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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना

बोधसागर

(७३)

सतगुरु वचन

सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥
तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥
सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥
सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥
साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥
साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥

रानी वचन-चौपाई

रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥
केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥

राजा वचन

रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥
एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥
तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥
दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥
पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥
प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥
बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥
भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥
सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥
ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥
दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥

रानी वचन

राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥
अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥

(७४)

अमरसिंह बोध

राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥

राजा वचन

रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥
धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥
तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥
हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥
सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥
सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥
तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥
रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥
गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥
आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥
तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥
रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥
साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥
सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥

चौपाई

लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥
राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥
दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥
साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥
तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥
झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥
राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥
चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥
जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥
अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥
रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥
अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥
नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥
तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥
पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥
हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥
या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥
साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥
सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥
पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥
जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥
देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥
कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥
तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥
तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥
लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥
देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥
डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥
धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥
आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥
हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥
यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥
तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥
यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥
गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥
सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥
भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥
अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥
साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥
लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥
इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥
अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥
राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥
तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।