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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1026

( १५८ )

कबीरबानी

सद्गुरु कबीर उवाच

सुनो धर्मदास मैं कहूँ समझुझाई । गुह्य भेद जिन बाहेर जाई ॥
द्वादश पंथ यह भेद न पावे । वेहे दोजकका पंथ चलावे ॥
बहुत होइहै अपनो कडिहारा । सो नहि जाने भेद हमारा ॥
पूर्ण दया सद्गुरुकी होई । वंश आपुमें लेहि समोई ॥
जिनकं देहि निर अक्षर पहिचानी । सो कडिहार लेअगमकीबानी ॥
सो निज पावे भेद टकसारा । सदा हुजूरी पलकनहि न्यारा ॥
देखा देखी करै कडिहारा । भेद न पूछे सूठ गँवारा ॥
देखा देखी बोध चलावै । फूलि फूलि साखी पढ़ गावै ॥
चौके बैठि ना करै निरुवारा । चौका जुगति ना जाने गँवारा ॥
पुरुष अंश पुरुष सम होई । अपने दीप ले जावे सोई ॥

विहंगमतिके हंसवर्णन

अब तुम सुनौ विहंगम बानी । विहंगमति हंस पहँचानी ॥
निरअक्षर निस्तत्त्व निवासा । निहंतत्त्व अगम्य है वासा ॥
चौका करै जानै वहिवारा । अंश बनीसै सबसो प्यारा ॥
सब अंशनको प्रमाण करिजानै । अपने अपने स्थान वे जानै ॥
सब अंशनकी लाग्य चुकावे । सुरति निरति सद्गुरुसों पावे ॥
नौतम सुरति संग सनेही । एको पलक दूर नहि होई ॥
ओ कहिये बोहोत कडिहारा । सदाहुजूरी पलक नहि न्यारा ॥
अस कडिहार ते साररसहोही । एक प्राण दोई है देही ॥

साखी-जैसी मति कडिहारकी, तैसी मति हंस होय ।

सदाहुजूरी पुरुषके, छिन छिन दर्शन जोय ॥

चौपाई-धर्मदास उवाच

सुने सद्गुरु कडिहार रहानी । सबहि स्थान परे मोहि जानी ॥
अब कहिये नूर हंसका भाऊ । सो समर्थ मोहि बानी सुनाऊ ॥