कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1024, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५६ )
कबीरबानी
तिनमें फेरफार कछु नाईं । सो समर्थ कहिं दिखलाई ॥
सबही हंसलोकको जाई । तो काहेको पुनि करै कमाई ॥
सब कडिहार जहँ एक ठिकाना । सब हंसनको एकै स्थाना ॥
सबही हंसा एक सरीखा । अबगुरुमहिमाकोकौनविशेषा ॥
एक भौम्य एक है स्थाना । सब कडिहार एक करि जाना ॥
वचन वंश थापै कडिहारके बोधे । योग युक्ति काहेको सोधे ॥
काहेको एहि तन मन वारे । काहेको धन जोवन गारे ॥
काहेको चरणाभूत लेही । सीथ लियेकी महिमा केही ॥
सबही हंस हैं एक समाना । काहेको चौका आरतिठाना ॥
साखी-धर्मदास
भलौ नांव बाही कैलको, जिव सब एक न समान ।
जैसी कमाई जीवकी, ताको देवै सोउ स्थान ॥
चौपाई सद्गुरु कबीर उवाच
सुनो धर्मदास यह भेद नियारा । तुमकोखोलिकहों सोनिस्तारा ॥
सब रजधानी पुरुषहि कीन्हा । कैलकसिखावनपुरुषहिदीन्हा ॥
ऐसी शंक जिन पूछो भाई । कच्चा जीव बिचलिके जाई ॥
समुझे हंस बहुत सुख पाई । सर्वज्ञान कालमूल बताई ॥
द्वादश पंथ भेद ना पावो । सातों सुरति पुरुष निर्मावो ॥
सर्व सरीखे नहिं होय कडिहारा । कैसे रहे एक दरबारा ॥
केतिक सातों सुरति घर जैहैं । उन्हके दीपमो वासा लैहैं ॥
सोलहै अंश समर्थ बड़ कीन्हा । उन्हको दीप बड़े बड़े दीन्हा ॥
कितने रहैं उन्हे दीप मँझारा । आपन बोध लिये कडिहारा ॥
अवरदीप पुरुषके रहई । उन्हीं दीपमें वासा लहई ॥