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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

काम और सुभतिका युद्ध

( १०६ )

विवेकसागर

देखकर सेनापतियोंमें से काम सेनापति हाथ जोड़कर कहने लगा ॥
कामसेन सेनापति तेहि शिर नायऊ ॥
हे स्वामी केहि कारण निजहिं सिधारहु ॥

टीका-सेनापति कामसेन शिर नवा करके मोह राजासे कहने लगा कि हे स्वामी ! आप स्वयम् युद्धके लिये क्यों जाते हैं ?

आज्ञा करौ विवेकहिं गहिलै आवऊँ ॥

भ्राता सब सेनापति तुरत बँधावऊँ ॥

टीका-हे राजन् ! यदि आप आज्ञा करो तो राजाको उसके सब भाइयों और सेनापतियों सहित बांधकर ले आऊँ । कामसेनकी युक्ति और उत्साहपूर्वक वचनको सुनकर मोहराजाने उसे युद्धमें जानेकी आज्ञा दी । तब-

आयसु मांगि चले तब रिणुदल आयऊ ॥

रदपट फरकत आतुल वचन सुनायऊ ॥

टीका-मोह राजासे आज्ञा मांगकर काम विवेक राजाके दलके सन्मुख आकर उपस्थित हुआ । उस समय कामके हाँठ क्रोधके मारे फरक रहे थे । क्रोधके आवेशमें आकर कामने विवेक-राजाकी ओर सम्बोधन करके बहुत आतुरतासे कहना आरम्भ किया । रद = दांतपट = परदा अर्थात् दांतोंका परदा हाँठ ॥

रे विवेक तोहि कच धरि तुरत संहारि हैं ॥

मोहि देखत कौन सो मूल उच्चारि हैं ॥

टीका-काम विवेकराजासे कहता है रे विवेक ! देख अभी तेरे बाल पकड़कर मैं तेरा नाश कर देता हूँ । देखे कौन मेरे सम्मुख शब्द भी बोल सकता है ? मैं तेरा मूल नाश करता हूँ ।

( अन्तःकरण जब शुद्ध हो जाता है तब उसी शुद्ध अन्तःकरण

विवेकसागर

(१०७)

में विवेक प्रगट होता । इस कारण विवेकका मूल शुद्ध अन्तःकरण है जिस समय मनुष्यको काम उत्पन्न होता है उस समय अन्तःकरण मलिन वासना और देहाभिमानसे पूर्ण हो जाता है तब शुद्धान्तःकरणका अभाव होकर मलिन अन्तःकरणका प्रादुर्भाव होता है ) ॥

मूल गही उधार डारूँ मोसन करत सरभरै ॥

विचार सुनि बोलत विवेकहि संपुट युगकरधरै ॥

टीका—काम कहता है रे विवेक तू क्या मेरी बराबरी करना चाहता है ? मैं तेरे मूलको ही उखाड़ कर फेंक दूँगा । कामके ऐसे अहंकार युत वचनको सुनकर विचारने राजा विवेकसे हाथ जोड़कर विनय किया कि—

सुनु सुमतिनायक परमलायक दास कौतुक देखिये ॥
काम क्रोध अभिमानिया नट चेटका सम लेखिये ॥

टीका—हे सुमतिके मालिक परम योग्य विवेकराजा ! इन काम क्रोध और अभिमानादिकोंको नाटकी चेटकियोंके समान जानिये । इनका बलही क्या ? सुझा दासके कौतुकको देखिये । इस प्रकार विनय करके और विवेककी आज्ञा लेकर विचार रणमें कामके सम्मुख उपस्थित हुआ ॥

एक दिशि गर्जत काम विचार तब उभय दिशा ॥
काम करत बल जब अंत तब तरजत रसा ॥

टीका—हे धर्मदास ! अब एक ओर तो महा दुर्धर्ष काम गरजने लगा और दूसरी ओर विचार अपना प्रकाश फैलाने लगा । अब दोनोंका युद्ध होना आरम्भ हुआ । कामने जब अपना पौरुष कहके सुनाया, तब विचारने उसको तुच्छ बताया विचारके मुखसे तिरस्कारके वचन सुनकर काम कहने लगा ॥

(१०८)

विवेकसागर

रे विचार मतिहीन सकल वशि मैं कियो ॥

ब्रह्मा विष्णु महेश सबहि ताजन दियो ॥

टीका-काम कहता है रे मतिहीन विचार ! तेरी क्या विसात है, मैंने सब चराचरको अपने वशमें कर लिया है । औरकी कौन कहै ब्रह्मा विष्णु शिव आदि सबको मैंने ताजन दिया है, (मारा है) । इतनेही नहीं मेरे बलका प्रताप तू और सुनले ।

सुरपति शसि द्वि राते गौतम त्रिय कही ॥

विवेक विचार जो थाके बासा मैं गही ॥

टीका-रे विचार ! सुन जिस समय मैंने इंद्र और चन्द्रमा को वशमें किया, तब उनकी बुद्धि नष्ट होगयी, विवेक विचार सब जाता रहा और मेरी आज्ञासेही परम पवित्र गौतम मुनिकी पतिव्रता स्त्रीको भ्रष्ट किया । उस समयभी मैंने तुम दोनों (विवेक और विचार) को पराजय किया था । इतनी ही नहीं और भी सुन ।

व्यास पिता मीन दुहिता रतिबर बस कियो ॥

सुमन शरासन बाण शिवहि बेध्यो हियो ॥

टीका-रे विचार व्यासके पिता परमज्ञान और विवेक विचार में प्रसिद्ध जो पराशर ऋषि थे उन्हींको जब मैंने अपना बाण मारा तब वहाँ भी तुम्हारा कोई बश नहीं चला, उन्हींने मछली के पेट से निकली मत्स्यगन्धा (मच्छोदरी) से नदी के बीचमें भोग किया । और जब मैंने अपने बाणका लक्ष्य शिवजी को बनाया तब उन्होंने कामातुर होकर मोहिनी को पकड़ने की इच्छा की ।

दोहा-कहि कहाय मनसिज हस्यो, बोल्यो वचन उदार ॥

मो सम्मुख जलपै कहा, मेरो बल अपार ॥

विवेकसागर

( १०९ )

मो रति अति दुस्तरण लखि, जीतैं मोहिं जग कोन ॥
ज्ञान विवेकै आहिदे, लखत मोहिं करि गौन ॥
पग नहिं टिकत सुधर्मको, नहिं धीरज ठहराय ॥
मेरी दृष्टि परतही, वैरागो नशि जाय ॥
मैं मन हरचो विरञ्चि को, निज पुत्री वश कीन ॥
शतंमख द्विजंजाया निरखी, भयो परम अर्धान ॥
है कोतो बल अंग तुव, अरे सुभट कहु मोहि ॥
मेटों मार विलम्ब नहिं, प्रलय करत हौं तोहि ॥
पछितान्यो कांप्यो हृदय, शोचत वस्तु विचार ॥
हौं निर्बल वैराग बिन, अहै सबल अतिमार ॥
वस्तु विचार फिरे तबै, महा समर भय मान ॥
तुरते राय विवेक पहैं, बन्धन कीन्है आन ॥
मन संकोचि दृग नीच करि, कहत वचन नृपपास ॥
मेरो बल पहुँचे नहीं, निष्फल भयी सब आस ॥
तब मन्त्री सत्संग कर, औ दूजी अभ्यास ॥
उत्तम मन्त्र विचार के, कहत नृपति के पास ॥
मकरध्वज भुज बल अमित, बाक वीर समरत्थ ॥
वस्तु विचार महाबली, करे ताहि निजहत्थ ॥
दीजै ताहि सहायको, भक्ति ज्ञान वैराग ॥
विजय करे रण सहजही, वस्तु विचार बडभाग ॥
सुनि विवेक मन सुख भयो, मान्यो मन्त्र हिय जु ॥
तीनों तुरत बुलाइके, ताके संग किय जु ॥
बल पायो फूलो हृदय, चले समर समुहाय ॥
मनसा भूमि सुहावनी, रचे युद्ध तहैं जाय ॥

१ इन्द्र । २ गौतमकी स्त्री । ३ कामदेव ।

( ११० )

विवेकसागर

ठाढो सहित सहाय तब, मदन वीर बलवान ॥
दृष्टि परचो वैराग जब, कछुक दृष्टि सकुचान ॥
वस्तु विचार बोल्यो तबै, महाबली रण गाज ॥
सो हैं करत विवेककी, कित जै हैं रिपु भाज ॥
महाकोप करि बोल्यो, तबहीं सबल अनंग ॥
मो सन्मुख एतो बकै. करौ क्षणकमें भंग ॥
कुसुम धनुष वर हाथले, करों बाण सन्धान ॥
सकल अंग पलमें हैं, मेरो बल अप्रमान ॥
छूटे शर जो समर के, भयो युद्ध भयभीत ॥
गावत युगल समाज तहैं, रणरसमत्त जु गीत ॥
तब विचार वैरागसो, बूझत मन्त्र विचार ॥
अहौ बन्धु कीजे कहा. बडो सकल यह मार ॥
तब वैराग विचार के, दीन्हो मतो अन्त ॥
अहो बन्धु शोचत कहा, शोधो शुद्ध स्वरूप ॥
जग मिथ्या रजु सर्पवत, सत्य ब्रह्म निरधार ॥
छुद्र निंद्य नहिं चित धरो, हरो अनंग विकार ॥
जब वैराग महा बली, दीन्हो मतो अभंग ॥
वस्तु विचार चल्यो तबै, धरि उर परम उमंग ॥
रे निलज्ज पापी कुटिल, दुर्बुद्धी धृक तोह ॥
कहा वस्तु विचार ने, दुष्ट पिसन जन मोह ॥
कहो मार अतिदर्प करि, मैं मन मोहो भूप ॥
शंकरको मन मोहेऊँ, धरचो मोहिनी रूप ॥
मैं पराशर दहन कियो, रावणको घर खोय ॥
श्रुद्धी ऋषि वनमें छल्यो, परे त्रिशो वश सोय ॥
जीत्यो एक कटाक्षमें विद्यामित्र सुधीर ॥

१ विश्वामित्रजी मैनकाको देखकर कामातुर हुए थे जिससे शकुंतला का जन्म हुआ ।

विवेकसागर

(१११)

देवंअंगना संग लै, छूटचो धीर शरीर ॥
वस्तु विचार बोल्यो तवै अब जान्यो तुव भेद ॥
कहा नारि जहैगर्व तोही, अस्थि मांस त्वच मेद ॥
यह मलकी पुतली प्रगट, नख शिख भरी विकार ॥
प्रगट निरंतर मल खवै, अष्ट याम नव द्वार ॥
तांसो संगति जो करै, अति मलीन सो जान ॥
शूकर विष्टा अशुभ योनि, कह तिनको परमान ॥
पुनि मनसिज बोले तवै, सुनहु वस्तु विचार ॥
कियो भोग नहि नारिको, वृथा जन्म संसार ॥
बडो पदार्थ नारि जग, विनु तिय धामन काम ॥
ताको धर्म कहु न सघे, जाके घर नहि बाम ॥
ताते त्रिय सो धन्य है, तिहि पुर देखु निहारि ॥
सावित्री आज विष्णु ले, उमा लिये त्रिपुरारि ॥
कहै विचार यद्यपि अहै, ब्रह्मादिक ढिग बाम ॥
मो सहाय तद्यपि सबै, सदा मुक्ति निःकाम ॥
सनकादिक मुनि जनकसे; नहिचितवत तुवरश्च ॥
वस्तुविचार स्वरूप लहि, नाशे जगत प्रपञ्च ॥
गयी खबर तेहि भूल वह, रे निलञ्ज मदमत्थ ॥
हनुमान यक क्षणकमों, शंकर लायो हृत्थ ॥
उठचो मदन तब कोपिकरि, गह्यो बेगिकर चाप ॥
इषुवर्षा लाग करन, वर्णत नारि प्रताप ॥
कञ्चन सो तन भूल मले, दृग कमलनके भाय ॥
ऊँचे उरज विराजहीं, को न देखि ललचाय ॥
चन्द्र वदन तन क्षीण करि, जंघ केदली समान ॥

१ मनका इन्द्रके स्वर्ग की अप्सरा है इस कारण इसको देवअंगना लिखा । २ ले = लक्ष्मी ।

( ११२ )

विवेकसागर

तापर चीर सुगन्ध बहु, भूषण भूपति जान ॥
विकट दृष्टि जबहीं करै, सुर नर सुनि वश होत ॥
कठिन कटाक्षै जब भिदौ, तब कहैं ज्ञान उदोत ॥
पुनि विचार बोल्ह्यो तबै, जहैं तिय तोहिगुमान ॥
नरक परै तेहि संगते, संगति नाशै ज्ञान ॥
सोरठा-नारी वरने रूप, दुष्ट चित्त विष सो भरी ॥
वरणें को कविअनूप, चन्द्र वदन कञ्चन तनय ॥
दोहा-अहै अस्थिको पींजरा, चाम लपेटे जाहि ॥
ऊपर चादर रंगि दर्ई, भीतर विष्टा आहि ॥
नंगी करि जो देखिये, यह तन सुन्दर रूप ॥
यामो कछु धोखो नहीं, प्रकट पिशाच स्वरूप ॥
पृथक् अंग जो देखिये, रुधिर अभूषण गन्ध ॥
तब मलीन चर कीच, सो भरी देखिये रन्ध ॥
विष सों ढिग गुण अग्नि सो चितवनि बाण समान ॥
हित सों ढिग मन मिलन सो, सुखचुरैल पकवान ॥
सो नर पावन है सदा, जो न करै तिय साथ ॥
धरे पखौवा मोरके, नन्दनन्द हू माथ ॥

प्रबोध चन्द्रोदय ।

बोले वस्तु विचार मृद नहीं बूझई ॥
अंध चक्षुविहीन निपट नहीं सूझई ॥
कौन पुरुषको नारीलिंग उभयो कहाँ ॥
आतम ब्रह्म स्वरूप सबनमें रमि रहा ॥
कित अनंग कित संग विवेक ते पाइये ॥
सच्चिदानंदसर्वव्यापक चित्तमें ध्याइये ॥

विवेकसागर

(११३)

भेद अभेद दोऊ सम ज्ञान विचारहू ॥
अंत अवस्था जानि सोई निरवारहू ॥

टीका—कामके डींग मारनेको सुनकर वस्तु विचारने कहा रे सूठ काम ! तू मूर्ख है तेरेको समझ नहीं पडता है; तू अन्या है तुझको कुछ सूझता नहीं है ।

एकही ब्रह्म आत्मस्वरूप होकर जब सबमें रम रहा है तब स्त्री और पुरुष यह दो लिंग कहाँ हैं । जब एकही सच्चिदानन्द सबमें व्यापक हो रहा है तब कहाँ काम है और कहाँ रति है । जिसने इस प्रकारसे निज स्वरूपको विवेककी सहायतासे जानकर भेदा-भेद को नाश कर दिया है उसके लिये तेरा अस्तित्वही नहीं तब तेरा वश क्या । स्वरूपज्ञान प्राप्त होतेही तेरी अंत अवस्था आजाती है फिर तेरा बल उसके ऊपर नहीं चलता । किस दृष्टि को धारण करनेसे तेरा बल नहीं चलता सो सुन ।
छन्द—निरवारि देखे छानि लेखे दुतिय नहिं कोई कहा ॥

नरवत इत उत करत जहँ तहँ ब्रह्म सब मो रमि रहा ॥

टीका—विवेकी पुरुष ब्रह्म विचारको प्राप्त करनेके लिये जब अन्वयव्यतिरेक करके स्वात्मज्ञानको जानता है और अपने प्राप्त ज्ञानकी परीक्षाके लिये सर्व शास्त्र और आचार्योंके मतको छानता है तब उसे विचार ज्ञान द्वारा स्वात्म-निश्चयात्मक प्राप्त होता है जिससे वह सर्व स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य सब ही एक ब्रह्मकी ही लीला देखता है । जिस प्रकार नटको जाननेवाला पुरुष उसके अनेक स्वार्गोंमें भी उसे नट ही जानता है, उसे उसके स्वार्गोंमें दूसरा भाव कदापि नहीं होता । उसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वको जाननेवाले पुरुषकी दृष्टिमें जब द्वितीया है ही नहीं तब तेरी स्थिति कहाँ है ।