कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मदासजी का गुरु रूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना
(२०)
ज्ञानप्रकाश
सोरठा-मिलहिं जो भेष अनेक, पूछहिं तेहि संदेश पुनि ॥
होय न चित महाँ एक, यक सम बचन न भावई ॥
धर्मदासका गुरुरूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना
धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास चलि भो गुरु पाहाँ । रूपदास कर आश्रम जाहाँ ॥
पहुँचे जाइ गुरुके धामा । होइ आधीन तब कीन्ह प्रणामा ॥
तुम गुरुदेव शिष्य हम आहीं । परचे ज्ञान कहहु मोहि पाहीं ॥
जीव मुक्त कौन विधि होई । तन छूटे कहैं जाय समोई ॥
(जिवकर मुक्ति कैसे होइ भाई । पारब्रह्म सो कहाँ रहाई ? ॥)
आदि ब्रह्म सो कहँवा रहाई । घट महाँ बोले कौन सो आही ॥
ताकर नाम कहो हम पाही । घट में बोले सो कस आही ॥
हम को हैं घट को होई । जग करता प्रभु कहाँ समोई ॥
गुरु रूपदास वचन
धर्मदास तुम भयो अजाना । को सिखयो तोहि अस ज्ञाना ॥
सुमिरहु रामकृष्ण भगवाना । ठाकुर सेवा कर बुधिवाना ॥
विष्णुपंजर ओ लक्ष्मिनरायन । प्रतिमा पूजन मुक्ति परायन ॥
मन वच सुमिरहु कुञ्जविहारी । रहै वैकुंठ सोह बनवारी ॥
पुरुषोत्तम पुरि वेगि सिधाओ । जगन्नाथ परसो घर आओ ॥
गया गोमती काशीथाना । तीरथ नहाय पुण्य परधाना ॥
निराकार निर्गुण अविनाशी । ज्योति स्वरूप शून्यका वासी ॥
ताहि पुरुषकर सुमिरहु नामा । तन छूटै पहुँचहु हरिधामा ॥
धर्मदास वचन
हो गुरुदेव पूँछो यक बाता । कोघ करि कहहु जनि ताता ॥
जीव रक्षक सो कहाँ रहाही । निराकार जिव भक्षक आही ॥
लक्ष जीव नित खाय निरंजन । तिया सुत ताहि करै बहु गञ्जन ॥
तीनो देव पड़े मुख काला । सुर नर मुनि सब करै विहाला ॥