कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1016, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४८ )
कबीरबानी
साखी-वंशअंशकी-धर्मदास उवाच
साँचे सतगुरु हम भल पावा । जमको धोखा सबहि मिटावा॥
गुरुशिष्यको भेद हम पावा । वंश अंश ले सबै परखावा ॥
अब वंश अंशका कहो प्रमाना । केते वंश केते अंश ठिकाना ॥
वंश अंश केते कडिहारा । तेहिकी परिचै देहो विचारा ॥
केतिक वंश कडिहारा समुझाई । केतिक संग हंस ले जाई ॥
केतिक प्रमानवंश हंसचलिजाई । सो समर्थ मोहे देहो चिन्हाई ॥
साखी-वंश अंशके प्रमान कहो, लेखा देहो बताय ।
एती सन्धि मोसों कहौ, सब संशय मिटजाय ॥
साखी-सब वंश प्रमानकी-सदगुरु कबीर उवाच
धर्मदास तुम बड़े विवेकी । तुम्हरे घट बुद्धी बड़ि देखी ॥
वचन वंश ब्यालिस ठीका । तिन्हको सत्रथ दीनो टीका ॥
वंश अंश वचन एक सोई । दीर्घ वंश अंश लघु होई ॥
जेठी अंश वचन मोरो जागै । और वंश जगके पीछे लागै ॥
तिन्हकी छाप चले संसारा । और वंश जगके कडिहारा ॥
बीस दिन और वर्ण पचीसा । इतना कुलमें चले सँदीसा ॥
साठि वरण अंशा प्रमाना । चारवंश तेहि माँहि समाना ॥
नामवंशकी पारख देऊ । तिनसे ब्यालिस वंश कहिदेऊ ॥
तिनसे ब्यालिस वंश कडिहारा । वचन वंश ब्यालिस पसारा ॥
चाल चले और पन्थ हटावै । भुले जिवन घर घर समुझावै ॥
वंश छत्रपतिसिद्ध सुधारी । नाम अंश करे कडिहारी ॥
धर्मदास एक वंशकी हानी । पावै वचन वंश सो समानी ॥
हमरो वचन सुरामनि सारा । वंशअंश ब्यालिस है अधिकारा ॥
सोह वंश जे वचन विचारे । विना वचन नहिं वंश हमारे ॥