कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बाललीला और रामानन्दको गुरु करनेका वर्णन
ज्ञानसागर
( ७५ )
दूध न पीवत नाम कबीरा । खेलेत संत संग मत धीरा ॥
तिनसौँ कहैं जागौ रे भाई । बिना नाम नहिँ काल पराई ॥
कोई न बूझौ भेद हमारा । रामानंद पर तब पगु धारा ॥
तब अपने मन कीन्ह उपाई । तिनहि दरश कैसहु नहि पाई ॥
रामानन्दको गुरु करना
जाहि रामानंद गंग स्नाना । तेहि मारग में जा पौढाना ॥
तबहि पांव गुरु लाग कबीरू । रामानंद बोल्यो मत धीरू ॥
उठ कबीर तब वचन उचारा । रामानंद है गुरु हमारा ॥
साखी-करहिगोष्ठी शिष्य सब, कोई ज्ञान जीत नहिं जाय ॥
सत ऋषि सुधि पाई, गुरु सों बोले आय ॥
बोपाई
विद्या कहे मलेच्छ को दीन्हा । रामानंद कोध तब कीन्हा ॥
चले शिष्य तब आज्ञा पाई । कबीर संतको आन बुलाई ॥
सुनतहिं शिष्य चहुँ दिशि धाये । हेर खोज कबीरै लाये ॥
आये कबीर लागि नहि बारा । गुरु मंडलमें आन पगु धारा ॥
अन्तर कपाट शिष्य तब लाया । पूजत रामानंद हरि राया ॥
सुन कबीर आगे चलि आये । गुरुहि आनकर मस्तक नाये ॥
लक्ष्मीनारायण मुकुट सिरनाये । पहिरै वस्त्र माल नहीं समाये ॥
तबहि कबीर वचन अस भाखा । वस्त्र पहिरि माला तुम राखा ॥
अंतर कपाट खोल तब दीन्हा । रामानंद सुन अचरज कीन्हा ॥
दिव्यज्ञान तुम कहैं केहि दीन्हा । जोर कर गुरुहि विनोदित कीन्हा ॥
कब हम तुम को दिशा दीन्हा । नाम हमारा काहे तुम लीन्हा ॥
गुरु हमैं तुम दिशा दीन्हा । झूठ बोलका क्या फल चीन्हा ॥
नं. १ कबीर सागर -
( ७६ )
ज्ञानसागर
साखी-गुरु जब चलैं नहाने, तब हम दिक्षा पाव ॥
तातैं गुरु कहि थाप्यो, फिर पीछे पछताव
चौपाई
पूज्यो पाहन पंडित धर्मा । पहिल न जानो तुम्हरो मर्मा ॥
मैं तो चाहत मुक्ति पदार्थ । तुम पाहिन जापूजे निश्चारथ ॥
तब गुरु सुनकै अचरज भयऊ । योग समाधि वैकुंठहि गयऊ ॥
सत्त समाधि विष्णु जब देखा । तापर देश कबीरहि लेखा ॥
जहैं देखा तहां सत्त कबीरा । झूठ ध्यान भूले मत धीरा ॥
हे कबीर तुम मर्म न जाना । जान मलेछ किया अपमाना ॥
जो कछु आहि मुक्ति सन्देशा । सो सब मोहि कहौ उपदेशा ॥
साहिब कबीर वचन
छोड़ी सबै मान अभिमाना । तो कह देव मुक्ति फल दाना ॥
शिष्य सरवा सौ बात जनाऊ । काल तोर शरणगत आऊ ॥
कहैं कबीर काल है काला । है बड़ दारुण काल कराला ॥
साखी-मुक्तिदेव नहिं लेव तुम, रामानंद गुरु देव ॥
भोरहि जन्म गवांय हो, करि पाहन की सेव ॥
सिकन्दर शाहकी बारता-चौपाई
ता निशि को तब भयो प्रभाता । काशी आइ भयी एक बाता ॥
आये सिकन्दर शाह सुल्ताना । है व्याधा बहु भेद न जाना ॥
रामानंद की सुनी बड़ावा । तातैं शाह आप चलि आवा ॥
आये मंडप जहां सुल्ताना । रामानंद तब देख रिसाना ॥
आये शाह सन्मुख भये जबही । रामानंद मुख फेरा तबही ॥
वार अनेक तिहितें सुख फेरा । तांकी ओर क्रोध कर हेरा ॥
मारचो खंग परचो खसि धरनी । शाह के अङ्ग अनिल सम बरनी ॥
आये शाह जहां दुःख नसावन । अधिक भई जो देह सतावन ॥