कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गायत्रीका अद्याको शाप देना
अनुरागसागर
( ४६ )
भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा
हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥
दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥
जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त
यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ
चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥
छन्द
प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥
विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥
लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥
होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥
सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया
धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥
धर्मदास वचन कबीरप्रति
धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥
चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥
चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥
चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति
कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥
भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥
तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥