सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

प्रवृत्ति वंश वर्णन

(९०)

विवेकसागर

दोहा-निर्विकल्प व्यापक सकल, साखी सर्व असंग ॥
सर्वरूप सबते परे, सबविधि जान अभंग ॥
आदि पुरुष सर्वज्ञ अज, पूरण रूप अनन्त ॥
यही भांति हरि नित्त हैं, नेति वेद गावन्त ॥
त्रिगुण नियन्ता ईश जो, सत चित सदा निवृत्त ॥
ताकी इच्छा मात्रही, बल पायो प्राकृत ॥
प्रकृति पुरुष संयोगते, प्रगट भयो मन भूप ॥
संकल्प विकल्प दोष उठे तेमन शक्ति अत्रूप ॥
मन माया विस्मृति कियो, नाम विचित्रा तासु ॥
आच्छादन कर पुरुषको, विलसे देह विलासु ॥
मन माया बहु छल कियो, कीन्हो बहु विस्तार ॥
सुगति गयी निजरूपकी, प्रगटचो तन हंकार ॥

इस प्रकारसे इस मनकी उत्पत्ति हुई ।

सद्गुरु कहते हैं हे धर्मदास ! शरी को इस भयानक राजा मनकी दो स्त्रियाँ हैं तिनमेंसे एक प्रवृत्ति है । जिसमें यह मन बहुत ही राग को प्राप्त हुआ है, अर्थात् उसके साथ अत्यन्त स्नेह करता है ।

प्रवृत्तिवंशवर्णन

महामोह तेहि सम्भव सुत अति लायका ॥
गर्व अति बलवान विजय रण शायका ॥
महाकोध अनुजै तेहि निकट अघोरता ॥
लोभ संगेतहि ठाढ आशा अधिक कठोरता ॥
तृष्णा वीर महाबलि अखिल संचारई ॥
को बांचे मेरी घात सो ऐसो विचारई ॥

विवेकसागर

(११)

जडता ताहि सखी संग मनकहँ राचई ॥
अहनिशि करत कोलाहल उमैं ना छाजई ॥

टीका-मनकी प्रवृत्ति स्त्री है उसके पुत्रोंको बतलाते हैं, हे धर्मदास ! उस प्रवृत्तिको सबसे बड़ा और योग्यपुत्र मोह उत्पन्न हुआ है । और दूसरा उनका गर्व महाबलवान और प्रवृत्ति की रक्षा करनेमें महा योद्धा रणबांकुरा है । महामोहका तीसरा भाई अर्थात् प्रवृत्तिका तीसरा पुत्र काम है और चौथा क्रोध है । ये दोनों बहुत ही मलीनता से पूर्ण हैं । मोहका पांचवाँ भाई और प्रवृत्तिका पांचवाँ पुत्र लोभ है जिसके साथ आशा और कठोरता दो बहिन रहती हैं । और तृष्णा वीरा भी उनके साथ है, वह महाबलवान है सर्वमें उसका संचार है, वह अपने मनमें ऐसा गर्व रखती है कि मुझसे कोई भी बच नहीं सकता । और जडता भी उसी तृष्णा के साथ रहती है जो मनको अत्यन्त प्यारी है । मनकी अत्यन्त प्रीति के कारण वह जडता सदा कोलाहल करती रहती है अर्थात् सदा द्रन्द्व उठाया करती है ।

यद्यपि इस ग्रन्थ में प्रवृत्ति की संतानके वर्णन करनेमें बहुत कुछ भूल हुई है क्योंकि तृष्णा जो स्त्रीलिंग शब्द है उसको पुँछिंग करके लिखा है और हंसमुक्तावलीके प्रसिद्ध टीकाकार श्रीभजनदासजीकी टीकामें भी ऐसा भूल पायी जाती है, तथापि यदि यह मानलिया जावे कि यह भूल ग्रन्थकर्ता और टीकाकारकी है सो ठीक नहीं है, क्योंकि वर्तमान कबीरपंथ के साहित्य भंडार में बहुत परिश्रम करनेपर भी जब एक भी ग्रन्थ लेखक भट्टाचार्य्योंकी कृपासे शुद्ध नहीं मिलता है तब ग्रन्थकार अथवा टीकाकारके ऊपर दोष कदापि नहीं आ सकता । इस कारण मूल प्रबोधच-