कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना
( ५४ )
अनुरागसागर
तजिकागचाल मराल पथगहि, नीरक्षीरनिवारिके ॥
ज्ञानदृष्टिसोअदृष्टि देखे, क्षरअक्षरसुविचारिके॥२९॥
सोरठा-निह अक्षर है सार, अक्षरतै लखि पावई ॥
धर्मनि करो विचार निह अक्षर निहतत्त्व है ॥४१॥
धर्मदासवचन
धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दरसन पायउँ तोरा ॥
मुहि किंकर पर दाया कीजै । दास जानि मोहि यह बरदीजै ॥
निशिदिन रहो चरण लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥
तुव पदपंकज रुचिर सुहावन । पद पराग बहुपतितन पावन ॥
कृपासिंधु करुणामय स्वामी । दया कीन्ह मोहि अंतरयामी ॥
हे साहिब मैं तव बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥
चारखानिरचि पुनिकसकीन्ह। सो सब मोहि बतावो चीन्ह। ॥
जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना । कबीरवचन
सुनु धर्मनि यह है यमबाजी । जेहि नहिं चीन्हे पंडितकाजी ॥
जा यम ताहि गोसइयां भाखे । तजे सुधा नर विषकहैं चाखे ॥
चारिहु मिलियह रचना कीन्ह। कच्छा रंग सु जीवहि दीन्ह। ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥
यहि विधि कीन्ही नरकीकाया । मरे खाय बहुरि उपजाया ॥
ओंकार है वेदको मूला । ओंकारमें सब जग भूला ॥
है ओंकार निरंजन जानों । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥
सहस्र अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तर कालकी छाया ॥
ब्रह्माते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥
स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ॥
जीवनको ब्रह्मा भटकावा । अडखनिरंजन ध्यान ददावा ॥
अनुरागसागर
( ६६ )
वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुषको मर्म न जाने॥
निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र ब्रह्मो धर्म दासा॥
छन्द
असुर हैं जीवन सतावे, देव ऋषि मुनि कारकं ॥
पुनि धरि औतार रक्षक, असुर करै संहारकं ॥
जीवको दिखलाय लीला, अपनी महिमा घनी ॥
यहिजानजीवनबांधिआशा, यही है रक्षक धनी४०
सो०-रक्षककला दिखाय, अन्तकाल भक्षण करे ॥
पीछे जिव पछताय, जबहि कालके मुख परे ॥४२॥
अडसठ तीरथ ब्रह्मा थापा । अकरम करम पुण्य औ पापा ॥
बारहराशि नखत सत्ताइस । सात वार पंद्रह तिथि लाइस ॥
चारों युग तब बांधे तानी । घड़ी दंड स्वासा अनुमानी ॥
कार्तिक माघ पुन्य कहिदीन्हा । यमबाजी कोइ बिरले चीन्हा ॥
तीरथ धामकी बांधि महातम । तजेन भरम न चीन्हे आतम ॥
पाप पुण्यमहैं सबै फँदावा । यहि विधिजीव सबै उरझावा ॥
सत्य शब्द विनु बांचे नाही । सारशब्द बिन यममुख जाही ॥
त्रास जानि जिव पुण्य कमावे । किंचित फल तेहि छुधान जावे ॥
जबलग पुरुष डोर नहिं गहई । तब लग योनिन फिर२लहई ॥
अमित कला जम जीव लगावे । पुरुष भेद जीव नहिं पावे ॥
लाम लोभ जिव लागे धायी । आशा बंध काल धर खायी ॥
यम बाजी कोइ चीन न पावे । आशा दे यम जीव नचावे ॥
प्रथमैं सतयुगको व्यवहारा । जीवहि यम लै करै अहारा ॥
लच्छ जीव यम नितप्रति खाई । महाअपरबल काल कसाई ॥
तसशिलानिशिदिन तहैं जरई । तापर लै जीवन कहैं धरई ॥