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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( १४६ )

अठारवें अमिशब्द ले नरियर मोरे । नहीं तो काख सीस लै तोरे ॥
विना एकोत्री जो कडिहारा । ते सब बांधे यमके द्वारा ॥
विना लेखे जो गुरु कहावे । गुरु डूबै शिष्य पार न पावे ॥

साखी-इतना लेखा पावै, सो साँचो कडिहार ।

कहैं कबीर बिन लेखा जाने, छलइ काल बटपार ॥

साखी-कडिहारी भेदकी धर्मदास उवाच

साहेब इतना भेद न आवै । सो नाही कडिहार कहावै ॥
मूल भेद तुम कहो प्रमाना । तेहिते हंस होय निर्वाना ॥
मूल भेद है आदि निशानी । सो समरथके होय प्रमानी ॥
इतनी परचै हमकूँ दीजै । मूल भेदकी दया गुरु कीजै ॥
गुरु सोई जो ज्ञान बतावै । और गुरु को काम न आवै ॥
साखी-धर्मदास कीया करै छुऔ सतगुरुके पाँव ।

साहब जो मैं तुमते बिछुरो, तो मूलशब्द बारह होइ जाव ॥

साखी-मूल भेदकी सद्गुरु उवाच

धर्मदास कहो मैं सोई । मूल भेद घट राखौ गोई ॥
गुरु मर्याद काहू ना पाई । ताते शब्द तुम राखौ छिपाई ॥
मूल भेद है अगम अपारा । विरला हंस पावही पारा ॥
सुर नर मुनि गण गन्धर्व देवा । तिनहु मूल नहीं पायो भेवा ॥
काया मूल है आदि निशानी । सौ धर्मनि तुम सुनो प्रमानी ॥
जो निज योग समाधि लगावै । सो तो लाभ तिनहुँ नहीं पावै ॥
चार वेद जिस आगम बखाना । मूल भेद वेदो नहीं जाना ॥
अक्षर मूलकी उत्पति भाखी । अजर मूल लै बारह राखी ॥
अजर मूल है सबको मूला । तेहिते प्रथम काया है स्थूला ॥
लाखौ सैनमें देउ लखाई । अजर मूल लै लोक समाई ॥
भिन्न भिन्न सब मूल बताऊं । अजर मूल माया दिखलाऊं ॥

नं. ७ कबीरसागर - ६