कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सात सन्धिका वर्णन
(१३८)
सबन्धसागर
तेहिंते चौदह मुनि उपजाये । जल अण्डते अंश बनावे ॥
चौदह मुनि चौदह दीप बैठारा । पांजी पताल उनको विस्तारा ॥
संधि छाप सौंप सब दीन्हा । अच्छर लोकमें चौका कीन्हा ॥
यहि पुरुष चौदह अंश बनावा । यहि अक्षरमें मोह समावा ॥
तब अक्षरको संशय आई । तेहि ते स्वासा छोड़े भाई ॥
स्वासा संगम उठी तब बानी । माया सुरति तब भयी उत्पानी ॥
माया सुरति अच्छर उपजायी । अष्टंगी सो कैसो शक्ती आयी ॥
अच्छर अष्टंगी सो कहई । जाब जहाँ निरंजन रहई ॥
अष्टंगी तब कहे समझाई । हम कैसे निरंजन पहुँ जाई ॥
तब अक्षर अस कहे भेऊ । निरंजने जाइ सिखापन देहू ॥
कन्या चलि निरंजन लगी आयी । आदि निरंजन मिले तब धायी ॥
देखि कला तब गये भुलाई । हे कन्या तोहिं को निर्माई ॥
काम ज्योति प्रकटी प्रचण्डा । तब चित विकल भयो नरमण्डा ॥
सकल रूप गयउ भुलाई । कामकि लहरि दोउको आई ॥
तब संयोग भयो त्रय बारा । जेठे ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥
तीजे शम्भू सबसे छोटा । ये निज भये ताहिंके ढोटा ॥
साखी-जैसे रूप निरंजन, तैसे तीनों बार ॥
प्रलय काल पैदा भये, प्रलय करत संसार ॥
धर्मदासवचन-चोपाई
धर्मदास जिव भये अनन्दा । मैं पाया पूर्ण गुरु चन्दा ॥
धन्य भाग मोहि मिलै गुसाई । आपन करि मोहि लियो सुत्ताई ॥
और एक पूछनकी आशा । चौरासी लक्ष कैसे प्रकाशा ॥
तीन प्रकार सृष्टि किन पाऊ । चौथेका मोहि भेद बताऊ ॥
साखी-धर्मदास सुख पायो, घट मो भयो अनन्द ॥
संशय मिटे प्रफुल्लित भये, ज्यों पूनोको चन्द ॥