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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सात सन्धि विषयक प्रश्न

( १३६ )

सर्वज्ञसागर

पांच अण्ड हम पहिले कीन्हा । तेहिमें सर्व तत्त्व गुण दीन्हा ॥
जो कछु इच्छा करौ दिलमाहीं । सो सब कछु पैहौ तहाँहीं ॥
शब्द प्रताप अर्चित जब लीन्हा । सकल सृष्टिसो उत्पन्न कीन्हा ॥

साखी-पुरुष अण्ड लैगये, देखा सकल पसार ॥
सद्गुरु रहे निहार तब, समरथ वचन अधार ॥

धर्मदासवचन-चौपाई

धर्मदास चरण गहे धाये । हे सतगुरु तुम अगम बताये ॥
पुरुष अर्चितके सृष्टि फरमायी । तात सन्धि कहैं राखे छिपाई ॥
कौन लोक कहैं लीन्हे वासा । सोई भेद गहौ परकासा ॥

सतगुरु वचन

जब अर्चितको सृष्टि फरमायी । तेहि पाछे यक सुरति उठायी ॥
सोरह असंख अंकुर पसारा । तेहि में पांच अण्ड विस्तारा ॥
मिहरसुरति अजर लोक बनायी । तेहि महाँसातौ सन्धि छिपायी ॥
सातौ सन्धि उहाँ लै राखा । समरथ भेद गोइ कछु भाखा ॥
सातौ सन्धि सो गुप्त छिपावा । ताकोअन्त काहु नहि पावा ॥
मिहर लोक सन्धिन कहैं दीन्हा । आपन वास निरन्तर लीन्हा ॥
निरंतर गुप्त ठिका निर्मायी । तामे सतगुरु रहे छिपायी ॥

साखी-गुप्त भेद किया इतनौ, काहु न पायो पार ॥
पुरुष अर्चितकी सृष्टिको, धर्मनि सुनो विचार ॥

चौपाई

पुरुष जब घटमें कीन्ह विचारा । प्रेम सुरति तबहीं उचारा ॥
प्रेम अनन्द उपज्यो रे भाई । तेहिते प्रेम सुरति उपजाई ॥
प्रेम सुरति भै रूप अपारा । प्रेमानन्द घट शब्द उचारा ॥
नेत्र हेर बुन्द सो ढारी । सोइ सुरति दिल माँहिनिहारी ॥

सर्वज्ञसागर

(१३७)

सुरति बुन्द तब तासों लीन्हा । सोई बुन्द अथर महँ दीन्हा ॥
ताहि बुन्दके अक्षर भयऊ । स्वर स्वासा हो बाहर गयऊ ॥
पुरुष अचिन्त आज्ञा सब दीन्हा । तेज अण्ड जो बैठक लीन्हा ॥
बारह पालंग अण्ड है सोई । तेहि में सृष्टि तुम्हारी होई ॥
अच्छर आनन्द ताहि समाया । तामें परकृति सुरति उपजाया ॥
प्रकृति तें चारि अंश निर्मायी । देखि अंश आनन्द समायी ॥
तेहि अनन्द सो निद्रा आयी । सत्तर निमिष जब गयो सिरायी ॥
चारों जने समाधि लगायी । ताको मरम कहौ समझायी ॥
तब सतगुरु एक अवगति कीन्हा । जल तत्त्व ते अण्ड तब दीन्हा ॥
जब अण्डा जलमें उतराना । तब अन्तर निद्रा विलगाना ॥
अक्षर मनमें कीन्ह विचारा । विकल भये तबहीं पगु धारा ॥
चले चले अण्डा लगि आवा । देखत अण्ड कोष उपजावा ॥
सोई कोष अण्डमें आवा । तेज शक्ति ताकर प्रभावा ॥
तेहि कारण मो फूटचो भाई । तेहिते निरंजन उपजाई ॥
कालरूप सो प्रकट प्रचण्डा । महा भयानक रूप अखण्डा ॥
अक्षर मनमें शंका आई । तब चारों सुतन कहँ लीन्ह बुलाई ॥
उनको बहुत भांति समुझाई । पृथ्वी बीज धरौ तुम जाई ॥
जग उत्पति तापै होय भाई । कूर्म शेष पृथ्वी थाह्यो जाई ॥
जाते पृथ्वी डगे नहिं भाई । साइ उपाय करौ तुम जाई ॥
धर्मराय तुम लेखा लेहू । सकल सृष्टि को लेखा देहू ॥
चारों अंश को सिखाप दीन्हा । आप वास मुक्ति दीपमें लीन्हा ॥

साखी—यह रचना अचिन्तक, अक्षर को विस्तार ॥

निरंजन बैठे शुभ शिखर, मान सरोवर द्वार ॥

चौपाई

पुरुष अचिन्त अस चित्त विचारा । सन्धि सुरति घट में उबारा ॥