कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
हंस गुंजन जनसे बातचीत
बोधसागर
( ५३ )
चौपाई-सुजनजन वचन
हंस सुजन जन कहैं सुनायी । सबही हंसा सुनो चितलायी ॥
जैसी देह सवॉरी हंसा । तैसी लेहु हमारे पंसा ॥
हंस वचन
चरणाभृतहि तुर्त सो लीना । कैसी महिमा गुरु की कीना ॥
हंस सुजनजन वचन
कितने पान शिष होये पायी । कौन वस्तु तुम पान चढ़ायी ॥
जैसी वस्तु संसार चढ़ावै । वैसी देह इहाँ सो पावै ॥
इहाँ मोती वहाँ हीरा लैहो । तेहि सम रूप देह सो पैहो ॥
जैसी सवॉरे देह तुम दासा । वैसे लोक करो तुम वासा ॥
जिन वहि अवसर देह बनायी । मंजुल करी मैं बैठक पाई ॥
द्वादश सहस सुर हंसनको रूपा । बैठे हंस दीप सम भूपा ॥
गो चढ़ाय पान जिन लीन्हा । पुछुप दीप तिन हंसा चीन्हा ॥
आठ हजार सुरज परकासू । सब आनन्द होय सुख बासू ॥
वृषभ चढ़ाय पान जो पावे । मंजु लोकमहैं हंस सो जावे ॥
दश सहस सूर छवि छाजे । बैठे हंसा राज विराजे ॥
हीरा मोती लै पान जो पावे । उदय द्रौप मैं हंसा जावे ॥
तेहि हंस मैं सुरज की जोती । झलके रोम मैं जैसे मोती ॥
वस्तर देहकै देह बनावे । सो हंसा सुख सागर पावे ॥
वह तो ज्ञान द्रौप मैं जावैं । चार सुरज ज्योति तिन पावैं ॥
पैसा धातु बर्तन लायी । सुख सागरमें ध्यान लगायी ॥
पैहैं सो षोडश भानु सरूपा । बसे सो हंसा द्रौप समीपा ॥
तीन से बत्तिस जिन देहबनाये । आपन आपने द्रौप सिधाये ॥
पैसठ हंस पहुंचे निज ठाई । जिन तो इल्म फकीरी पाई ॥
कहै सुजन जन सुनो रे भाई । धनि धनि तुमरी अधिककमाई ॥
तुम्हरी सरवर कोउ न कीन्हा । तुम तो गुरुको वश करलीन्हा ॥