कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई करना
बोधसागर
( ११९ )
सुनो हनुमंत मेरी बात। सत्य पुरुष है समरथ दाता ॥
ताका तुमसों कहौं संदेश। सुमिरण करो तजो यम भेशा ॥
सत्य समरथ है पैले पारा। काल कला उपज्यो संसारा ॥
सोइ समरथ है सिरजन हारा। तीनों देव न पावैं पारा ॥
साखी-समरथकी गति को लखै, शिव विरंचि नहिं जान ।
काल अकाल तहाँ नहीं, पूरण पद निर्वान ॥
हनुमान वचन-चौपाई
कहत सुनीन्दर अकथ कहानी । काल काल की बोलो बानी ॥
काल काल कहि मोहि डराओ । तुम तो काल कर गति ना पाओ ॥
काल पुरुष आपे वह होई । और काल देखा नहिं कोई ॥
आपुहि करता आपुहि काल। चौदह भुवन आपै रखवाला ॥
कालपुरुष ते और न कोई । निश्चय कै मैं माना सोई ॥
सबका पिता काल है जोई । ताकी गती लखै ना कोई ॥
ज्योति स्वरूप जग उजियाला । ताका नाम धरा तुम काला ॥
जो तुम कहौं सबै हम जानी । सुनो सुनीन्दर मोरी बानी ॥
रचना सकल काल की ठानी । तुम अपने मन हो बड ज्ञानी ॥
काल पुरुष गति परै न जानी । सो हम जानि छानि के पानी ॥
काल पुरुष ते बडा न कोई । उनके ऊपर और न होई ॥
जाको नाम निरञ्जन राया । तीन लोकमें ताकी माया ॥
उनते और नहीं कोई दूजा । तीनलोक में उनकी पूजा ॥
तीनों देव जो उनको ध्यावैं । ते भी उनको पार न पावैं ॥
ताको तुम सूक्ष्म करि जानो । तुम्हरे मन काहे नहिं मानो ॥
इतनी भयी हनुमान मुख बानी । रचना सकल काल की खानी ॥
उनको पार बताओ मोहीं । उठि के शीश नवाऊँ तोहीं ॥
जो तुम आदि अंत सब जानो । तो तुम ज्ञान अब हमसे ठानो ॥
( १२० )
हनुमानबोध
पहिले सुनो हमारी बाता । तुम सुनीन्द्र है बडा ज्ञाता ॥
मोरे पौरुष है बड जोरा । जन्म लेत कीन्हे घनघोरा ॥
जांदिन जन्म भयो महि मोरा । उदय भानु देखि मैं दौरा ॥
सूरज बाहर आवन नहिं दीना । निकसन तुरत लीलि मैं लीन्हा ॥
एक फलांग उर्ध्वचल गयऊँ । सो पौरुष मैं तुमसे कहेऊँ ॥
माता कीन जब बोल अधीना । उनके कहे छाडि हम दीना ॥
सूरज छाडि दीना हम जबहीं । जग प्रकाश भयो पुनि तबहीं ॥
जन्मत की यह कथा सुनाई । कहो तो और सुनाऊँ भाई ॥
राम प्रताप का हम कीन्हा । सो सुनीन्द्र नाहीं तुम चीन्हा ॥
एक समें जो राम बतायी । लंका खबर लाऔ तुम जायी ॥
लंका छोडि पलंका गयऊँ । जाय नगरमें ठाढो भयऊँ ॥
तब तिन कही यह नहिं लंका । पीछे तजि आयेऊ पलंका ॥
कहाँलौ कथा कहौ जो भाई । अपने सुख कहा करौ बडाई ॥
लक्ष्मण मूर्छित गिरे भुई भाई । तब द्रोणागिरि आनि जिवाई ॥
जेहि पै वही सजीवन होती । दैत्यन छली कीन्ही बहु जोती ॥
रातहिं को द्रोणगिरि लाये । रामवीर को तुरत जगाये ॥
यही द्रोणगिरि लेके दौरा । फिरि के धरो जाइ तेहि ठौरा ॥
ऐसे कारज अनेक सर्वाँरे । उनहि प्रताप कार्य उजियारे ॥
साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, पौरुष औ बल जोर ।
अपना गुण मैं जानिके, कासों कहां निहोर ॥
१ जब शमदमादिका अन्त्यास करके मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करनेके निकट पहुंचाता है तब यदि प्रारब्ध उसी शरीर तक होती है तब तो आत्मज्ञानको प्राप्त हो जाता है और जीवनमुक्त पद को भोगता है किन्तु यदि वर्तमान शरीरका प्रारब्ध अनेक शरीरका कारण होता है तब वह ज्ञान कुछ समय के लिये छिप जाता है।
२ बीर-भाई । रामवीर अर्थात् लक्ष्मण ।