कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कृष्णचरित्रवर्णन
( ४४ )
ज्ञानसागर
जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥
बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥
काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥
जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥
काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥
साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥
होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥
चोपाई
सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥
कृष्णचरित्र
राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥
करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥
एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥
प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥
देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥
नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥
करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥
गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥
नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥
नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥
उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥
सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥
कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥
ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥
चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥
जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥
ज्ञानसागर
( ४५ )
सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥
भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥
चौपाई
चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥
लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥
एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥
मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥
इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥
डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥
सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥
क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥
चौपाई
एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥
लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥
देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥
पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥
सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥
बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥
चौपाई
केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥
तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥
सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥
चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥
सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥
सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥
अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥
( ४६ )
ज्ञानसागर
चौपाई
मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥
रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥
चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥
मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥
मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥
रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥
चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥
पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥
साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥
हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥
चौपाई
मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥
मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥
उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥
पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥
जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥
तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥
नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥
साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥
जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥
चौपाई
कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥
सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥
दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥
ज्ञानसागर
( ४७ )
जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥
जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥
कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥
होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥
साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥
जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥
चौपाई
तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥
कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥
कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥
ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥
चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥
तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥
एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥
मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥
सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥
सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥
साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥
कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥
चौपाई
बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥
कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥
सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥
ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥
रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥
उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥
( ४८ )
ज्ञानसागर
साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥
दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥
चौपाई
दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥
बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥
युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥
छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥
दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥
कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥
मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥
नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥
चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥
साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥
जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥
चौपाई
आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥
मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥
मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥
बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥
बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥
दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥
दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥
दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥
दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥
दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥
ज्ञानसागर
( ४९ )
साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥
बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥
चोपाई
चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥
कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥
जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥
प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥
हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥
यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥
बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥
अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥
साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥
पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥
चोपाई
चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥
काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥
विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥
सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥
सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥
तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥
बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥
यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥
ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥
तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥
साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥
मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥
( ५० )
ज्ञानसागर
चौपाई
तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥
पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥
मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥
दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥
बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥
राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥
दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥
कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥
तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥
कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥
मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥
मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥
साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥
धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥
चौपाई
चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥
पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥
अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥
सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥
तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥
अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥
ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥
अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥
तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥
ज्ञानसागर
( ५१ )
साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल ।
गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल
कृष्ण वचन-चोपार्द
कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥
निरंजन वचन
तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥
पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥
उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥
क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥
जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥
छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥
तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥
कृष्ण वचन
साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥
सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥
निरंजन वचन-चोपार्द
कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥
पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥
यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥
कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥
तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥
या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥
बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥
ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥
सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥