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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1025

बोधसागर

( १६७ )

सहस्र अठासी दीप सुधेरा ८८००० । तहाँ सब हँसा करै बसेरा ॥
सब दीपनमाँ शोभा पावैं । वहाँके गए बहुरि नहिं आवैं ॥

गुह्यभेद

एक बात है अन्य नियारी । सोइ मैं धर्मनि कहीं पुकारी ॥
सकल दीप थे दीप निन्यारा । तहवाँ अमरथको दरबारा ॥
कितने कडिहार वा घरकूँ जाई । गुप्त भेद तुम अच्छप छिपाई ॥

छन्द—तहाँ समर्थ आपबिराज है ताका महिमा को लहै ।
दीपउजियारी कहा बरनौ बास स्वासा सो रहै ॥
आन दीपके हंस हैं सो वाको जाने नहीं ॥
उहाँके वासी हंस सोहेला सो और दीप मानैं नहीं ॥
सदा हजूरी हंस विहँगम जिन देही उन बिसराइया ॥
गुरु शिष्य दोई एक होइकै सो वा दीपसिधाइया ॥

सोरठा—कदली केरे पात, पात पातमें पात है ।
ऐसे बात बातमें बात, जानेगा जन जोहरी ॥

चौपाई—धर्मदास उवाच

धर्मदास फिरि शीस नवावा । दोउ कर जोरिके विनतीलावा ॥
सोइ हंस रहै पुरुष हजूरी । उनकी रहनि कहौ गुरु थोरी ॥
कैसे रहै वे कैसे बोलैं । कैसे बैठैं वे कैसे डोलैं ॥
कौन ज्ञान कौन है करनी । सो सद्गुरु कहो मोहि बरनी ॥
जगमें रहै कौन सत्य भाऊ । कैसे काया केर सुभाऊ ॥
आन दीप रहै सत्य सुभाऊ । कहो उन्हकी कायाकेर प्रभाऊ ॥
दोउकी परचै मोहि सुनावो । ज्ञान दृष्टि करि मोहि दिखावो ॥

साखी—यह कछु अचरज बात है, कहि दिखावो मोहि ।
देखो ज्ञान बिचारिके, तबहि हृदय सुख होहि ॥