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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सद्गुरुका पाटनसे चलनेका विचार प्रगट करना और वहाँके हंसोंकी विनती

( ४८ )

जगजीवनबोध

करक संक्रान्ति चन्द्रकी भाई । जल तत्त्व ते चन्द्र कहाई ॥
जब चन्दा घर चन्दा सोई । रोग व्याधि शोक ना होई ॥
चन्द्र पेलिके सूर समावे । पास छः में लोकहिं जावे ॥
अब पाँच तत्त्वका कई बखाना । जानेगा कोइ हंस सुजाना ॥
परबत पंच काया के बारै । गुरु गम हंसा करै विचारै ॥
पीत वरन है मन्दिर वारा । तामें पुरुष दरश गुरु सारा ॥
स्वेत वरन है पुरुष परमाना । ताका दरश करै कोइ स्याना ॥
तीजे लालवरन पुरुष परमाना । देखत हैं सो हंस सुजाना ॥
चौथा हरा रंग है सूरत । ताको ध्यान धरि देखिये सूरत ॥
पाँचवें स्याम वरन अधिकारा । सो देखै कोइ हंसा प्यारा ॥
जो कोइ इनसै सुरति लगावै । स्वास स्वासकी खबर बतावै ॥
रवि मंगल शनिश्चर वारा । तापर सूर होय असवारा ॥

कालज्ञान

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो रे भाई । अगम के भेद कई समझाई ॥
भिन्न भिन्न करके भेद बताऊँ । आगम कहिये दृष्टि दिखाऊँ ॥
वर्ष छः मास मासका भाऊँ । पाख आठदिन बरनि सुनाऊँ ॥
इंगला पिंगला सुषुमनि नारी । चले लगन सो लेहु विचारी ॥
पाँच तत्त्व हैं उनके पास । वह सब आगम कहैं तमासा ॥
स्याना हंस होय जो भाई । तिनको अगम देहुं बताई ॥
छः मासका भेद बताऊँ । अगम लहो सो कहि समझाऊँ ॥
दोग्य संक्रान्तिका भेद बतायी । एक मकर दूजा करक कहायी ॥
मकर संक्रान्ति सूरज सो देखा । तत्त्व पृथ्वी स्वर सूर विशेषा ॥
जो सूर घर सूरज आवे । छः मास काया सुख पावे ॥
सूरज पेलि चन्द्र जो आवे । छः मासमें जीव चलावे ॥