्णु मन भूला । श्वेत पुष्प पद्म जस फूला ॥
कामिनि मान सरोवर राजै । जुत्थ जुत्थ जोड़ भल साजै ॥