कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जगन्नाथकी स्थापना का वृत्तांत
( १०४ )
अनुरागसागर
कबीर वचन । छन्द
वचन एक मैं कहों तोसों, विप्र सुनु तू कान दे ॥
पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छोड दे ॥
भ्रम भोजन करे जो जिव, अंगहीन हो ताहिको॥
करे भोजन छूत राखे, सीस उठटे ताहिको ॥७०॥
सोरठा-चौराकरिव्यवहार, भ्रमाविमोचनज्ञानहृद ॥
तहाँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥७१॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहे सतगुरु पूरा । तुम प्रसाद भयो दुख दूरा ॥
जेहि विधि हरि कहँ थापउ जाई । सो साहिब सब मोहिँ सुनाई ॥
ता पीछे कहवों तुम गयऊ । कौन जीव कैसे सुकतयऊ ॥
कलयुगकेर कहो परभाऊ । और हंस परमोषेउ काऊ ॥
सो माहि वरणि कहो गुरुदेवा । कौन जीव कीन्ही तुम सेवा ॥
कबीर वचन
धर्मदास तुम बूझहु भेदा । सो सब हमसों कहो निषेदा ॥
चार गुरुकी स्थापनाका वृत्तांत
सुनहु सन्त यह ज्ञान अनुषा । गज थलदेस परमोध्यो भूषा ॥
रायबंकेजी
रायबंकेज नाम तेही आही । दीनेउ सार शब्द पुनि ताही ॥
कीन्ह्यो ताहि जीवन कडिहारा । सो जीवनका करै उबारा ॥
सहतेजी
शिलमिली दीप तहाँ चलि आये । सहतेजी एकसन्त चिताये ॥
ताहुको कडिहारी दीन्हा । जब उन मोकहँ निजकर चीन्हा ॥
१ किसी ग्रन्थमें यह चौपाई ऐसे लिखी है—
सुनो संत यह कथा अनुषा । गज अस्थल परमोध्यो भूषा ॥