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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

साधन वर्णन

(६४)

ज्ञानप्रकाश

औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥
तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥
धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥
बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥

धर्मदास वचन

प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥
मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥
तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥
वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥
धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥
अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥
दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥

अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ
किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥

जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥
संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥
चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥
यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥
चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥
कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥
सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥
धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥
अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥