कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कामिनीसे बातचीत
( ५२ )
जगजीवनबोध
चार सहस्र सै सात रु बावन । इतना जिय चलु लोकहिं ठावन॥
दोसै कौल चुकाने भाई । सो रहे धर्म राय की ठाई ॥
चार हजार सात सै बावन । दोय सै धरमराज ठहरावन ॥
चार हजार बावन सै पाँचा । मानसरोवर पहुँचो सो साँचा ॥
जहाँ कामिनी मंगल गावै । सजि आरति ले आगे आवै ॥
कामिनी वचन
करी निछावर बूझै बाता । कैसे आये यहि मग धाता ॥
माया मोह बन्द्यो संसारा । कैसे छाडे कुल परिवारा ॥
हंस वचन
कहे हंस सतगुरु गम दीन्हा । जब हम दर्शन तुम्हारा लीन्हा॥
देह बनी सो आगे आये । रहिता सब जिव वहाँ रहाये ॥
चार हजार एकसौ बावन । एते हंस तेहीं ठावन ॥
चार सौ आगे किया पयाना । हेतु द्रौप पहुँचे अस्थाना ॥
मान सरोवर हंस रहायी । सबमिलिकरहि बहुत बधायी॥
सब पूछे कामिनि सो बात । यह सब हंस कहाँ को जाता ॥
कामिनी वचन
कह कामिनि सुनु हंसा भाई । तुम गुरु कर कह कीन कमाई ॥
परवाना की यह बडावा । सो तुम मानसरोवर आवा ॥
उन हंसन गुरु भक्ति करायी । जुगति जुगति उन देह बनायी ॥
आगे हेत द्रौप मैं जैहैं । हंस सुजन जन कंठ लगै हैं ॥
हंस वचन
सब हंसा मिलि विनती कीन्हा । हम चाहैं तुव दर्शन लीन्हा ॥
साखी-बैठि हंस विन्ती करे, सुनु समरथ अरदास ।
देही सवारे लोकमें, उपजे प्रेम विलास ॥