कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ (ज्ञान सागर)
कबीरसागर
(सम्पूर्ण ११ भाग)
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.
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कबीरसागर
( सम्पूर्ण ११ भाग )
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खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
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सत्य
कबीरसागर
ज्ञानसागर
(प्रथम खण्ड)
कबीरपंथी भारत पथिक स्वामी युगलानन्द
(विहारी) द्वारा परिष्कृत
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नं. १ कबीरसागर -
संस्करण : फरवरी २०२०, संवत् २०७६
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सत्यनाम
A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, likely a Sikh Guru, seated in a meditative posture on an ornate throne. He wears a tall, pointed turban and holds a mala. A large, ornate umbrella is positioned above him. A small pot is visible on the floor to the left.
श्री कबीर साहिब
महात्म्यम्
श्री श्री गणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Ganesha, holding a conch shell and a sword, surrounded by a decorative border.
श्री गणेशाय नमः
श्रीज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका
★
| विषय. | पृष्ठ |
|---|---|
| मुक्तिभेद, अमरलोक वर्णन | १ |
| सत्य पुरुष का वर्णन | ३ |
| सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ | ४ |
| द्वीप वर्णन | ५ |
| धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन | ६ |
| धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती | ७ |
| धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना | ८ |
| धर्मरायका कामिनीको निगल जाना | ” |
| पुरुषका निरञ्जनको शाप देना | ९ |
| पुरुषका योगसंतायनको जीवोंको कालके फन्दसे छुड़ानेकी आज्ञा देना और योग संतायन तथा कालका युद्ध | ” |
| कन्याका धर्मरायके पटसे निकलना और धर्मरायका उसे ठगना तथा दोनोंका मिल-कर सृष्टिकी रचना करनेका विचार करना और रचना | ११ |
| चौदह यमका नाम और कर्म | १२ |
| कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना | १३ |
| धर्मराय और ज्ञानीजीका वार्तालाप और कोल करार | ” |
| धर्मरायका ज्ञानीजीसे जगन्नाथ की स्थापनाका वचन लेना | ” |
| सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन | १६ |
| तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना | १७ |
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| ब्रह्माका समुद्र खुदवाना | १८ |
| श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका समुद्र मंथन करना और तीन कन्याका प्रकट होना | ” |
| श्वानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना | १९ |
| चार खानिकी उत्पत्ति | २० |
| ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना | २१ |
| मायाका मायत्रीको उत्पन्न करके ब्रह्माको बुलानेके लिये भजना और मायाका ब्रह्माको झूठ बोलनेके कारण शाप देकर निरंजन से आप शाप पाना | २२ |
| मायाका विष्णुको पिताके खोजके लिये भजना । विष्णुका शुक्लसे श्याम हो जाना । मायाके पास आकर विष्णुका सत्य बोलना और तीनों लोकका राज्य पाना | २३ |
| मायाका महादेवको वर देना | २४ |
| तीनों देवका मानुषी सृष्टिकी उत्पत्ति करना । मनुष्य की अधिकतासे पीड़ित होकर पृथ्वीका गौरूपधरके विष्णुके समीप जाना और विष्णुका अवतार लेनेका वचन देना | २५ |
| अवतारों की कथा | |
| बलिचरित्र (वामन अवतार) | २७ |
| सनक सनन्दन चरित्र | २९ |
( ६ )
ज्ञानसागरकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठ. | विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|---|---|
| नारदचरित्र | ३१ | कलियुग में कबीरसाहबका प्रगटघ | ६७ |
| श्वेषणचरित्र | ३२ | जगन्नाथके मन्दिरकी स्थापना | ६८ |
| सती दाहकी कथा | ३३ | चन्दवारमें कबीरसाहबका जाना | ७१ |
| शिवकी समाधि छुड़ानेके लिये कामदेवका प्रयत्न करना और नारदका कामवश होना तथा विष्णुको शाप देना | ३४ | नूरीको मिलनेकी कथा | ७२ |
| विष्णुका दशरथके घर अवतार लेना अर्थात् रामकथावर्णन | ३५ | नूरीके पूर्वजन्मकी कथा | " |
| कृष्णचरित्रवर्णन | ४४ | बाललीला और रामानन्दको गुह करनेका वर्णन | ७५ |
| पाण्डव यज्ञ तथा सुपच मुदशान कथा-वर्णन | ५२ | सिकन्दरसाहूकी वार्ता और रामानन्दजीका कत्ल होना | ७७ |
| कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना | ५४ | मगहर गमनकी कथा | " |
| निकलंक अवतारकी वार्ता | ५५ | रतनाकी कथा | ८० |
| उत्पति परलयका लेखा | ५६ | चौका आरतीकी विधि | ८३ |
| कबीर वचन | योग कर्मका वर्णन | ८५ | |
| कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना | ५७ | अष्ट कमल वर्णन | ८६ |
| त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना | ५८ | गैही रहनी | ९० |
| द्वापरमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना | ६१ | आरतीका योगरूपसे वर्णन | ९१ |
| नुमतीकी कथा | " | योगकी श्रेष्ठता | " |
| पुनोकी बड़ाई | ९२ | ||
| गुहवाके लक्षण | ९३ | ||
| गुरुलक्षण | ९६ | ||
| परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन | ९७ | ||
| भविष्यत् कथा । चक्रवर्षीका वर्णन | १०५ |
इति अनुक्रमणिका समाप्त