कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना
ज्ञानसागर
( २१ )
चौपाई
चले ब्रह्मा माता पर आये । दोई कर जोरिकै विनती लाये ॥
हे माता मैं पूछौं तोहीँ । जो पूछौं सो कहिये मोहीँ ॥
कौन पुरुष मुदि कीन्ह प्रकाशा । सो सब मातु कहौमोदि पास ॥
कहे भवनि सुतु ब्रह्म कुवौरा । पृथ्वी अकाश मैं अनुसारा ॥
मैं कीन्हा दुतिया नहिं कोऊ । तुम कस भूले सो कहु भेऊ ॥
हे माता मैं वेद विचारा । है कोई शून्यमें सिरजन हारा ॥
निरंकार निरञ्जन राया । ज्योतिअपार श्रुति गुणगाया ॥
साधु साधु कहि आदि भवानी । आदि पुरुष जेहि तैं उत्पानी ॥
कहाँ अहै सो मोहि बताओ । कृपा करो जिन मोहि डुराओ ॥
साखी—चरण सप्त पाताल हैं, सात स्वर्ग हैं माथ ॥
पुढूप लैकर परसौ, जामे होहु सनाथ ॥
चौपाई
चले ब्रह्मा मातहि शिर नाई । उत्तर पन्थ सुमेरुहि जाई ॥
जाइ ठाढ भये तिहिं अस्थाना । शून्य आद जहाँ शशि नहिं भाना ॥
बहु विधि स्तुति ब्रह्मा करई । ज्योति प्रभाव ध्यान अस धरई ॥
दुखित सुर्त जो भई तुम्हारी । स्तुति करत भये जुग चारी ॥
यहु विधि बहुत दिवस चलि गएऊ । आदि भवानी मन चित ठएऊ ॥
जेठा पुत्र जो ब्रह्म कुवौरा । कहाँ गयो वह पुत्र हमारा ॥
साखी—अब मैं करब उपाय सो, जिहि तैं ब्रह्मा आय ॥
गायत्री उत्पानऊ, ताहि कही ससुझाय ॥
चौपाई
ब्रह्मा गये पिता के ठाईँ । पिता दृश अजहूँ नहिं पाई ॥
बहुत दिवस भये बेग ले आवहु । बहुत भांति कर तिहि ससुझावहु ॥
चली गायत्री ब्रह्मा पास । तिनसौ जाइकर वचन प्रकाशा ॥