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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका कबीर साहबका शिष्य होना

(११०)

बोरसिंह बोध

अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥
राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥
कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥
सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥
ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥
छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥
जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥
देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥

साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥

जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥

चौपाई

आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥
चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥
मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥
मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥

राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति

चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥
लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥
गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥
ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥
सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥
विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥
छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥
गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥

१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥

बोधसागर

(१११)

संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥

चौपाई

सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥

राजा बीरसिंह वचन

चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥

कबीर वचन

सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥

दूत वचन

साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥

कबीर वचन

तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥

(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥
चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥
राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥
पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥
राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥
बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥
छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥
दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥
अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥
राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥
जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥
चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥
नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥