कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
क्रोध और क्षमाका युद्ध
(८२)
विवेकसागर
तामस तेज नाम तोहि कुद्धा । करु विवेक ज्ञानसो युद्धा ॥
कई अस प्रबल तोहि को सहै । तोरे तेज ज्ञान कई रहै ॥
वह सुनि कोध चला ससुहाई । करी गवन पहुँचा रन आई ॥
तनमें आइ कियो परवेशा । छाँडो ज्ञान हमारो देशा ॥
जो तुम निश्चय जीतो कामा । तो अब मोसों करो संग्रामा ॥
यह सुनि ज्ञान अचम्भित भयऊ । जाइ विवेक राइ सों कहेऊ ॥
राजा तब यक मंत्र विचारचो । जेहि विधि प्रबल क्रोध को मारचो ॥
साखी-यह अति क्रोध प्रचण्ड है, कोपि करै भयमंत ॥
सुधि बुधि धीरज ना रहै, जब यह कोपि चंढंत ॥
चौपाई
तब राजा मंत्रिन सो कहै । प्रबल क्रोध क्यहि कारण दहै ॥
तब सबहि मिलि मंत्र विचारा । यह तो जाय क्षमा ते मारा ॥
बोलि विवेक क्षमा सो कहै । तुम तो जाइ क्रोध रन बहै ॥
भक्ति ज्ञान तेहि देह सहाई । प्रबल क्रोध को मारो जाई ॥
यहि सुनि क्षमा रोपे रन आर्या । लीन्हो शील जो धनुष चढायी ॥
क्रोध और क्षमा का युद्ध
देखि क्षमा क्रोध चले धायी । मनसा भूमि रोप्यो रन आयी ॥
सुनो क्षमा क्रोध संग्रामा । लरही दोउ जुझै संग्रामा ॥
उतते क्रोध उठे रन कोपी । इतते क्षमा रहै रण रोपी ॥
मारन क्रोध उठे जब धायी । इतते क्षमा दीन्ह मुसकायी ॥
क्रोध आन तब गारी दयी । सुनि क्षमा अन बोली भयी ॥
मीठे वचन क्षमा अति बोलै । कोपै क्रोध पवन ज्यों डोलै ॥
क्षमा से अग्नि शितल है जाई । जैसे जलमें अग्नि बुझाई ॥
यहि विधि क्रोध क्षमा सो भिरई । मानहु अँगार पानिमहँ परई ॥
साखी-भलो भलो सब कोई कहै, रहि गइ क्षमा दुहाइ ॥
कहैं कबीर शीतल भये, गयी सो अग्नि बुझाइ ॥
विवेकसागर
( ८३ )
चौपाई
क्रोध जरनते गयऊ बुझायी । राजा मोह समाचार तब पायी॥
बहुते मन मँहँ कीन्ह पछिताई । सकल सैन को लिये बुलाई ॥
हारचो क्रोध काम जब जाना । महा मोह राजा डर माना ॥
चकित मोह मन्त्री हँकरावा । सम्मुख मोह विवेक डरावा ॥
लोभ मन्त्री आय भये ठाढा । देखत राव छोभ अति बाढा ॥
तब लोभ मोहहि माथ नवाई । कहु राजा मोहि काहे बुलाई ॥
जबलगि अहै मोह रणधीरा । तब लग काहे होहु अधीरा ॥
जबलग प्रबल मोह है आगे । तब लग कहा ज्ञान कह जागे ॥
महा मोह राजा सुनु बैना । जबलगिहौं तबलगि सब सैना ॥
जबलगिहौं तब लगि आही । मोरे गये सबै मिटि जाही ॥
हौं निज सर्व पापका मूला । मोरे ते तुम रहत हो फूला ॥
जीतौं ज्ञान विवेक हि जायी । देश आपनो लेउ छुडायी ॥
तो कहँ फिर मैं दैहौं राजू । महामोह मोरे बल गाजू ॥
यह सुनि हर्ष मोह मन भयऊ । तत्क्षण लोभको आयसु दयऊ ॥
मोह कहै दैहौं सब राजू । तबही लोभ रणै मँहँ गाजू ॥
जबही मोह लोभहि कहेऊ । देई बीरा आयसु दयऊ ॥
बाचा बन्ध राजा जब भयऊ । तबही लोभ रण कहँ गयऊ ॥
जाई रण दियो लोभ हँकारा । ज्ञान तुम का करहु तक़रारा ॥
हम बन्दोबस्त कियो परवेशा । छोडहु ज्ञान हमारो देशा ॥
तजहु ज्ञान तुम हमरो ठाकं । मैं प्रचण्ड लोभ मोर नाकं ॥
अब मैं रनमहँ अग्नि परजारी । करि बल एक एक कै मारौं ॥
चिन्ता शक्ति पापको मूला । कोउ न जाने मम डर भूला ॥
आशा तृष्णा तहां अति बहे । सुनत ज्ञान तहां नहि रहै ॥
नहि जानो तुम क्रोध औ कामा । हौं अति प्रबल लोभ मोहि नामा ॥